हर बिकते हुए मकान के पीछे एक कहानी होती है और जब देश में होने वाली कुल मकानों की बिक्री का 77% हिस्सा सिर्फ चार शहरों में सिमट जाए, तो उस कहानी को ज़रा गहराई से समझना जरूरी हो जाता है.
नौकरियों के ढेरों मौके, बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और घर खरीदने वालों की बदलती पसंद के दम पर भारत का रियल एस्टेट मार्केट कुछ गिने-चुने शहरों में ही सिमटता जा रहा है, लेकिन इन बड़े आंकड़ों के पीछे एक और कहानी चल रही है एक ऐसी कहानी जो देश के छोटे शहरों में चुपचाप आकार ले रही है.
बरसों से भारत के बड़े रियल एस्टेट मार्केट्स में ही सबसे ज़्यादा मकान बिकते आए हैं. ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि यह ट्रेंड अब और भी मजबूत हो गया है. JLL के Q1 FY26 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के टॉप 7 शहरों में बिके कुल 70,631 मकानों में से 77% बिक्री अकेले बेंगलुरु, मुंबई, पुणे और दिल्ली-NCR में हुई है.
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महंगे घरों की सेल ज्यादा
साथ ही, लोग अब महंगे मकानों की तरफ ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं. 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा कीमत वाले मकानों की बिक्री बढ़कर 71% हो गई है, जो पिछले साल 59% थी. तो सवाल यह है कि लोग इन चार शहरों की तरफ इतने आकर्षित क्यों हो रहे हैं? क्या यह सिर्फ अच्छी नौकरियों और इंफ्रास्ट्रक्चर का कमाल है, या फिर भारतीय हाउसिंग मार्केट में कुछ बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. यह कहानी आर्थिक अवसरों, बढ़ती कमाई, बदलती जीवनशैली, भरोसेमंद बिल्डरों और खरीदारों की नई पसंद की है. इसके साथ ही एक दूसरा ट्रेंड भी तेजी से जोर पकड़ रहा है टियर 2 शहर अब देश के नए ग्रोथ सेंटर बनकर उभर रहे हैं.
ये शहर क्यों छाए हुए हैं?
बेंगलुरु, मुंबई, पुणे और दिल्ली-NCR का यह दबदबा यूं ही नहीं है, ये शहर देश में रोजगार के सबसे बड़े गढ़ हैं, जिन्हें IT, फाइनेंस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का पूरा सहारा मिलता है. इसके ऊपर मेट्रो का फैलता नेटवर्क, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट्स और बेहतरीन सुविधाएं खरीदारों और बिल्डरों दोनों को अपनी ओर खींचती हैं.
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काउंटी ग्रुप के डायरेक्टर, अमित मोदी का मानना है कि मजबूत अर्थव्यवस्था और खरीदारों के भरोसे ने इन शहरों को सबसे आगे रखा है- "बेंगलुरु, मुंबई, पुणे और दिल्ली-NCR का दबदबा इसलिए बना हुआ है क्योंकि ये देश में नौकरियों के सबसे बड़े सेंटर हैं. यहां भारी निवेश हो रहा है और इंफ्रास्ट्रक्चर का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है. आज के खरीदार क्वालिटी, अच्छी लोकेशन, समय पर पज़ेशन और बिल्डर की साख को सबसे ज़्यादा तवज्जो दे रहे हैं."
हालांकि, माइक्रो मिट्टी के फाउंडर और CEO, मनोज धनोतिया का मानना है कि यह दबदबा अवसरों से ज़्यादा मार्केट के साइज की वजह से है- "77% का आंकड़ा बिल्कुल सही है, लेकिन यह मौकों का नहीं बल्कि स्केल का एकत्रीकरण है. इन चार शहरों में बड़े-बड़े बिल्डर्स हैं और सालों से ब्रांडेड प्रोजेक्ट्स बिक रहे हैं. असली बात जो इस आंकड़े के पीछे छिपी है, वो यह है कि कुल बिक्री का लगभग आधा हिस्सा तो अकेले मुंबई और बेंगलुरु का ही है."
लोग महंगे और प्रीमियम मकान क्यों खरीद रहे हैं?
भारत के हाउसिंग मार्केट में सबसे बड़ा बदलाव प्रीमियम मकानों की मांग में उछाल है. अब बड़े शहरों में 1 करोड़ रुपये से महंगे मकान सबसे ज़्यादा बिक रहे हैं. बढ़ती आमदनी, बदलती लाइफस्टाइल और महामारी के बाद बड़े घरों की चाहत ने लोगों को बजट बढ़ाने पर मजबूर किया है.
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अमित मोदी कहते हैं कि ' खरीदार अब सिर्फ सस्ते मकान नहीं ढूंढ रहे. प्रीमियम मकानों की मांग बढ़ने की वजह लोगों की बढ़ती कमाई, अच्छी लाइफस्टाइल की चाहत और आधुनिक सुविधाओं वाले बड़े और सुंदर घरों की जरूरत है, लोग अब प्रीमियम मकानों को सिर्फ रहने के लिए नहीं, बल्कि एक लंबे समय के एसेट के रूप में देख रहे हैं, जिसकी वैल्यू आगे चलकर और बढ़ेगी."
दूसरी ओर, मनोज धनोतिया एक अलग पहलू की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- "मेट्रो शहरों में बिल्डरों ने 1 करोड़ से कम के मकान बनाना ही बंद कर दिया है, क्योंकि ज़मीन और अप्रूवल की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि कम बजट में घर बनाना उनके लिए फायदे का सौदा नहीं रहा, यानी जिसे हम खरीदारों की डिमांड समझ रहे हैं, वो असल में मार्केट में आ रही सप्लाई का नतीजा है."
खरीदार कौन हैं? रहने वाले या इन्वेस्टर्स?
हालांकि महंगे और लग्जरी सेगमेंट में इन्वेस्टर्स की दिलचस्पी बनी हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि मार्केट को मुख्य रूप से असल खरीदार ही चला रहे हैं, अमित मोदी के अनुसार, डेटा दिखाता है कि लगभग 71% मांग उन लोगों से आ रही है जिन्हें खुद रहने के लिए घर चाहिए, जो यह दिखाता है कि लोग अपने घर और स्थिरता को कितनी अहमियत देते हैं. वहीं मनोज धनोतिया को लगता है कि अलग-अलग शहरों में स्थिति अलग है- बड़े शहरों में, खासकर 1.5 से 3 करोड़ रुपये और लग्जरी सेगमेंट में, इन्वेस्टर्स और अमीर लोगों की हिस्सेदारी उतनी कम नहीं है जितनी दिखाई जाती है, इसके उलट, छोटे (Tier-II) शहरों में मकान खरीदने वाले ज़्यादातर वही लोग हैं जिन्हें खुद रहना है जैसे वहां के स्थानीय नौकरीपेशा या अपने होम टाउन लौट रहे प्रोफेशन्ल्स."
इंफ्रास्ट्रक्चर: ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन
चाहे गुरुग्राम का द्वारका एक्सप्रेसवे हो, बेंगलुरु का मेट्रो नेटवर्क हो या पुणे के नए डेवलप होते इलाके, इंफ्रास्ट्रक्चर मकानों की मांग बढ़ाने वाला सबसे बड़ा जरिया बन गया है, अमित मोदी के मुताबिक, बेहतर ट्रांसपोर्ट और कनेक्टिविटी ने नए इलाकों को भी पसंदीदा आवासीय हब बना दिया है, मनोज धनोतिया कहते हैं कि यही बदलाव अब मेट्रो शहरों के बाहर भी देखने को मिल रहा है.
"इंदौर का सुपर कॉरिडोर, जयपुर का मेट्रो विस्तार, कोयंबटूर का IT कॉरिडोर और लखनऊ का एक्सप्रेसवे नेटवर्क उसी मॉडल पर चल रहे हैं, जिसने कभी गुरुग्राम और व्हाइटफील्ड को बनाया था, फर्क सिर्फ इतना है कि छोटे शहरों में जमीन अभी काफी सस्ती है और रेंटल से मिलने वाली कमाई ज़्यादा है."
क्या भारत का रियल एस्टेट मार्केट सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित हो रहा है?
भले ही आंकड़े बड़े शहरों का दबदबा दिखाते हों, लेकिन एक्सपर्ट्स छोटे और तेजी से बढ़ते Tier-II शहरों को नज़रअंदाज़ न करने की सलाह देते हैं. मनोज धनोतिया के अनुसार, पिछले पांच सालों में कई छोटे शहरों में मकानों की मांग बड़े शहरों की तुलना में कहीं ज़्यादा तेजी से बढ़ी है. वो कहते हैं- "टॉप 7 शहरों का डेटा पुराने भारत की तस्वीर दिखाता है. असली रफ्तार तो अब इंदौर, जयपुर, कोयंबटूर और लखनऊ जैसे Tier-II शहरों में है, जहां मकानों की मांग डबल-डिजिट (10% से ज़्यादा) की रफ्तार से बढ़ रही है. रियल एस्टेट की अगली बड़ी कहानी सिर्फ बांद्रा या गुरुग्राम में नहीं लिखी जाएगी. "
भारत के रियल एस्टेट मार्केट का भविष्य बड़े शहरों और छोटे शहरों के बीच की जंग नहीं होने वाला है, इसके बजाय, यह दो अलग-अलग रास्तों पर एक साथ होने वाली ग्रोथ की कहानी होगी.
(रिपोर्ट: जैसमीन आनंद)
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