बांकीपुर में PK की जीत का यूपी में क्या होगा असर, बदलेगा ब्राह्मण वोट बैंक का मिजाज?

बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है. बीजेपी के गढ़ में हुई इस हार के बाद समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र जयंती पर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कर पीडीए की नई व्याख्या करते हुए ब्राह्मणों को साधने की कवायद शुरू कर दी है.

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बांकीपुर में पीके की जीत से यूपी में बदलेंगे समीकरण. (photo: ITG) बांकीपुर में पीके की जीत से यूपी में बदलेंगे समीकरण. (photo: ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 9:09 PM IST

बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत के बाद उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. लंबे वक्त तक बीजेपी का अभेद्य किला मानी जाने वाली बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की जीत के बाद ये माना जा रहा है कि बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक में बिखराव हुआ है.

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इस चुनावी नतीजे के तुरंत बाद समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में जनेश्वर मिश्र जयंती के अवसर पर ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन किया, जिसके राजनीतिक मायने बिल्कुल साफ हैं 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सपा बीजेपी के परंपरागत ब्राह्मण वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने की जुगत में है.

बांकीपुर का चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक विश्लेषणों में ये दावा किया जा रहा है कि बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोटरों ब्राह्मण, भूमिहार, ठाकुर, कायस्थ और बनिया समुदाय के एक हिस्से ने पार्टी से दूरी बनाई. अगर ये ट्रेंड आगे बढ़ता है तो इसका असर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी दिखाई दे सकता है, जहां 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं.

इसी वजह से अब सवाल उठने लगा है कि क्या बांकीपुर का राजनीतिक मैसेज उत्तर प्रदेश तक पहुंचेगा और क्या समाजवादी पार्टी इसी आधार पर नया चुनावी नैरेटिव बनाने की कोशिश करेगा.

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सपा का ब्राह्माण वोट बैंक पर फोकस

समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. बांकीपुर के नतीजों के कुछ ही दिनों बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र की जयंती पर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी. अब तक अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन इस सम्मेलन में उन्होंने पीडीए की नई व्याख्या करते हुए कहा कि 'पी' का मतलब पंडित भी है. उन्होंने ये भी कहा कि ब्राह्मण समाज भी खुद को पीड़ित महसूस कर रहा है.

अखिलेश यादव अब ब्राह्मण को जोड़ने की हर संभव कोशिश में जुटे हैं, यही वजह है कि उन्होंने भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की पौराणिक कहानी का भी जिक्र अपने भाषण में किया, जिसमें यदुवंशियों और गरीब ब्राह्मण की कहानी घर-घर में प्रचलित है. जिस PDA को अखिलेश यदव ने पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक या आधी आबादी का रखा था, अब उसके PD को उन्होंने पंडित शब्द दे दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी अब अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ-साथ सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मणों के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में ये सम्मेलन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 की चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

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क्या बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश सफल होगी?

उत्तर प्रदेश में 2014 के बाद से ब्राह्मण समेत ज्यादातर सवर्ण वर्ग बीजेपी के सबसे मजबूत समर्थकों में रहे हैं. कई राजनीतिक विवादों और एनकाउंटर जैसे मुद्दों के बावजूद ये वोट बैंक बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ बना रहा. हालांकि, बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों और बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने विपक्ष को ये भरोसा दिया है कि सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनाई जा सकती है.

इसी रणनीति के तहत समाजवादी पार्टी लगातार ब्राह्मणों को साधने की कोशिश करती दिखाई दे रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी अपने परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को पूरी तरह अपने साथ बनाए रख पाएगी या फिर विपक्ष 2027 के चुनाव से पहले नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण खड़ा करने में सफल हो पाएगा. आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा फोकस इसी सवाल पर रहने वाला है.

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