आजकल विश्व राजनीति में चीन की बढ़ती आक्रामकता सबसे ज्यादा चिंता का विषय है. दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप बनाना, ताइवान के पास सैन्य अभ्यास, भारत की सीमा पर घुसपैठ और पूर्वी लद्दाख में तनाव - ये सभी घटनाएं चीन के विस्तारवादी एजेंडे को दिखाती हैं.
इस आक्रामकता ने एशिया के दो प्रमुख लोकतंत्रों – भारत और जापान को पहले से कहीं ज्यादा करीब ला दिया है. दोनों देश अब QUAD जैसे मंचों पर एक्टिव हैं. रक्षा, प्रौद्योगिकी तथा इंफ्रास्ट्रक्चर में साझेदारी बढ़ा रहे हैं. यह रिश्ता सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा का भी है.
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चीन पिछले एक दशक से अपनी सैन्य शक्ति तेजी से बढ़ा रहा है. वह दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय जल मार्गों पर नियंत्रण चाहता है, जो वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं. जापान के लिए सेनकाकू द्वीपों पर विवाद और ताइवान पर दबाव सीधा खतरा है. वहीं भारत के लिए LAC पर बार-बार टकराव और CPEC के जरिए पाकिस्तान में चीन की मौजूदगी सुरक्षा चिंता बढ़ाती है.
ये घटनाएं संयोग नहीं हैं. चीन 'एक चीन' नीति और 'नौ-डैश लाइन' जैसे दावों के जरिए क्षेत्रीय संतुलन बिगाड़ रहा है. नतीजा यह कि जापान और भारत दोनों को लगा कि अगर वे अलग रहेंगे तो चीन की दादागीरी बढ़ेगी. इसलिए दोनों ने 'फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक' की सोच को मजबूत किया है, जिसमें नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर जोर है.
भारत-जापान रणनीतिक साझेदारी: चीन के खिलाफ बैलेंस
भारत और जापान के संबंध 2000 के दशक से मजबूत हो रहे हैं, लेकिन चीन की आक्रामकता ने इन्हें नई ऊंचाई दी है. दोनों देश QUAD (भारत, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया) में एक्टिव हैं, जो चीन की चुनौती का जवाब माना जाता है. जापान भारत में बुलेट ट्रेन, इंफ्रास्ट्रक्चर और अंडमान और निकोबार में बंदरगाह विकास जैसे प्रोजेक्ट्स पर निवेश कर रहा है.
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रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है – संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और खुफिया जानकारी साझा करना. जापानी की प्रधानमंत्री सना तकाइची के भारते दौरे पर दोनों देशों के बीच क्रिटिकल मिनरल्स, AI और समुद्री सुरक्षा पर नई समझौते हुए हैं. चीन की वजह से भारत अब जापान को सिर्फ आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि रणनीतिक काउंटर-वेट मानता है. जापान भी भारत को इंडो-पैसिफिक में स्थिर शक्ति के रूप में देखता है.
टोक्यो की 'जीरो वेपन' पॉलिसी में बड़ा बदलाव
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने शांतिवादी संविधान अपनाया. Article 9 के तहत जापान ने युद्ध छेड़ने का अधिकार त्याग दिया और सिर्फ आत्मरक्षा बल (JSDF) रखा. 'जीरो वेपन' या घातक हथियार निर्यात न करने की नीति इसी शांतिवाद का हिस्सा थी. दशकों तक जापान ने सिर्फ गैर-घातक सामग्री निर्यात की.
लेकिन 2026 में प्रधानमंत्री सना तकाइची की सरकार ने इस नीति को पूरी तरह बदल दिया. अब जापान घातक हथियारों – मिसाइल, युद्धपोत, लड़ाकू ड्रोन आदि का निर्यात कर सकता है. यह बदलाव चीन और उत्तर कोरिया की बढ़ती धमकी का सीधा नतीजा है. जापान अपना रक्षा बजट बढ़ाकर GDP का 2% कर रहा है और Article 9 में संशोधन की भी चर्चा है.
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यह बदलाव जापान को सामान्य देश बनाने की दिशा में है, जहां वह अपने सहयोगियों (भारत, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका) को हथियार दे सके और रक्षा उद्योग मजबूत कर सके. चीन ने इसे 'मिलिटराइजेशन' बताया है, लेकिन जापान इसे 'शांति बनाए रखने के लिए जरूरी' कदम मानता है.
बदलाव के पीछे मुख्य कारण
चीन की सैन्य आधुनिकीकरण, ताइवान पर दबाव और समुद्री आक्रामकता ने जापान को मजबूर किया. उत्तर कोरिया के मिसाइल टेस्ट भी खतरा बढ़ाते हैं. जापान अब अकेले नहीं लड़ सकता, इसलिए वह गठबंधनों को मजबूत कर रहा है. भारत के साथ संबंध बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा है.
भारत के लिए भी चीन की सीमा पर तनाव और हिंद महासागर में बढ़ती मौजूदगी चिंता का विषय है. दोनों देश आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर हैं, लेकिन सुरक्षा में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. QUAD में सहयोग, द्विपक्षीय रक्षा समझौते और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप इसी दिशा में हैं.
भारत-जापान साझेदारी मजबूत हो रही है, लेकिन चुनौतियां भी हैं. भारत गुटनिरपेक्ष नीति और रूस-चीन संबंधों के कारण पूर्ण सैन्य गठबंधन से बचता है. जापान अमेरिका पर निर्भर है, लेकिन ट्रंप जैसे नेताओं की अनिश्चित नीतियों से चिंतित है. फिर आर्थिक सुरक्षा, सप्लाई चेन मजबूती, समुद्री निगरानी और क्लाइमेट चेंज जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा. अगर चीन अपनी आक्रामकता जारी रखता है तो भारत-जापान का रिश्ता और गहरा होगा.
यह साझेदारी एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है. दोनों लोकतांत्रिक देश नियम-आधारित व्यवस्था की रक्षा कर रहे हैं, न कि किसी के खिलाफ ब्लॉक बना रहे हैं.
ऋचीक मिश्रा