उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला कहे जाने वाले आगरा में एक नया सियासी समीकरण जन्म ले रहा है. पिछले एक महीने में आगरा के एत्मादपुर क्षेत्र में यूजीसी (UGC) के नए नियमों और आरक्षण व्यवस्था में संशोधन की मांग को लेकर एक के बाद एक तीन बड़े सवर्ण आंदोलन हो चुके हैं.
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की अगुवाई में तमाम सवर्ण संगठनों ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों के विरोध में आंदोलन एक बार फिर तेज कर दिया है. 'यूजीसी मुक्ति मोर्चा' के बैनर तले बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर अपनी मांग तेज कर रहे हैं.
आगरा के एत्मादपुर से उठी सवर्ण समाज के विरोध की चिंगारी अब सिर्फ छात्रों या संगठनों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तपिश भी बढ़ा दी है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि आगरा में तेज होता सवर्ण आंदोलन 2027 में किसकी चुनौती बढ़ाएगा?
आगरा में एक महीने में तीन सवर्ण आंदोलन
सवर्ण समाज (खासकर क्षत्रिय और ब्राह्मण युवाओं) द्वारा यूजीसी के नए नियमों ('प्रमोशन ऑफ इक्विटी') को वापस लेने और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव कर उसे आर्थिक आधार पर लागू करने की मांग को लेकर पिछले 25 दिनों में तीन आंदोलन हो चुके हैं. एक सितंबर को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के बैनर तले युवाओं ने आगरा के एत्मादपुर के मुड़ी चौराहे पर हाईवे जाम कर सांकेतिक विरोध दर्ज कराया. इसके अलावा आगरा के शहीद स्मारक पर 'सत्याग्रह' का आयोजन किया गया.
आगरा में दूसरा आंदोलन 18 सितंबर को हुआ, जब 'सिस्टम सुधार संगठन' और राष्ट्रीय करणी सेना के नेतृत्व में दर्जनों ट्रैक्टरों के साथ विरोध मार्च निकाला गया. 'सिस्टम सुधार संगठन' के अध्यक्ष अंशुमान ठाकुर और राष्ट्रीय करणी सेना के जिलाध्यक्ष प्रतीक चौहान की अगुवाई में बड़ी संख्या में सवर्ण समुदाय के लोग सड़क पर उतरे.
तीसरा आंदोलन 20 सितंबर को हुआ. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष कुंवर हरिवंश सिंह और राघवेंद्र सिंह राजू की अगुवाई में आगरा में एक बड़ा कार्यक्रम किया गया, जिसमें यूजीसी के नए नियमों को खत्म करने और आरक्षण के नियमों में बदलाव की मांग उठी.
क्षत्रिय महासभा की अगुवाई में 'यूजीसी मुक्ति मोर्चा' के आह्वान पर कलेक्ट्रेट का घेराव किया गया. इस दौरान सवर्ण समाज के युवाओं ने 200 से अधिक ट्रैक्टरों के साथ यमुना एक्सप्रेस-वे को बाधित कर दिया. आगरा पुलिस की बैरिकेडिंग और जेसीबी से रास्ता रोकने के बावजूद प्रदर्शनकारी अलग-अलग रास्तों से आगे बढ़ते हुए यमुना एक्सप्रेस-वे तक पहुंच गए, जिससे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए.
आगरा में ही क्यों सवर्ण आंदोलन तेज हो रहा?
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के महासचिव राघवेंद्र सिंह राजू ने कहा कि केंद्र सरकार ने अभी तक यूजीसी के नियमों को वापस नहीं लिया है. सवर्ण समाज से जुड़े मुद्दे पर कोई भी दल बोलने के लिए तैयार नहीं है. राजनीतिक दलों के इस रवैये की वजह से समाज में गुस्सा है, खासकर युवाओं में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है. इसीलिए हम सड़क पर उतरने के लिए मजबूर हुए हैं. हमारी राजनीतिक हिस्सेदारी कम होती जा रही है और आरक्षण की चली आ रही व्यवस्था से युवा प्रतिभा का हनन हो रहा है.
राघवेंद्र सिंह राजू कहते हैं कि आगरा को आंदोलन के लिए इसीलिए चुना गया है, क्योंकि यह जातीय राजनीति का केंद्र रहा है. इसके अलावा आगरा जिले की एत्मादपुर तहसील और खंडौली क्षेत्र उच्च जातियों, खासकर क्षत्रियों और ब्राह्मणों की घनी और संगठित आबादी वाले इलाके हैं. एत्मादपुर में क्षत्रिय बहुल 22 गांव एक-दूसरे से सटे हैं, जिन्हें 'बैसिया' के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां पर यूजीसी के नियमों को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी थी.
यह इलाका आंदोलन का केंद्र इसीलिए भी बना क्योंकि यह यमुना एक्सप्रेस-वे और आगरा-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से सटा हुआ है. जब पुलिस ने कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोका, तो उन्होंने तुरंत यमुना एक्सप्रेस-वे को अवरुद्ध कर दिया. उन्होंने कहा कि सपा सांसद रामजी लाल सुमन के बयान को लेकर पहले से ही आगरा क्षेत्र में सवर्ण जातियों में नाराजगी है, जो अब यूजीसी के नियमों को लेकर और बढ़ गई है.
आगरा के आसपास वाले फिरोजाबाद, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस और एटा में के सवर्णों की आबादी ठीक-ठाक है. 18 और 20 सितंबर को हुए ट्रैक्टर मार्चों में पड़ोसी जिलों से बड़ी संख्या में भीड़ जुटने का मुख्य कारण यही कनेक्टिविटी थी.
चुनावी तपिश के बीच सवर्णों की नाराजगी
उच्च जाति समुदाय के संगठनों की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में होने वाले हैं. संगठनों का मानना है कि चुनाव का समय ही वह वक्त होता है जब सरकार पर सबसे अधिक दबाव बनाया जा सकता है; राजनीतिक दलों के सिर पर तभी जूं रेंगती है, जब उन्हें अपनी सीट जाने का खतरा नजर आता है.
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के महासचिव राघवेंद्र सिंह राजू कहते हैं कि अगर अभी दबाव नहीं बनाया गया, तो सरकार एक नया संशोधित मसौदा ला सकती है. केंद्र सरकार यूजीसी नियमों को पूरी तरह से वापस लेने के बजाय, संशोधन करके उन्हें लागू करने का प्रयास कर सकती है. इसलिए हम लगातार आंदोलन कर सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं कि हमारे युवाओं के भविष्य को बर्बाद न किया जाए; उसके लिए यूजीसी के नियमों और आरक्षण के सिस्टम में बदलाव किया जाए. इसके अलावा हमारी मांग सियासी भागीदारी को लेकर भी है.
यूजीसी के नियमों में बदलाव को लेकर आगरा के बाद हम 20 अक्टूबर को कानपुर में बड़ा आंदोलन करेंगे. उसके बाद 25 अक्टूबर को दशहरे के मौके पर भी कार्यक्रम रखे जा रहे हैं. मैनपुरी में भी क्षत्रिय महासभा का एक बड़ा कार्यक्रम प्रस्तावित है.
2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में अब कुछ समय बचा है. सवर्ण युवाओं का मानना है कि पारंपरिक राजनीतिक दल (विशेषकर भाजपा) सवर्ण वोटबैंक को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' मानते हैं, जबकि सपा अपने 'PDA' और बसपा अपने दलित कैडर को साधने में लगी है. आगरा जैसे संवेदनशील राजनीतिक केंद्र पर आंदोलन खड़ा करके सवर्ण संगठन मुख्यधारा की पार्टियों पर अपनी अनदेखी न करने का रणनीतिक दबाव बना रहे हैं.
'दलित प्रयोगशाला' में सवर्णों की लामबंदी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगरा में सवर्णों की यह लामबंदी 2027 के चुनाव में मुख्य राजनीतिक धड़ों के समीकरण बिगाड़ सकती है. आगरा शहर को जाटव/दलित राजनीति का गढ़ माना जाता है, लेकिन जिले के ग्रामीण और बाहरी क्षेत्रों में सवर्ण मतदाताओं की भी अच्छी-खासी संख्या है. डॉ. आंबेडकर से लेकर कांशीराम तक ने दलित राजनीति के लिए आगरा को चुना था; अब सवर्ण समाज उसी इलाके से हुंकार भरकर अपनी ताकत दिखा रहा है.
सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के बयान के बाद आगरा का माहौल सियासी रूप से सवर्ण बनाम दलित में पहले ही तब्दील हो चुका है. आगरा जिले में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 23 फीसदी है, जिसमें जाटव सबसे ज्यादा हैं. वहीं, पश्चिमी यूपी और खासकर आगरा बेल्ट में सवर्ण मतदाता, विशेषकर क्षत्रिय और ब्राह्मण, भाजपा का पारंपरिक वोटबैंक माने जाते हैं.
यूजीसी एक्ट और आरक्षण नीतियों को लेकर जिस तरह सवर्ण समाज का गुस्सा सड़कों पर दिखा है, उससे बीजेपी के लिए अपने इस कोर वोटबैंक को साधे रखना बड़ी चुनौती बन सकता है. ऐसे में बीजेपी के लिए स्थिति 'एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाईं' जैसी है. अगर वह सवर्णों के साथ खड़ी होती है तो दलित और ओबीसी नाराज हो सकते हैं, और अगर चुप रहती है तो कोर वोटबैंक के छिटकने का डर है.
सपा का दलित सम्मेलन आगरा से शुरू होगा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला आगरा जैसे दलित बहुल जिले में पैठ बनाने की कोशिश में है. आगरा में 15 नवंबर को सपा दलित सम्मेलन का आयोजन करने जा रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आगरा दलितों, विशेषकर जाटवों के बड़े प्रभाव वाला क्षेत्र है और यहां से निकलने वाला सियासी संदेश दूर तक जाएगा. सम्मेलन में सपा प्रमुख अखिलेश यादव मौजूद रहेंगे; यह सीधे उस समूह तक पहुंचने का प्रयास है जो लंबे समय तक बसपा की सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन रहा है.
सपा के लिए चुनौती सिर्फ बसपा से दलित वोट खींचने की नहीं है, बल्कि भाजपा की गैर-जाटव दलितों में बनी पैठ को भी कमजोर करने की है. आगरा बसपा का गढ़ रहा है, लेकिन मायावती के राजनीतिक ढलान के साथ कमजोर हुआ है. आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि यदि यूजीसी के नियमों में संशोधन नहीं किया गया और आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं बनाया गया, तो यह आंदोलन केवल आगरा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलेगा.
2027 के चुनाव से पहले 'दलितों की प्रयोगशाला' आगरा में सवर्ण समाज की यह लामबंदी इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण एक नया मोड़ लेने वाले हैं.
कुबूल अहमद