8 करोड़ खर्च, काम जीरो, सुपरनोवा प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- बिना निर्माण कहां गया पैसा?

नोएडा के सुपरनोवा प्रोजेक्ट में निवेश करने वाले हजारों होमबायर्स पिछले 14 सालों से पजेशन का इंतजार कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उम्मीद जगी थी कि काम आगे बढ़ेगा, लेकिन हालिया सुनवाई में सामने आए आंकड़ों ने सब को हैरान कर दिया है.

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₹8 करोड़ खर्च होने के बाद भी निर्माण ठप (Photo-ITG) ₹8 करोड़ खर्च होने के बाद भी निर्माण ठप (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 12 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:35 PM IST

नोएडा के बहुचर्चित सुपरटेक सुपरनोवा प्रोजेक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट में सुनवाई के दौरान होमबायर्स के वकील यू.के. उनियाल ने गंभीर सवाल उठाते हुए बताया कि एम्पावर्ड कमेटी के गठन के पिछले 8 महीनों में प्रोजेक्ट की स्थिति जस की तस बनी हुई है.

कमेटी के सदस्यों के वेतन, प्रशासनिक खर्चों और कंसल्टेंट्स की फीस के नाम पर लगभग ₹8 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक ईंट भी नहीं लगाई गई है. इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए सवाल खड़े किए हैं कि जब धरातल पर निर्माण शुरू ही नहीं हुआ, तो यह राशि किस आधार पर खर्च की गई और अपने आशियाने का इंतजार कर रहे घर खरीदारों को उनका पजेशन कब मिलेगा.

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सुपरटेक सुपरनोवा प्रोजेक्ट: कब और कैसे शुरू हुआ था?

नोएडा के सेक्टर 94 में स्थित 'सुपरनोवा' को उत्तर भारत के सबसे महत्वाकांक्षी और लग्जरी मिक्स-यूज प्रोजेक्ट्स में से एक के रूप में पेश किया गया था. इस प्रोजेक्ट की नींव मार्च 2011 में रखी गई थी, जब नोएडा प्राधिकरण ने सुपरटेक रियल्टर्स (Supertech Realtors) को करीब 70,002 वर्ग मीटर भूमि आवंटित की. प्रोजेक्ट को औपचारिक रूप से वर्ष 2012 में लॉन्च किया गया.

इस विशाल प्रोजेक्ट की मुख्य संरचनाओं में उत्तर भारत की सबसे ऊंची 300 मीटर (80 मंजिला) इमारतों में से एक 'स्पायरा' (Spira) टॉवर शामिल है, जिसके साथ नोवा ईस्ट, नोवा वेस्ट और हाइपरनोवा मॉल का निर्माण प्रस्तावित था. बिल्डर ने शुरुआत में खरीदारों से साल 2015-16 तक इन फ्लैट्स और व्यावसायिक स्पेस का पजेशन देने का वादा किया था, लेकिन यह समय-सीमा बीत जाने के वर्षों बाद भी निर्माण अधूरा पड़ा है.

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कैसे अटका सपनों का आशियाना?

साल 2012 में शुरू हुए इस निर्माण में 2017-18 तक करीब 60-70% ढांचा खड़ा कर लिया गया, लेकिन इसके बाद वित्तीय कुप्रबंधन और बैंक डिफॉल्ट्स के कारण काम ठप हो गया. दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रोजेक्ट के प्रबंधन को पुनर्जीवित करने के लिए जस्टिस एम.एम. कुमार (रिटायर्ड) की अध्यक्षता में एक 3-सदस्यीय 'एम्पावर्ड कमेटी' का गठन किया था. 

होमबायर्स का दर्द और मौजूदा स्थिति

14 साल बीत जाने के बाद भी हजारों खरीदार अपने पजेशन का इंतजार कर रहे हैं. वे एक तरफ बैंक लोन की ईएमआई भर रहे हैं और दूसरी तरफ किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं. कमेटी के गठन के बाद उम्मीद जगी थी कि कोई नया डेवलपर नियुक्त होकर रुके हुए निर्माण को पूरा करेगा, लेकिन हालिया सुनवाई में सामने आए ₹8 करोड़ के प्रशासनिक खर्च और शून्य निर्माण कार्य ने सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ होमबायर्स की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया है. कोर्ट ने अब खर्चों के ऑडिट और प्रोजेक्ट की वास्तविक प्रगति पर जवाबदेही तय करने के संकेत दिए हैं.

यह भी पढ़ें: सुपरटेक सुपरनोवा के खरीदारों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, 497 फ्लैट्स की रजिस्ट्री का रास्ता साफ

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