'रोल्स रॉयस में बैठकर भी शांति नहीं...' हेल्थवेल्थ सम‍िट में च‍िदानंद सरस्वती ने बताया असली सुख का राज

HealthWealth Summit 2026 में स्वामी चिदानंद सरस्वती ने आधुनिक लाइफस्टाइल और भौतिक सुखों पर तीखा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि इंसान चाहे रोल्स-रॉयस जैसी लग्जरी गाड़ी में घूम ले, लेकिन अगर भीतर शांति नहीं है, तो सब व्यर्थ है. असली सुख मेडल या गाड़ियां जुटाने में नहीं, बल्कि खुद को जानने और भीतर के सुकून में है.

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Viksit Uttarakhand 2026 Swami Chidanand Saraswati Viksit Uttarakhand 2026 Swami Chidanand Saraswati

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई द‍िल्ली ,
  • 29 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:42 PM IST

क्या पैसे, शोहरत और दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएं पाकर इंसान वाकई खुश हो जाता है? नोएडा फिल्म सिटी में चल रहे आजतक हेल्थ वेल्थ के मंच पर जब 'मेंटल पीस- ओम शांति ओम' सत्र की शुरुआत हुई, तो परमहंस निकेतन के अध्यक्ष व आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिदानंद सरस्वती ने इस सवाल का बेहद बेबाक जवाब दिया.

उन्होंने दुनिया भर के रईसों और बड़ी हस्तियों का उदाहरण देते हुए बताया कि लोग रोल्स-रॉयस जैसी गाड़ियों में तो बैठते हैं, लेकिन मॉडल पुराना होने पर बेचैन हो जाते हैं यानी भौतिक चीजें कभी स्थाई शांति नहीं दे सकतीं. स्वामी जी ने दो टूक कहा कि आज का यूथ 'ह्यूमन बीइंग' से बदलकर 'ह्यूमन डूइंग' बन गया है, जो सिर्फ भाग रहा है. असली सुख और मानसिक शांति बाहरी चमक-दमक में नहीं, बल्कि भीतर की दुनिया को टटोलने और 'बी मोर' (बेहतर इंसान बनने) में छिपी है.

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स्वामी चिदानंद सरस्वती ने आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, सोशल मीडिया के भ्रम और मानसिक अशांति पर खुलकर बात की. उन्होंने मंच से एक बेहद कड़वा सच साझा करते हुए बताया कि कैसे तकनीक हमारी जिंदगी को कंट्रोल कर रही है और हमें इससे बाहर निकलने की जरूरत है. आइए जानते हैं स्वामी चिदानंद सरस्वती के उन बड़े और जीवन बदल देने वाले संदेशों को, जिन्होंने इस समिट में मेंटल हेल्थ पर कई जरूरी जानकार‍ियां दीं. 

'सुबह उठते ही मोबाइल देखना यानी दिन की गलत शुरुआत' 

मोबाइल और स्क्रीन एडिक्शन पर प्रहार करते हुए स्वामी जी ने दो टूक कहा कि सवेरे-सवेरे उठकर सबसे पहले मोबाइल देखने का मतलब है कि आप अपने दिन की शुरुआत गलत दिशा में कर रहे हैं. आप कोई शेयर मार्केट नहीं संभाल रहे हैं कि एक सेकंड की चूक से सब गड़बड़ हो जाएगा! उठते ही जो पहला मैसेज या नोटिफिकेशन आता है, वह आपके अंदर एक रिएक्शन (प्रतिक्रिया) पैदा कर देता है और आपका मन अशांत हो जाता है.

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उन्होंने सलाह दी कि रात को सोने से कम से कम एक घंटा पहले और सुबह उठने के कुछ समय तक मोबाइल को खुद से दूर रखना बेहद जरूरी है. गैजेट्स हमारे टूल (औजार) हैं, लेकिन जब वे हमें ही कंट्रोल करने लगें, तो समझ लीजिए कि हम खतरे में हैं.

'हम ह्यूमन बीइंग से 'ह्यूमन डूइंग' बन गए हैं' 

आधुनिक लाइफस्टाइल पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि आज इंसान का जीवन सिर्फ 'करने' (Doing, Doing, Doing) तक सीमित रह गया है पैसा कमाना, भागना, दौड़ना, चीजें इकट्ठा करना. उन्होंने कहा, "जिंदगी सिर्फ 'हैव मोर' (ज्यादा पाने) का नाम नहीं है, बल्कि 'बी मोर' (बेहतर इंसान बनने) का नाम है. आज के यूथ की हालत यह है कि 22 साल की उम्र में भी बच्चे कहते हैं 'आई एम डन, सब देख लिया, कुछ नहीं बचा.' क्यों? क्योंकि वे भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में थक चुके हैं.

10 साल की उम्र में छोड़ा था घर, जंगल में सीखी जीने की कला

अपने संस्मरण साझा करते हुए स्वामी जी ने बताया कि वे महज 10 साल की उम्र में अपना परिवार छोड़कर हिमालय चले गए थे. वहां जंगलों में उन्होंने संतों और सीयर्स (ऋषियों) के बीच कड़ा जीवन बिताया. उन्होंने कहा, "वहां न कोई amazon.com था, न रेस्टोरेंट, न शॉपिंग सेंटर. मॉनसून में 6x8 की झोपड़ी में पानी टपकता था. भिक्षा मांगने पर कई लोग अपमानित भी करते थे. लेकिन मैंने वहां सीखा कि 'इंसल्ट' (अपमान) को कैसे सहन किया जाता है. अगर आप किसी के द्वारा भेजे गए अपमान को स्वीकार कर लेते हैं, तो वह आपको चुभता है; अगर आप उसे स्वीकार ही न करें, तो वह वापस भेजने वाले के पास लौट जाता है.

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रोलरॉयस में बैठने वाले भी क्यों हैं अशांति के शिकार?

अपनी एक पुरानी अमेरिकी यात्रा का किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि वे रोल्स रॉयस गाड़ी में घूम रहे थे, लेकिन साथ बैठा शख्स इसलिए दुखी था क्योंकि उसे पुराना मॉडल मिल गया था, नया मॉडल चाहिए था. स्वामी जी ने कहा कि जिंदगी सिर्फ गाड़ियां या मेडल इकट्ठे करने का नाम नहीं है. मेडल दीवारों पर टंगे रह जाते हैं, लेकिन अंदर से आत्मा चमकनी चाहिए. आज दुनिया भर के बड़े-बड़े लीडर्स (चाहे ओबामा हों या अन्य दिग्गज) जब मेरे पास आते हैं, तो सबके पास सब कुछ होता है, लेकिन एक ही चीज की कमी होती है, 'शांति'. 

अकेलापन और डिप्रेशन का तोड़: रोज अपनी 'बैलेंस शीट' बनाओ

बढ़ते अकेलेपनऔर कम उम्र में बच्चों में आ रहे स्ट्रेस पर चिंता जताते हुए स्वामी जी ने एक अचूक फॉर्मूला दिया. उन्होंने कहा कि जैसे एटीएम में पैसे देखते हैं, वैसे ही हर रात सोने से पहले अपनी 'आंतरिक बैलेंस शीट' बनाइए. उसमें ये सेगेमेंट रख‍िए कि आज दिनभर में मेरे भीतर क्या चला? और मैंने क्या अच्छा किया और कहाँ गलती की?

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सादगी भरा संदेश देते हुए कहा कि जिंदगी को जबरदस्ती मत जियो, मस्ती में जियो. शरीर और मन को आराम दो, क्योंकि बाहरी दुनिया की हर चमक फीकी है, अगर आपके भीतर का सुकून जिंदा नहीं है. 

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