68 साल का सफर, तीन पीढ़ियों की यादें और रावण का एक ऐसा अंदाज, जिसे भुलाना आसान नहीं. रणबीर कपूर की राम और यश की रावण वाली ‘रामायण’ में ‘रावण तांडव’ ने दस्तक दे दी है. दशहरे के मौके पर रिलीज हुए इस वीडियो में यश का रौद्र रूप, शिवभक्ति और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस चर्चा में है. लेकिन इस भव्य एंट्री के साथ एक पुराना सवाल भी लौट आया है- क्या यश अपने रावण से वही जादू जगा पाएंगे, जो रामानंद सागर की ‘रामायण’ में अरविंद त्रिवेदी ने पैदा किया था?
इस कहानी की शुरुआत आज से नहीं, बल्कि 1958 में आई तेलुगु फिल्म ‘भूकैलास’ से होती है. तब से लेकर छोटे पर्दे की ऐतिहासिक ‘रामायण’ और अब बड़े पर्दे की नई ‘रामायण’ तक, शिव तांडव स्तोत्र ने कई रूप बदले हैं. मगर हर बार इसके केंद्र में रहा है एक ही किरदार- लंका का राजा रावण, जिसकी पहचान सिर्फ उसके अहंकार से नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उसकी अगाध भक्ति से भी जुड़ी है.
1958: जब एनटी रामा राव बने रावण
साल 1958, भारतीय सिनेमा में पौराणिक फिल्मों का अपना अलग जलवा था. इसी दौर में निर्देशक के. शंकर की तेलुगु फिल्म ‘भूकैलास’ रिलीज हुई. एवीएम प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी इस फिल्म में एनटी रामा राव ने रावण का किरदार निभाया था. फिल्म 20 मार्च 1958 को रिलीज हुई थी. इसमें अक्किनेनी नागेश्वर राव और जमुना जैसे कलाकार भी नजर आए थे.
‘भूकैलास’ की कहानी भगवान शिव और रावण से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं की दुनिया में ले जाती है. शिव तांडव स्तोत्र का फिल्मी इस्तेमाल भी इसी सिनेमाई परंपरा का हिस्सा रहा है. हालांकि, यह कहना कि इस स्तोत्र को पहली बार इसी फिल्म में फिल्माया गया था, ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं है. इससे पहले 1940 में भी इसी नाम की एक तेलुगु फिल्म बन चुकी थी. इसलिए 1958 की ‘भूकैलास’ को शिव तांडव की सिनेमाई यात्रा का एक अहम पड़ाव कहना ज्यादा सही होगा.
लेकिन इस सफर में एक बात शुरू से खास रही- रावण को केवल खलनायक की तरह नहीं, बल्कि एक विद्वान, शक्तिशाली योद्धा और शिव के परम भक्त के रूप में दिखाना. यही विरोधाभास इस किरदार को दिलचस्प बनाता है. वह जितना भयानक है, उतना ही भव्य भी.
1987: अरविंद त्रिवेदी ने रावण को बना दिया यादगार
अगर भारतीय दर्शकों से पूछा जाए कि रावण का नाम सुनते ही उनके दिमाग में किसकी तस्वीर उभरती है, तो बड़ी संख्या में लोग अरविंद त्रिवेदी का नाम लेंगे. रामानंद सागर की ‘रामायण’ में उनका निभाया रावण का किरदार भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे यादगार भूमिकाओं में गिना जाता है. 1987 में शुरू हुई इस टीवी रामायण ने रामकथा को घर-घर तक पहुंचाया. अरविंद त्रिवेदी की भारी आवाज, तीखे हावभाव, राजसी अंदाज और संवाद बोलने के खास तरीके ने रावण को ऐसी पहचान दी, जो दशकों बाद भी कायम है.
शिव तांडव स्तोत्र से जुड़ा उनका अंदाज भी इसी यादगार छवि का हिस्सा बन गया. यहां रावण का रूप केवल क्रोध से भरा हुआ नहीं था. उसमें शिव के प्रति समर्पण, अपने सामर्थ्य का गर्व और अपने व्यक्तित्व की विराटता भी दिखाई देती थी. यही वह बारीक फर्क था, जिसने अरविंद त्रिवेदी के रावण को महज एक खलनायक बनने से बचाया. दर्शक उसके गलत कामों को जानते थे, लेकिन उसके व्यक्तित्व की ताकत को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे.
दिलचस्प बात यह भी है कि अरविंद त्रिवेदी असल जिंदगी में धार्मिक आस्था रखते थे. मीडिया में प्रकाशित उनके पुराने इंटरव्यू के आधार पर आई खबरों के मुताबिक, रामायण की शूटिंग के दौरान भगवान राम के बारे में कठोर संवाद बोलने के बाद वह प्रार्थना और प्रायश्चित किया करते थे. पर्दे पर रावण का अहंकार दिखाने वाले इस अभिनेता की निजी आस्था उनके किरदार से बिल्कुल अलग थी.
यही वजह है कि अरविंद त्रिवेदी की विरासत सिर्फ एक मशहूर डायलॉग या किसी एक दृश्य तक सीमित नहीं है. उन्होंने रावण को एक ऐसी सिनेमाई पहचान दी, जिससे आज भी नए कलाकारों की तुलना की जाती है.
2026: यश की एंट्री और ‘रावण तांडव’ का धमाका
अब आते हैं 2026 पर, जहां रावण की भूमिका में नजर आने वाले हैं यश. ‘केजीएफ’ फ्रेंचाइजी से देशभर में अपनी दमदार छवि बना चुके यश के सामने इस बार चुनौती एक अलग तरह के किरदार को जीवंत करने की है. 20 अक्टूबर 2026 को दशहरे के मौके पर नितेश तिवारी की फिल्म ‘रामायण’ से जुड़ा ‘रावण तांडव’ वीडियो जारी किया गया. इसके अंग्रेजी शीर्षक ‘Rise of Asura’ के जरिए भी रावण के शक्तिशाली और उग्र रूप को सामने रखा गया है.
करीब एक मिनट 55 सेकंड के इस वीडियो में यश रावण के रूप में भगवान शिव की आराधना करते नजर आते हैं. वीडियो की शुरुआत में वह अपने हाथ पर कट लगाते हैं और फिर माथे पर त्रिपुंड तिलक लगाते हैं. इसके बाद विशाल शिव प्रतिमा के सामने आरती और फिर तांडव के जरिए उनके किरदार का उग्र रूप सामने आता है.
यहां यश की स्क्रीन प्रेजेंस साफ तौर पर ध्यान खींचती है. उनका लुक, बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के भाव रावण की ताकत और आक्रामकता को उभारते हैं. वीडियो का मकसद सिर्फ एक गाना पेश करना नहीं, बल्कि दर्शकों को यह दिखाना भी है कि इस फिल्म में रावण को किस तरह गढ़ा गया है.
इस प्रस्तुति को संगीत के स्तर पर भी बड़े नामों का साथ मिला है. ए.आर. रहमान ने संगीत तैयार किया है, हिंदी वर्जन में विशाल ददलानी की आवाज सुनाई देती है और गीत के बोल कुमार विश्वास ने लिखे हैं. फिल्म के संगीत से जुड़ी इस बड़ी टीम ने रावण के किरदार को भव्य ध्वनि और नाटकीयता देने की कोशिश की है.
यह वीडियो फिल्म की रिलीज से पहले आया है. ‘रामायण’ में रणबीर कपूर भगवान राम और यश रावण की भूमिका में हैं, जबकि साई पल्लवी सीता के किरदार में नजर आएंगी. फिल्म की पहली किस्त 5 नवंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है.
आखिर शिव तांडव स्तोत्र में ऐसा क्या है?
शिव तांडव स्तोत्र की लोकप्रियता का राज केवल इसके धार्मिक महत्व में नहीं, बल्कि इसकी लय और शब्दों की ऊर्जा में भी छिपा है. परंपरागत मान्यता के अनुसार, यह स्तोत्र रावण से जुड़ा हुआ है और भगवान शिव की महिमा का गुणगान करता है. इसके संस्कृत शब्दों की तेज गति, कठिन उच्चारण और प्रभावशाली छंद इसे संगीत और अभिनय के लिए बेहद आकर्षक बनाते हैं. जब इसे भारी आवाज, दमदार संगीत और नाटकीय दृश्यों के साथ पेश किया जाता है, तो इसका प्रभाव और बढ़ जाता है.
लेकिन इस स्तोत्र को पर्दे पर प्रभावशाली बनाना आसान नहीं है. कलाकार को एक साथ कई भाव दिखाने पड़ते हैं- शिव के प्रति श्रद्धा, अपनी शक्ति का गर्व, उग्रता और एक ऐसे राजा की भव्यता, जिसे अपनी ताकत पर पूरा भरोसा है. यही वजह है कि हर दौर में शिव तांडव का फिल्मांकन केवल नृत्य या संगीत का मामला नहीं रहा. यह इस बात की परीक्षा भी रहा है कि रावण के किरदार को कितना गहराई से समझा गया है.
यश बनाम अरविंद त्रिवेदी: मुकाबला लुक का नहीं, छाप का है
यश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अरविंद त्रिवेदी की नकल करने की नहीं, बल्कि रावण को अपने अंदाज में स्थापित करने की है. दोनों कलाकारों के दौर, माध्यम और अभिनय की शैली अलग हैं. अरविंद त्रिवेदी ने टेलीविजन के सीमित संसाधनों के बीच अपने संवादों, आवाज और हावभाव से दर्शकों पर छाप छोड़ी थी. यश के पास आज के बड़े बजट, आधुनिक तकनीक, भव्य सेट और विशाल सिनेमाई कैनवास की ताकत है.
इसलिए दोनों की तुलना करते समय केवल बाहरी रूप या परफॉर्मेंस की तीव्रता को पैमाना नहीं बनाया जा सकता. असली सवाल यह है कि क्या यश अपने रावण को इतना विश्वसनीय बना पाएंगे कि दर्शक उसकी शक्ति के साथ-साथ उसके भीतर के भक्त, विद्वान और अहंकारी राजा को भी महसूस कर सकें?
‘केजीएफ’ में यश का अंदाज उनके किरदार को बड़े पैमाने पर पेश करने के लिए जाना गया है. रावण के रूप में भी यह व्यक्तित्व उनके काम आ सकता है. लेकिन पौराणिक किरदार की अपनी संवेदनशीलता है. यहां केवल ताकत दिखाना काफी नहीं, बल्कि उस ताकत के पीछे का भाव भी उतना ही जरूरी है.
दूसरी तरफ, अरविंद त्रिवेदी की रावण वाली छवि कई पीढ़ियों की यादों में दर्ज है. ऐसे किरदारों के सामने आने वाले हर नए कलाकार को दर्शकों की उम्मीदों और पुरानी यादों, दोनों से जूझना पड़ता है.
क्या 68 साल पुराना जादू फिर लौटेगा?
1958 की ‘भूकैलास’ से लेकर 1987 की ‘रामायण’ और अब 2026 की ‘रामायण’ तक शिव तांडव स्तोत्र का सफर भारतीय सिनेमा और टेलीविजन की बदलती दुनिया का भी सफर है. पहले पौराणिक कथाओं को पारंपरिक फिल्मी अंदाज में पेश किया जाता था, फिर छोटे पर्दे ने इन्हें घर-घर तक पहुंचाया और अब बड़े बजट की फिल्में इन्हें आधुनिक तकनीक के साथ नए पैमाने पर दिखा रही हैं.
यश का ‘रावण तांडव’ इस परंपरा का नया अध्याय है. शुरुआती वीडियो में उनका रौद्र रूप और भव्य प्रस्तुति जरूर ध्यान खींचती है, लेकिन इसे अरविंद त्रिवेदी के जादू के बराबर रखने का फैसला अभी जल्दबाजी होगी. इसके लिए फिल्म में किरदार की पूरी यात्रा, अभिनय की गहराई और दर्शकों की प्रतिक्रिया देखना जरूरी होगा.
आखिरकार, रावण का किरदार केवल उसकी गर्जना से यादगार नहीं बनता. उसे यादगार बनाती है उसकी शख्सियत, उसके विरोधाभास और पर्दे पर पैदा होने वाला वह प्रभाव, जो कहानी खत्म होने के बाद भी दर्शकों के साथ रहता है. यश के पास इस किरदार को नए दौर की पहचान देने का मौका है. अरविंद त्रिवेदी ने अपनी जगह इतिहास में दर्ज कर दी है. अब देखना यह है कि यश उस इतिहास को दोहराने की कोशिश करते हैं या रावण की एक ऐसी नई छवि गढ़ते हैं, जिसकी चर्चा आने वाले दशकों तक हो.
क्योंकि शिव तांडव की असली ताकत सिर्फ उसकी गूंज में नहीं, बल्कि उस छाप में है जो सुनने और देखने वाले के मन में रह जाती है.
आरती गुप्ता