चीन के पास 1800 लड़ाकू विमान, फिर भी भारत से हवाई जंग में क्यों पिछड़ सकता है ड्रैगन?

हवाई जंग में सिर्फ लड़ाकू विमानों की गिनती काम नहीं आती. वे कहां से उड़ान भरते हैं और कितने हथियार ले जा सकते हैं, यह भी मायने रखता है. तिब्बत के ऊंचे एयरबेस चीन के लिए चुनौती क्यों बन सकते हैं?

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भारतीय वायु सेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कि तिब्बत से हमला करना चीन के लिए क्यों मुश्किल होगा. (Photo: ITG) भारतीय वायु सेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कि तिब्बत से हमला करना चीन के लिए क्यों मुश्किल होगा. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 28 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

चीन के पास 1800 से ज्यादा लड़ाकू विमान हैं, जबकि भारतीय वायु सेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रन की संख्या जरूरत से कम है. इसके बावजूद भारत को चीन के खिलाफ हवाई मुकाबले में कुछ फायदे मिल सकते हैं. इसकी एक बड़ी वजह तिब्बत की ऊंचाई है. भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा है कि तिब्बत के ऊंचे एयरबेस चीन के विमानों की क्षमता पर असर डालते हैं. यहां से उड़ान भरने पर विमान कम हथियार ले जा पाते हैं.  उनकी रेंज भी प्रभावित हो सकती है.

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वहीं, भारत के मैदानी इलाकों में मौजूद एयरबेस से लड़ाकू विमान ज्यादा हथियार लेकर उड़ान भर सकते हैं. इससे उन्हें सीमा के पास कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, हवाई मुकाबले में सिर्फ एयरबेस की ऊंचाई या विमानों की संख्या से जीत तय नहीं होती. विमानों की तकनीक, हथियार और पायलटों की ट्रेनिंग भी अहम होती है.

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तिब्बत समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर स्थित है. यहां हवा पतली होती है. इसका असर लड़ाकू विमानों के उड़ान भरने और काम करने की क्षमता पर पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में विमान को कम हथियार लेकर उड़ान भरनी पड़ सकती है. इससे उसकी उड़ान की दूरी और हमले की क्षमता पर असर पड़ सकता है.

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विमान को उड़ान के बाद दोबारा तैयार करने में भी समय लगता है. इसमें ईंधन भरना और हथियार लगाना शामिल है. तिब्बत के ऊंचे एयरबेस से काम करने पर इस प्रक्रिया में ज्यादा समय लग सकता है. भारतीय वायु सेना प्रमुख के मुताबिक, भारत के कम ऊंचाई वाले एयरबेस इस मामले में फायदा देते हैं.

भारत के एयरबेस क्यों हैं अहम?

भारत के पास अंबाला, बठिंडा, सिरसा और चाबुआ जैसे एयरबेस हैं, जो मैदानी इलाकों में स्थित हैं. यहां से लड़ाकू विमानों को उड़ान भरने के लिए बेहतर हालात मिल सकते हैं. इन एयरबेस से विमान ज्यादा हथियार लेकर उड़ान भर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं.

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दूसरी तरफ, चीन के तिब्बत में कई एयरबेस 3,700 से 4,300 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर हैं. नगारी गुनसा एयरबेस करीब 4,274 मीटर और क्वामडो बांदा एयरबेस करीब 4,334 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं. हालांकि, चीन ने अपने एयरबेस और सैन्य सुविधाओं को बेहतर बनाया है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसके विमान ऊंचाई पर अपनी पूरी क्षमता से काम ही नहीं कर सकते.

चीन के पास ज्यादा लड़ाकू विमान

चीन की वायुसेना के पास 1800 से ज्यादा लड़ाकू विमान होने का अनुमान है. इसमें जे-20 स्टील्थ फाइटर भी शामिल हैं. इन्हें इस तरह बनाया गया है कि दुश्मन के रडार पर इनका पता लगाना मुश्किल हो. कुछ रिपोर्टों में चीन के पास करीब 500 जे-20 विमान होने का अनुमान दिया गया है, लेकिन इनकी सही संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है. भारत की स्थिति देखें तो भारतीय वायुसेना के पास करीब 29 लड़ाकू स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42.5 है. एक स्क्वॉड्रन में आमतौर पर करीब 16 से 18 विमान होते हैं. ऐसे में भारत के लिए लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाना भी जरूरी है.

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क्या भारत को मिल सकती है बढ़त?

तिब्बत की ऊंचाई भारत को हवाई ऑपरेशन में कुछ फायदे दे सकती है, लेकिन इससे चीन की ताकत कम नहीं हो जाती. चीन के पास बड़ी वायुसेना और आधुनिक लड़ाकू विमान हैं. वहीं, भारत के लिए भी बेहतर विमान, हथियार और मजबूत एयर डिफेंस जरूरी हैं.

इसलिए भारत और चीन की हवाई ताकत की तुलना सिर्फ विमानों की संख्या से नहीं की जा सकती. एयरबेस की ऊंचाई, उड़ान की दूरी, हथियार ले जाने की क्षमता और तेजी से दोबारा उड़ान भरने की तैयारी भी अहम हैं. तिब्बत की ऊंचाई भारत को फायदा दे सकती है, लेकिन किसी भी हवाई संघर्ष का नतीजा कई सैन्य और तकनीकी बातों पर निर्भर करेगा.

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