Deoband Assembly Seat: 2017 की मोदी लहर में BJP ने जीती सीट, अब 2022 में क्या होगा?

Deoband assembly seat: विधानसभा सीट पर 1947 के बाद लगातार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का ही दबदबा चलता रहा. लगभग 10 बार इस सीट पर कांग्रेस के विधायक ही चुने जाते रहे. वर्तमान में भाजपा के कुंवर बृजेश सिंह इस सीट पर विधायक हैं.

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देवबंद विधानसभा में करीब 1 लाख 24 हजार मुस्लिम मतदाता हैं. देवबंद विधानसभा में करीब 1 लाख 24 हजार मुस्लिम मतदाता हैं.

aajtak.in

  • देवबंद (सहारनपुर),
  • 01 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 9:38 AM IST
  • यूपी के सहारनपुर जिले में है देवबंद
  • देवबंद विधानसभा में हैं 1 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटर्स

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद का देवबंद भारत समेत पूरी दुनिया में दारुल उलूम और प्राचीन शक्तिपीठ श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर के कारण विख्यात है. दारुल उलूम देवबंद का जहां एक ओर स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान रहा है, दूसरी ओर यहां 5 हजार छात्र धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते हैं. शिक्षा पूरी तरह निशुल्क दी जाती है, बल्कि शिक्षार्थियोंं के यहीं पर रहने और खाने-पीने का इंतजाम दारुल उलूम स्वयं करता है. साथ ही मासिक वजीफा भी छात्रों को दिया जाता है. दारुल उलूम से जो छात्र पढ़कर निकते हैं, उन्होंने न केवल देश में, बल्कि दुनिया में भी नाम कमाया है. विश्व स्तर पर देवबंद को एक बड़ी पहचान दिलाने का काम किया है. 

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वहीं, दूसरी ओर प्राचीन शक्तिपीठ मां श्री त्रिपुर बाला सुंदरी देवी का मंदिर अपने आप में बहुत प्राचीन इतिहास छिपाए हुए है. मंदिर के ऊपर एक शिलालेख लगा हुआ है जो 5 हजार साल से भी ज्यादा पुराना  बताया जाता है. सिद्ध पीठ के मुख्य द्वार पर लिखी लिपि को आज तक कोई नहीं पढ़ पाया और ऐसा माना जाता है कि इस शिलालेख पर ही इस मंदिर की स्थापना का राज छिपा हुआ है. यह भी बताया जाता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों का काफी समय यहां देवबंद में गुजरा था और अर्जुन ने मां भगवती से तपस्या कर विजयी भव का आशीर्वाद प्राप्त किया था. देवबंद से सटा हुआ रणखंडी गांव है जिसे इतिहास में महाभारत काल के दौरान युद्ध के लिए चुना गया था. लेकिन किन्हीं कारणों की वजह से युद्ध रणखंडी में न होकर कुरुक्षेत्र में हुआ था. 

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जातिगत मतदाता

देवबंद विधानसभा पर करीब 3 लाख  41 हजार 850 मतदाता हैं जिनमें 1 लाख 24 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि 6 हजार जाट, 8 हजार ब्राह्मण, 27 हजार ठाकुर, 19 हजार गुर्जर, 23 हजार त्यागी, 65 हजार दलित और 22 हजार कश्यप समेत अन्य जातियों के वोटर्स भी हैं. विधानसभा में 150 गांव हैं. 2017 में भाजपा से कुंवर बृजेश सिंह ने चुनाव जीता था, जबकि बसपा से चुनाव लड़े माजिद अली दूसरे नंबर पर रहे थे. सपा का प्रत्याशी माविया अली यहां तीसरे नंबर पर रहा था. 

मुख्य रोजगार खेती

यदि व्यवसाय की बात करें तो देवबंद क्षेत्र में बड़ी इंडस्ट्रीज के नाम पर केवल एक त्रिवेणी शुगर मिल है. इसके अलावा छोटी मोटी फैक्ट्रियां हैं. गंडासा उद्योग जिसको प्रमुख माना जाता है. इसके अलावा, यहां पर लोगों का मुख्य रोजगार खेती है और देवबंद विधानसभा क्षेत्र के अधिकांश लोग खेती के माध्यम से ही अपना गुजर-बसर करते हैं.  

राजनैतिक पृष्ठभूमि

विधानसभा सीट पर 1947 के बाद लगातार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का ही दबदबा चलता रहा. लगभग 10 बार इस सीट पर कांग्रेस के विधायक ही चुने जाते रहे. वर्तमान में भाजपा के कुंवर बृजेश सिंह इस सीट पर विधायक हैं. कुंवर बृजेश को राजनीति में लाने का श्रेय दिवंगत धर्मपाल महाशय एमडीएच मसालेवालों को जाता है, क्योंकि धर्मपाल महाशय को विधायक बृजेश सिंह अपने ताऊ मानते थे और धर्मपाल महाशय कई बार केंद्रीय कपड़ा मंत्री रहे संतोष गंगवार के साथ बृजेश के गांव जड़ौदा जट में भी आए थे. 2017 से पहले बृजेश सिंह का कोई बड़ा होमवर्क इस सीट पर नहीं था और वह एक राजनेता के रूप में बड़ी पहचान इस सीट पर नहीं रखते थे. कुंवर बृजेश सिंह का हरिद्वार उत्तराखंड में गैस एजेंसी का व्यापार चल रहा है. इसके अलावा उनकी खेती भी है.

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सामाजिक ताना-बाना 

देवबंद विधानसभा सीट पर अधिकांश चुनाव हिंदू मुस्लिम के आधार पर ही होते रहे हैं, क्योंकि मुस्लिम भी सीट पर निर्णायक भूमिका में हैं और जिस तरफ मुस्लिम वोट जाता है, उस प्रत्याशी के जीतने की उतनी ही प्रबल संभावना हो जाती है. दूसरी ओर दलित भी इस सीट पर निर्णायक भूमिका ही रखते हैं और वह भी जिस तरफ चले जाते हैं, उस पार्टी का पलड़ा मजबूत हो जाता है.

हिंदू मुस्लिम भाईचारा बहुत ज्यादा मजबूत

इस विधानसभा में करीब 1 लाख 24 हजार मुस्लिम मतदाता हैं और लगभग 65 हजार दलित मतदाता हैं. हां, सबसे महत्वपूर्ण बात देवबंद विधानसभा की यह मानी जाती है कि यहां का हिंदू मुस्लिम भाईचारा बहुत ज्यादा मजबूत है. बताया जाता है कि 1947 में जब पूरे देश में दंगे फसाद हो रहे थे, उस समय भी देवबंद पूरी तरह शांत था. देवबंद में गंगा-जमुनी तहजीब अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है. यहां यह भी उल्लेख करना बहुत जरूरी है कि देवबंद में एक बार भी हिंदू मुस्लिम दंगा नहीं हुआ है और हिंदू मुस्लिम ही नहीं यहां पर सिख बड़ी तादाद में हैं और सभी लोग यहां पर मिलजुल कर रहते हैं. देवबंद विधानसभा सीट पर अधिकांश ठाकुर समाज के लोगों का ही वर्चस्व रहा है. लगभग 5 बार महावीर सिंह, 3 बार ठाकुर महावीर सिंह राणा, 2 बार राजेंद्र सिंह राणा, एक बार शशिबाला पुंडीर और एक बार सुखबीर सिंह पुंडीर विधायक रहे हैं.

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2017 का जनादेश 

2017 के विधानसभा चुनाव में देवबंद सीट पर भाजपा ने कुंवर बृजेश सिंह को चुनावी मैदान में उतारा था और करीब 1 लाख 1 हजार वोट लेकर बृजेश सिंह विजयी रहे थे. वहीं, बसपा के माजिद अली ने लगभग 71 हजार मत प्राप्त कर दूसरा स्थान प्राप्त किया था और सपा के माविया अली लगभग 52 हजार वोट प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रहे थे, हालांकि, सपा अंतिम समय तक टिकट का फैसला नहीं कर पाई थी, क्योंकि पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राणा की पत्नी मीना राणा और उनकी पुत्री प्रियंवदा राणा भी टिकट की दावेदारी में जी-जान से जुटे हुए थे, लेकिन अंत में बाजी माविया अली ने मारी, लेकिन चुनाव में उन्हें भाजपा के बृजेश सिंह से 50 हजार से ज्यादा मतों से हार का मुंह देखना पड़ा. यदि बात बृजेश सिंह की जीत की करें तो देवबंद विधानसभा के लिए एक तरह से वह नया चेहरा थे और देवबंद विधानसभा के मतदाता उनको सही तरह से जानते भी नहीं थे और न ही उनकी कोई यहां राजनीतिक पकड़ थी. उनका जीतना मोदी लहर के कारण माना जाता है और केवल उनकी जीत भाजपा की ही जीत मानी जाती है.

देवबंद विधायक का रिपोर्ट कार्ड

देवबंद के मौजूदा विधायक कुंवर बृजेश सिंह का इससे पूर्व कोई देवबंद विधानसभा पर राजनैतिक रिकॉर्ड नहीं है. 2017 के चुनाव में चुनाव लड़े थे और चुनाव जीते भी थे. उनका जन्म 22 फरवरी 1972 को ग्राम जड़ौदा जट में हुआ था. इनके पिता का नाम डॉक्टर राजकुमार तथा माता का मंजुला रावत है. बृजेश सिंह के दो भाई हैं जिनके नाम नवनीत राणा और अभय प्रताप सिंह हैं. विधायक को बृजेश सिंह की पत्नी का नाम पूजा सिंह है और इनके एक पुत्र दिवाकर विक्रम सिंह और एक पुत्री हैं.

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हरिद्वार में अपना कारोबार

बृजेश सिंह का पहले से ही उत्तराखंड के हरिद्वार में अपना कारोबार है और उनका अधिकतर समय वहीं पर गुजरता है. घर पर खेती होने के कारण इनके भाई नवनीत राणा और वैभव सिंह खेती का काम देखते हैं. इनके पिता डॉ. राजकुमार का केंद्रीय कपड़ा मंत्री संतोष गंगवार और एमडीएच मसाले के दिवंगत धर्मपाल महाशय से पहले से ही मेलजोल था, जिसके चलते और बृजेश सिंह एमडीएच के धर्मपाल महाशय को अपना ताऊ मानते थे. अगर बात विधायक की शिक्षा की की जाए तो उन्होंने ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई की हुई है औ  इनका मिजाज बहुत ही गर्म है. इसी कारण देवबंद विधानसभा में ठाकुरों के गांव में इनका विवाद भी हो गया था जो काफी समय तक चला और बाद में वह निपट गया था.

ठाकुर समाज में विरोध

हाल ही में स्वर्गीय मंत्री राजेंद्र सिंह राणा के पुत्र कार्तिकेय राणा की पत्नी नितिशा  राणा ने ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ा था और इस चुनाव के परिणाम के दिन प्रशासन पर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगा था, जिसके चलते लाठीचार्ज हुआ और ठाकुर समुदाय के लोग इस लाठीचार्ज और नितिशा राणा की हार की वजह का मुख्य कारण भी विधायक बृजेश सिंह को मानते हैं और इस कारण उनका ठाकुर समाज में विरोध चल रहा है.

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पिंटू शर्मा की रिपोर्ट

 

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