उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. बीजेपी के संग दोस्ती का रंग आरएलडी पर चढ़ने लगा है. चौधरी चरण सिंह से लेकर चौधरी अजित सिंह और आरएलडी के परंपरागत पैटर्न से अलग जयंत चौधरी चल रहे हैं. आरएलडी लंबे समय तक जाट और मुस्लिम समीकरण के सहारे पश्चिमी यूपी में राजनीति करती रही, लेकिन अब जयंत चौधरी इस केमिस्ट्री से बाहर निकलकर नए सियासी गणित बैठाने में जुट गए हैं.
आरएलडी के सांसद और विधायक के बयानों, भाषणों में बीजेपी की राजनीतिक शैली दिख रही है बल्कि जयंत चौधरी के द्वारा पार्टी संगठन की गई नियुक्तियां भी बड़ा सियासी संदेश दे रही हैं. जयंत चौधरी ने आरएलडी का यूपी कार्यकारी अध्यक्ष अनुपम मिश्रा को बनाया है तो संसदीय दल का अध्यक्ष केसी त्यागी और महासचिव की जिम्मेदारी त्रिलोक त्यागी को सौंप रखा है.
उत्तर प्रदेश के 2022 विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी ने सपा के साथ मिलकर जाट-मुस्लिम समीकरण को अमलीजामा पहनाया था, लेकिन अब बदले हुए सियासी माहौल में जयंत चौधरी ने मुस्लिम वोटों के बजाय ब्राह्मण और त्यागी समाज के साथ जाट केमिस्ट्री बनाने की कवायद कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आरएलडी ने आखिर अपनी सियासी चाल क्यों बदल दी है.
जयंत चौधरी की पश्चिमी यूपी में बदली चाल
आरएलडी का सियासी आधार हमेंशा से पश्चिमी यूपी रहा है. पश्चिमी यूपी में आरएलडी चौधरी अजित सिंह के दौर से जाट और मुस्लिम वोटों के सहारे राजनीति करती रही है. साल 2013 में मुजफ्फरनगर दंगा हुआ तो जाट और मुस्लिम समीकरण बिखर गया और उसका खामियाजा आरएलडी को भुगतना पड़ा. इसके चलते जयंत से लेकर चौधरी अजित सिंह तक चुनाव हार गए थे.
जाट-मुस्लिम समीकरण को मजबूत करने के लिए आरएलडी ने काफी मशक्कत किया था और 2022 में सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी, जिसके चलते उनकी राजनीति को नई संजीवनी मिली, लेकिन 2024 में जयंत ने सपा से गठबंधन तोड़कर बीजेपी से हाथ मिला लिया.
बीजेपी के साथ होने के चलते मुस्लिम समाज ने जयंत से दूरी बना ली. इसीलिए मुस्लिमों के बजाय दूसरे वोटों को साधने की कवायद में आरएलडी जुड़ गई है. जयंत चौधरी ने पश्चिमी यूपी में एक नए त्रिकोण 'जाट-ब्राह्मण-त्यागी' केमिस्ट्री पर काम करना शुरू कर दिया है.
जयंत चौधरी ने क्यों बदली सियासी केमिस्ट्री
आरएलडी की सियासी कभी मुख्य रूप से किसानों, चौधरी चरण सिंह की विरासत और क्षेत्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहती थी. पश्चिमी यूपी में जाट-मुस्लिम वोटों के समीकरण को देखते हुए आरएलडी हमेंशा से इसी के इर्द-गिर्द अपना सियासी तानाबाना बुनती रही है, लेकिन बीजेपी के साथ जाने के बाद मुस्लिम समाज की दूरी ने
जयंत चौधरी ने अपनी सियासी चाल को बदल दिया है.
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और आरएलडी मिलकर एक साझा राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर रहे हैं. इससे संदेश दिया जा रहा है कि बीजेपी के साथ आरएलडी की सियासी दोस्ती लंबी चलेगी. ऐसे में मुस्लिमों के बजाय दूसरे वोटों पर अपना फोकस किया है. 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब एकतरफा तौर पर सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ जा रहा है.
जयंत चौधरी को यह अहसास हो चुका है कि यदि पुराने ढर्रे पर रहे और जाट मुस्लिम समीकरण पर भरोसा किए रहे तो उनका राजनीतिक गेम 2027 के विधानसभा चुनाव में बिगड़ जाएगा. इसलिए उन्होंने अपनी सोशल इंजीनियरिंग को पूरी तरह बदलने का फैसला किया. मुस्लिम वोटों के बजाय ब्राह्मण, त्यागी और गुर्जर वोटों के समीकरण बनाने में जुटे हैं.
जाट-मुस्लिम पॉलिटिक्स से क्यों बाहर निकले जयंत
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब 80 से 90 विधानसभा सीटें आती हैं, जहां पर जाट, ब्राह्मण और त्यागी समाज अहम हैं. जाट समाज आरएलडी का पारंपरिक कैडर और कोर वोटर हैं, जो हर हाल में चौधरी परिवार के साथ खड़ा रहता है. अपने इस मजबूत आधार को सवर्ण जातियों के साथ जोड़कर एक अजेय बढ़त बनाना है. पश्चिमी यूपी की शहरी और अर्ध-शहरी सीटों पर बेहद निर्णायक और वैचारिक रूप से मजबूत यह जाति बीजेपी के साथ रहा है.
पश्चिमी यूपी में त्यागी भी काफी अहम और बेहद प्रभावशाली. समृद्ध भूमिहार-किसान वर्ग, जो लंबे समय से कुछ मुद्दों पर नाराज चल रहा था. केसी त्यागी जैसे नेताओं का आरएलडी में आने के बाद नया तिकड़ी बनता दिख रहा है. त्यागी समाज की नाराजगी दूर कर उन्हें किसान राजनीति के मुख्य धागे में वापस लाना. इसके अलावा बीजेपी जिस तरह से हिंदुत्व का दांव चल रही है, उसमें जयंत के लिए मुस्लिमों को साथ लेकर आसान नहीं था.
श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद और कांवड़ यात्रा जैसे मुद्दों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश का माहौल पूरी तरह से हिंदुत्व के इर्द-गिर्द सिमट रहा है. सीएम योगी जिस तरह से सपा के सॉफ्ट हिंदुत्व को काउंटर करने के लिए मथुरा का मुद्दा उठा रहे हैं, उसे चुनाव में बीजेपी आक्रामक तरीके से उठाएगी. ऐसे में जयंत चौधरी के लिए जाट-मुस्लिम वोटों के सहारे अपनी राजनीतिक नैया पार लगाना आसान नहीं होगा. इसीलिए जयंत बीजेपी के रंग में पूरी तरह से उतर गए हैं और किसान अस्मिता को सनातन और सवर्ण पहचान के साथ जोड़ना चाहते हैं.
कुबूल अहमद