देश के जाने-माने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब बांकीपुर उपचुनाव जीतकर विधायक बन गए हैं. 2014 में पीएम मोदी के लिए चुनावी रणनीतिकार के तौर पर काम किया, लेकिन उसके बाद नीतीश कुमार के साथ जुड़ गए. जेडीयू में एक समय उनकी हैसियत नंबर दो की रही, लेकिन नीतीश कुमार के साथ बहुत लंबा सफर तय नहीं कर सके.
जेडीयू से अलग होने के बाद प्रशांत किशोर ने महसूस किया कि परदे के पीछे रहकर नेताओं की मदद करने से सिस्टम नहीं बदला जा सकता. ऐसे में उन्होंने पेशेवर रणनीतिकार की भूमिका से संन्यास लेने की घोषणा कर बिहार को अपनी सियासत की प्रयोगशाला बनाने का फैसला किया.
प्रशांत किशोर ने जन सुराज अभियान के तहत बिहार की सियासी जमीन की थाह ली. जन सुराज को सियासी दल में तब्दील कर 2025 के विधानसभा चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन उनका एक भी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं सके. जन सुराज के सियासी भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे तो प्रशांत किशोर ने बीजेपी के सबसे मजबूत दुर्ग माने जाने वाले बांकीपुर उपचुनाव में उतरकर सारा गेम ही बदल दिया.
रणनीतिकार के रूप में पीक को मिली पहचान
प्रशांत किशोर ने संयुक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़कर साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय सियासत में कदम रखा. पीके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 'चुनावी रणनीतिकार'के रूप में काम किया. 'चाय पर चर्चा' और '3D रैली' जैसे इनोवेटिव कैंपेन पीके ने शुरू किया. बीजेपी को मिली जीत के हीरो नरेंद्र मोदी बनकर उभरे, लेकिन उसका श्रेय पीके की रणनीति को भी दिया गया. प्रशांत किशोर 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद तक नरेंद्र मोदी के साथ जुड़े थे, लेकिन नतीजे आने के फौरन बाद उनका ब्रेकअप हो गया.
बीजेपी के साथ ब्रेकअप के बाद प्रशांत किशोर के पास दो विकल्प थे, एक बार फिर अमेरिका लौट जाएं और कॉरपोरेट दुनिया में वापसी करें या फिर संघर्ष करें और साबित करें कि मोदी की जीत में उनका योगदान कोई मिथ नहीं था. प्रशांत किशोर ने उस समय अपनी टीम से कहा था कि अगर इस मुकाम पर लौट गए, हार गए तो इतिहास कभी हमारे योगदान को स्वीकार नहीं करेगा. तभी प्रशांत किशोर और नीतीश कुमार के बीच सियासी तार जुड़े. नीतीश और प्रशांत के बीच पहले दोस्ती हुई, नीतीश ने उनकी शर्त मान ली.
2015 का बिहार चुनाव नीतीश कुमार को जिताने में सफल होने के साथ प्रशांत किशोर की कामयाबी ने भारतीय राजनीति में नए प्रयोग के रास्ते खोल दिए. वो जिस तरह पहले नरेंद्र मोदी और फिर नीतीश कुमार को पेशेवर तरीके से चुनावी कैंपेन में मदद कर जीत दिलाई तो उनके दूसरे नेता भी प्रभावित हुए. इसके बाद उन्होंने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी (2021) और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी को जीत दिलाई.
दिल्ली के 2020 चुनाव में अरविंद केजरीवाल के लिए रणनीतिकार के तौर पर काम किया. इसके बाद तमिलनाडु में एमके स्टालिन जैसे कई बड़े नेताओं और दलों के लिए चुनावी रणनीतियां तैयार कीं और उन्हें जीत दिलाई. इस तरह से उन्हें देश का सबसे ताकतवर और सफल 'इलेक्शन रणनीतिकार' माना जाने लगा, लेकिन उसके साथ ही अपनी सियासी पारी का आगाज किया.
पीके ने जेडीयू से राजनीति में कदम रखी
प्रशांत किशोर ने परदे के पीछे से राजनीतिक दलों की जीत की रणनीति तय करने की भूमिका से निकलकर सियासी पिच पर उतरने का फैसला किया. रणनीतिकार के रोल से निकलकर जन-अथॉरिटी (जनता) के बीच जाकर चुनावी राजनीति में उतरने का फैसला किया. इसके लिए 2015 में नीतीश कुमार को सत्ता में वापसी के लिए मजबूत आधार शिला रहने के बाद प्रशांत किशोर ने जेडीयू का दामन थामा. जेडीयू में पीके की पोजिशन नीतीश कुमार के बाद नंबर दो की थी, लेकिन जेडीयू में बहुत दिनों तक रह नहीं सके.
नीतीश कुमार के साथ प्रशांत किशोर का लगभग तीन साल का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा. बीजेपी में मोदी के साथ जीत के बाद जो प्रशांत को झेलना पड़ा, वैसा ही कुछ उन्हें नीतीश के साथ झेलना पड़ा. प्रशांत के एक करीबी ने बताया था कि जेडीयू के कई बड़े नेता ने कई मौकों पर कहा था यह कल का लड़का हमको चुनाव लड़ना सिखाएगा? नीतीश कुमार के कान भरने की कोशिश की गई, जिसके बाद प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार का साथ छोड़ दिया.
परदे के पीछे से निकलकर फ्रंटफुट पर उतरे
प्रशांत किशोर ने उसी समय महसूस किया था कि सिर्फ परदे के पीछे रहकर नेताओं की मदद करने से सिस्टम नहीं बदला जा सकता. उन्होंने पेशेवर रणनीतिकार की भूमिका से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. उन्होंने बिहार की राजनीति में एक नए सियासी विकल्प की तलाश शुरू की और 'जन सुराज अभियान' की पदयात्रा निकाली.
बिहार के गांवों और कस्बों में हजारों किलोमीटर पैदल चलने के बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले औपचारिक रूप से 'जन सुराज पार्टी' का गठन किया और राज्य की व्यवस्था को बदलने का संकल्प लिया. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने जन सुराज पार्टी की ओर से 238 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए गए थे, जिनमें 236 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.
जन सुराज पार्टी को बिहार में कुल 15 लाख वोट मिले, जोकि कुल मत का 4.44 फीसदी था. बिहार में एक भी सीट उन्हें नहीं मिली, जिसके चलते जन सुराज से जुड़े नेताओं का मोहभंग होने लगा. हालांकि, चुनावी आंकड़ों का दूसरा पक्ष यह भी रहा है कि करीब 35 सीटों पर जन सुराज के उम्मीदवारों को मिले वोट, जीत-हार के अंतर से अधिक थे. यानी पार्टी कई मुकाबलों में 'वोट कटवा' नहीं, बल्कि निर्णायक फैक्टर साबित हुई. ऐसे में प्रशांत किशोर ने बिहार में अलग किसी आश्रम में रहने का फैसला किया.
बांकीपुर सीट बनी पीके की सियासी संजीवनी
प्रशांत किशोर की राजनीति पर सवाल खड़े हो रहे थे, उसी समय पटना की हाई प्रोफाइल सीट बांकीपुर खाली हो गई है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने राज्यसभा सांसद चुने जाने के बाद बांकीपुर विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया. बांकीपुर सीट को प्रशांत किशोर ने अपनी सियासी प्रयोगशाला बनाने का फैसला कर उपचुनाव ऐलान से पहले ही सक्रिय हो गए.
बांकीपुर सीट बीजेपी की सबसे मजबूत सीटों में से एक थी. 1995 से बाद से बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है. इसे भाजपा का सबसे मजबूत और अजेय गढ़ माना जाता रहा है. पीके ने अपनी पार्टी 'जन सुराज' को मजबूत करने और चुनावी राजनीति में अपनी सीधी साख साबित करने के लिए खुद उपचुनाव में बांकीपुर सीट से बतौर उम्मीदवार उतरने का ऐतिहासिक फैसला किया. बांकीपुर सीट से प्रशांत किशोर ने उतरकर एक संदेश दिया कि वह बिहार में मज़बूती से खड़े हैं.
प्रशांत किशोर क राजनीतिक जीवन का यह पहला चुनाव था. बीजेपी ने नितिन नवीन की सीट पर नीरज कुमार सिन्हा को उतारा तो आरजेडी ने 2025 में चुनाव लड़ चुकी रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया. प्रशांत किशोर ने बांकीपुर में जमीनी स्तर पर पदयात्रा और तार्किक संवाद के जरिए युवाओं और असंतुष्ट वोटरों को अपने पाले में करने सफल रहे.
बीजेपी के मजबूत दुर्ग में उतरकर पीके ने सियासी चुनौती ही नहीं बल्कि बीजेपी के सियासी हथियार से ही मात देने का तानाबाना बुना. प्रशांत किशोर ने आखिरकार बीजेपी के इस दशकों पुराने किले को ढाहते हुए बांकीपुर सीट पर शानदार जीत दर्ज की.
बिहार की सियासत में नया विकल्प बनेंगे पीके
बांकीपुर उपचुनाव की जीत की पटकथा लिखने वाले प्रशांत किशोर का यह सफर अब रणनीतिकार से सीधे बिहार के विधायक के रूप में बदल चुका है, जिसने सूबे की मुख्यधारा की राजनीति और समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है. प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में खुद उतरकर पूरे सियासी माहौल को ही बदल दिया, जो जनसुराज के लिए सियासी ऑक्सीजन से कम नहीं है.
विधायक बनने के साथ ही प्रशांत किशोर विधानसभा से लेकर सड़क तक बहुत मुखर हो जाएंगे. बिहार की विपक्ष की स्पेस को तेजी से हासिल कर सकते हैं. बीजेपी के खिलाफ भले ही प्रशांत किशोर बहुत ज्यादा मुखर न रहते हों, लेकिन सीएम सम्राट चौधरी के सबसे धुर विरोधी माने जाते हैं. ऐसे में आरजेडी की जमीनी पकड़ पर एक गहरा सवालिया निशान है.
बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि जनता अब पारंपरिक जातीय घेरेबंदी से निकलकर एक नया और तार्किक विकल्प तलाश रही थी, जो उन्हें पीके में नजर आया. प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनके दावों और कथनों में तार्किक और डेटा-आधारित बातों का पुट होना है. जब सदन के पटल पर विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर तार्किक बहस होगी, तो तेजस्वी यादव के लिए उनके तीखे अंदाज के बरअक्श खड़ा होना एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होगा.
कुबूल अहमद