अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन ने एक नई सीक्रेट यानी क्लासीफाइड परमाणु रणनीति का ड्राफ्ट तैयार किया है. इस रणनीति का नेतृत्व पेंटागन के नीति प्रमुख कर रहे हैं. इसमें पारंपरिक बड़े परमाणु हमलों की जगह कम ताकत वाले टैक्टिकल परमाणु हथियारों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है.
ये हथियार क्षेत्रीय संघर्षों में इस्तेमाल के लिए उपयुक्त माने जाते हैं. यह बदलाव फरवरी 2026 में न्यू स्टार्ट संधि समाप्त होने के बाद सामने आया है. साथ ही चीन के परमाणु भंडार में तेजी से वृद्धि और रूस के पास अनुमानित दो हजार गैर-रणनीतिक वॉरहेड्स की मौजूदगी ने भी इस नई सोच को बढ़ावा दिया है.
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यह रणनीति अब भी पूरी तरह गुप्त है, लेकिन मौजूद जानकारी के अनुसार इसका मकसद अमेरिकी नेताओं को ज्यादा सटीक और सीमित विकल्प उपलब्ध कराना है. बड़े शहरों या पूरे देशों को निशाना बनाने वाले विशाल रणनीतिक हमलों के बजाय छोटे स्तर के संघर्षों में नियंत्रित प्रतिक्रिया देने की क्षमता विकसित करने पर जोर है.
अमेरिका यूरोप में पहले से करीब 100 सामरिक परमाणु बम तैनात कर चुका है. नई रणनीति इनकी भूमिका को और महत्वपूर्ण बना सकती है.
न्यू स्टार्ट संधि का अंत और बदलती दुनिया
न्यू स्टार्ट संधि अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों की संख्या सीमित रखने वाला अंतिम समझौता था. फरवरी 2026 में इसके समाप्त होने के बाद दोनों देशों पर कोई सीमा नहीं रह गई. इस खालीपन ने नई होड़ की आशंका बढ़ा दी है.
रूस के पास गैर-रणनीतिक यानी टैक्टिकल परमाणु हथियारों का बड़ा भंडार बताया जाता है, जिसकी संख्या करीब दो हजार है. ये हथियार मुख्य रूप से क्षेत्रीय युद्धों के लिए रखे गए हैं. दूसरी तरफ चीन अपनी परमाणु क्षमता का तेजी से विस्तार कर रहा है. पहले जहां चीन का भंडार सीमित माना जाता था, वहां अब वह तीसरे बड़े परमाणु शक्ति के रूप में उभर रहा है.
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रूस और चीन, दोनों ने अमेरिका को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर किया. पेंटागन का मानना है कि पुरानी रणनीति जो मुख्य रूप से बड़े पैमाने के हमलों पर आधारित थी, अब क्षेत्रीय चुनौतियों का पर्याप्त जवाब नहीं दे पाती.
टैक्टिकल परमाणु हथियारों का मतलब
सामरिक परमाणु हथियार रणनीतिक हथियारों से छोटे होते हैं. उनकी विस्फोटक शक्ति कम होती है. इन्हें युद्ध के मैदान में सीमित लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए बनाया जाता है. नई रणनीति का लक्ष्य यह है कि अगर कोई क्षेत्रीय संघर्ष बढ़े तो अमेरिकी नेता पूरे परमाणु युद्ध की ओर बढ़े बिना सीमित जवाब दे सकें. इससे निर्णय लेने वालों के पास ज्यादा विकल्प होंगे.
समर्थक दलील देते हैं कि यह दृष्टिकोण परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की बाधा को कम नहीं बल्कि नियंत्रित करता है. अगर दुश्मन जानता है कि अमेरिका के पास सिर्फ बड़े हमले का विकल्प है तो वह छोटे स्तर पर दबाव बना सकता है. लेकिन कम शक्ति वाले हथियार होने से अमेरिका सटीक जवाब दे सकता है.
बड़े संघर्ष को रोक सकता है. यूरोप में तैनात करीब एक सौ बम पहले से ही नाटो सहयोगियों को सुरक्षा कवर देते हैं. नई रणनीति इस व्यवस्था को और मजबूत कर सकती है. कई विशेषज्ञ और पर्यवेक्षक इस बदलाव को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि टैक्टिकल परमाणु हथियारों पर जोर देने से परमाणु इस्तेमाल की मानसिक बाधा कम हो सकती है.
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जब हथियार छोटे और उपयोगी लगने लगते हैं तो संघर्ष के दौरान उनके इस्तेमाल का खतरा बढ़ जाता है. एक बार परमाणु हथियार का इस्तेमाल शुरू हो जाए तो नियंत्रण रखना बहुत मुश्किल हो जाता है. स्थिति तेजी से बड़े युद्ध में बदल सकती है. आलोचक यह भी कहते हैं कि यह रणनीति परमाणु हथियारों के प्रसार को बढ़ावा दे सकती है.
अगर अमेरिका क्षेत्रीय संघर्षों में इनके इस्तेमाल की संभावना बढ़ाता है तो अन्य देश भी अपनी क्षमता बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं. रूस पहले से ही सामरिक हथियारों पर निर्भर है और चीन भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. ऐसे में नई अमेरिकी रणनीति हथियारों की होड़ को और तेज कर सकती है.
क्षेत्रीय संघर्षों पर संभावित प्रभाव
नई रणनीति का सीधा संबंध यूरोप, इंडो-पैसिफिक और अन्य क्षेत्रों से है. यूरोप में रूस के साथ तनाव के बीच सामरिक हथियार नाटो की रक्षा योजना का हिस्सा बन सकते हैं. एशिया में चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए भी अमेरिका सीमित परमाणु विकल्प रखना चाहता है. लेकिन इससे सहयोगी देशों में भी बहस शुरू हो सकती है कि क्या वे अपने क्षेत्र में ऐसे हथियारों की मौजूदगी चाहते हैं.
भारत जैसे देशों के लिए भी यह विकास महत्वपूर्ण है. वैश्विक परमाणु संतुलन बदलने से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण प्रभावित हो सकते हैं. हालांकि भारत की अपनी परमाणु नीति अलग है, लेकिन बड़ी शक्तियों के बीच होड़ का असर पूरे एशिया पर पड़ सकता है.
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पेंटागन की यह रणनीति अभी मसौदा चरण में है. अंतिम रूप लेने में समय लग सकता है. इसे लागू करने के लिए न सिर्फ तकनीकी बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक सहमति भी जरूरी होगी. कांग्रेस, सहयोगी देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया तय करेगी कि यह कितनी दूर तक जाती है.
कुल मिलाकर नई रणनीति बदलते वैश्विक हालात का जवाब देने की कोशिश है. न्यू स्टार्ट के बाद के युग में अमेरिका कम शक्ति वाले लेकिन ज्यादा उपयोगी विकल्पों की ओर बढ़ रहा है. समर्थक इसे व्यावहारिक बताते हैं तो आलोचक इसे खतरनाक मानते हैं. असली परीक्षा इस बात में होगी कि क्या ये विकल्प संघर्ष को नियंत्रित रखते हैं. नई अनिश्चितताएं पैदा करते हैं. वैश्विक सुरक्षा के लिए यह बदलाव गहरा प्रभाव डालने वाला साबित हो सकता है.
ऋचीक मिश्रा