उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ने के साथ ही सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. सपा और कांग्रेस भले ही एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात कर रहे हों, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर राजनीतिक खींचतान जारी है. अखिलेश यादव जीत की शर्त रखकर सीट शेयरिंग करना चाहते हैं, वहीं कांग्रेस अपनी ताकत बढ़ाने के लिए व्यूह रचने में जुट गई है.
सपा से दूरी बना चुके और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाने वाले पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के संजय चौहान और अपना दल (कामेरवादी) के पंकज निरंजन जैसे नेताओं ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात की है. इन मुलाकातों ने सूबे के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है. इसे मुख्य रूप से तीन बड़े सियासी नजरिए से देखा जा रहा है.
यूपी में छोटे दलों के नेताओं को अपने साथ मिलाकर कांग्रेस अपना सियासी ताना-बाना बुन रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाना चाहती है या यह सपा से अलग होने का बैकअप प्लान है?
बार्गेनिंग पावर बढ़ाने में जुटी कांग्रेस
उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान जारी है. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद लगातार सीट शेयरिंग का मुद्दा उठा रहे हैं. कांग्रेस सूबे में बड़ी हिस्सेदारी पर मजबूती से दावा पेश करने की तैयारी में है.
अखिलेश यादव जहां कांग्रेस को सिर्फ सीमित और 'जीतने योग्य' सीटें ही देने के पक्ष में हैं, वहीं कांग्रेस छोटे क्षेत्रीय दलों और जातिगत जनाधार वाले नेताओं को जोड़कर यह संदेश देना चाहती है कि उसका आधार केवल कागजी नहीं है. स्वामी प्रसाद मौर्य, संजय चौहान और पंकज निरंजन तीनों ही गैर-यादव ओबीसी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं.
सपा ने इन नेताओं को 2022 के चुनाव में अपने साथ लेकर बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी, क्योंकि इन नेताओं का अपना जनाधार है. कांग्रेस ने इन्हें अपने पाले में लाकर नया दांव चला है. छोटे दलों को अपने साथ जोड़ने या अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाने का खाका दिखाकर कांग्रेस सीट शेयरिंग की बातचीत में सपा के सामने ज्यादा मजबूत स्थिति में मोलभाव करने की योजना बना रही है.
क्या यह कांग्रेस का बैकअप प्लान है?
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 2024 की तरह आगामी विधानसभा चुनाव में केवल सीमित सीटों पर समझौता नहीं करना चाहती, बल्कि सपा के साथ बराबर का सियासी कद चाहती है. पार्टी करीब 150 सीटों को चिह्नित कर अपनी तैयारी कर रही है और 110 से 120 सीटों पर चुनाव लड़ने का लक्ष्य रख रही है. इसी रणनीति के तहत छोटे दलों के नेताओं को साथ लाने का दांव खेला गया है.
यदि अखिलेश यादव कांग्रेस की बड़ी हिस्सेदारी की मांग को खारिज कर देते हैं और मनमुताबिक सीटें नहीं मिलती हैं, तो कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में उतरने का विकल्प भी तैयार रख रही है.
ऐसी स्थिति में कांग्रेस को प्रदेश स्तर पर मजबूत सहयोगियों और गैर-यादव ओबीसी (जैसे मौर्य, चौहान और कुर्मी/पटेल) वोटों की दरकार होगी. स्वामी प्रसाद मौर्य और संजय चौहान जैसे नेताओं को साथ लाना इसी 'प्लान-बी' का हिस्सा माना जा रहा है. अगर सपा के साथ गठबंधन सिरे नहीं चढ़ता है, तो यह तीसरा मोर्चा या कांग्रेस-नीत गठबंधन का रूप ले सकता है.
छोटे दलों का कांग्रेस से हाथ मिलाना
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले कई छोटे दल बाद में अलग हो गए थे. स्वामी प्रसाद मौर्य और संजय चौहान ने सपा से नाता तोड़कर अपनी अलग राजनीतिक राह चुन ली थी. अखिलेश यादव ने भी इस बार इन छोटे दलों से अलग से सौदेबाजी करने से दूरी बना रखी है.
यूपी में इन छोटे दलों को अपना अस्तित्व बचाने और चुनाव में अपनी शर्तें मनवाने के लिए कांग्रेस ही एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प दिख रही है. इसीलिए इन नेताओं ने राहुल गांधी से मुलाकात कर गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई है. कांग्रेस भी इन्हें सीटें देने या अपने सिंबल पर एडजस्ट करने का विकल्प देकर बड़ा राजनीतिक ताना-बाना बुन रही है.
खोई जमीन वापस पाने की कवायद
कांग्रेस का मुख्य मकसद उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करना और सपा के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय एक मजबूत साझेदार के रूप में उभरना है. नब्बे के दशक में जब कांग्रेस कमजोर हुई, तो उसका पारंपरिक मुस्लिम और दलित वोट बैंक सपा व बसपा की ओर खिसक गया था.
कांग्रेस एक बार फिर अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश में है. दलित, मुस्लिम और सवर्ण समीकरण को साधने के साथ-साथ अब पार्टी ने गैर-यादव ओबीसी वर्ग में पकड़ मजबूत करने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य और संजय चौहान जैसे नेताओं को साथ लिया है.
इस रणनीति से कांग्रेस एक तीर से दो निशाने साध रही है—पहला, सपा के साथ सीट शेयरिंग में अपनी बार्गेनिंग पावर बढ़ाना और दूसरा, गठबंधन न होने की स्थिति में राज्य में अकेले एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरना.
कुबूल अहमद