बिहार के मुजफ्फरपुर में एक मंदिर है. करीब 250 साल पुराना. नाम है मां बगलामुखी पीतांबरी सिद्धपीठ... इस मंदिर की कहानी में एक ऐसी चीज है, जो इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाती है. यहां गर्भगृह के नीचे सहस्त्रदल महायंत्र स्थापित है. और बात सिर्फ इतनी नहीं है. मंदिर में मां बगलामुखी की दस भुजाओं वाली अष्टधातु की प्रतिमा है. यहां पूजा की दो पद्धतियों, वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग, का भी जिक्र मिलता है. मंदिर के पुजारियों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल और वाराणसी तक से साधक यहां पहुंचते हैं.
आखिर इस महायंत्र में ऐसा क्या खास है? मां बगलामुखी को पीतांबरी क्यों कहा जाता है? और मुजफ्फरपुर का यह मंदिर तंत्र साधना की परंपरा से कैसे जुड़ा? चलिए, कहानी शुरू से समझते हैं. पहले मंदिर की उम्र का हिसाब समझिए. मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक, इसकी कहानी करीब ढाई सौ साल पुरानी है.
यानी जब आज की तरह हर गली में बिजली नहीं थी, मोबाइल तो दूर की बात थी, तब से यहां पूजा की परंपरा चली आ रही बताई जाती है. मंदिर की स्थापना महंत अजीत कुमार प्रसाद के पूर्वज रूपल प्रसाद ने कराई थी. मां की प्रतिमा कोलकाता के कारीगरों ने बनाई थी. बाद में 1993-94 में मंदिर को मौजूदा स्वरूप देने की दिशा में काम शुरू हुआ.
मंदिर के महंत देव राज बताते हैं कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां मां की पूजा करती आई हैं. उनके मुताबिक, उनकी दादी गुरु तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध थीं. उनसे साधना सीखने के लिए कोलकाता तक से लोग आते थे. हालांकि, मंदिर की ढाई सौ साल पुरानी तारीख और शुरुआती इतिहास की स्वतंत्र पुष्टि के लिए पुराने दस्तावेजों की पड़ताल जरूरी है.
अब आते हैं मंदिर के सबसे खास हिस्से पर. गर्भगृह के नीचे सहस्त्रदल महायंत्र... नाम थोड़ा भारी है, तो इसे आसान भाषा में समझिए. भारतीय धार्मिक परंपराओं में यंत्र को पूजा और साधना से जुड़ा एक खास प्रतीकात्मक स्वरूप माना जाता है. सहस्त्रदल शब्द का संबंध हजार पंखुड़ियों वाले कमल की अवधारणा से है. मंदिर के मुख्य पुजारी बचा बाबा के मुताबिक, यहां स्थापित महायंत्र का साधना की परंपरा में खास महत्व है.
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लेकिन यहां एक बात साफ कर दें. इस महायंत्र की बनावट कैसी है, इसे कब स्थापित किया गया और इससे जुड़े कौन-कौन से अनुष्ठान होते हैं, इसकी विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं है. मां बगलामुखी को पीतांबरी क्यों कहते हैं? इसका जवाब उनके नाम में ही छिपा है. पीत यानी पीला. मां बगलामुखी की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व माना जाता है. मंदिर में श्रद्धालु हल्दी, दही और दूब चढ़ाते हैं.
गुरुवार को भी यहां खास तौर पर लोग पहुंचते हैं. नवरात्र में मंदिर का माहौल और व्यस्त हो जाता है. पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के लिए श्रद्धालु जुटते हैं. धार्मिक मान्यताओं में मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में शामिल किया जाता है. उनकी उपासना को संकटों का सामना करने, शत्रुओं पर विजय और वाणी पर नियंत्रण जैसी मान्यताओं से जोड़ा जाता है. ये आस्था से जुड़ी धारणाएं हैं.
मंदिर के मुख्य पुजारी बचा बाबा के मुताबिक, यहां दोनों पद्धतियों से पूजा होती है. तंत्र का नाम आते ही अक्सर लोगों के दिमाग में रहस्य, चमत्कार वाले दृश्य घूमने लगते हैं. लेकिन तंत्र परंपरा इससे कहीं ज्यादा विविध है. इसमें अलग-अलग संप्रदाय, ग्रंथ, प्रतीक और साधना-पद्धतियां शामिल हैं. वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग को भी इसी परंपरा की अलग-अलग धाराओं के रूप में समझा जाता है. दोनों के अनुष्ठान और धार्मिक व्याख्याएं एक जैसी नहीं होतीं.
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मुजफ्फरपुर के इस मंदिर में इन पद्धतियों के तहत वास्तव में कौन-कौन से अनुष्ठान किए जाते हैं, इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है. इतना जरूर है कि मंदिर के पुजारी इसकी पहचान तंत्र साधना की पुरानी परंपरा से जोड़ते हैं.
मुजफ्फरपुर के इस मंदिर तक दूसरे राज्यों से लोग क्यों आते हैं? महंत देव राज के मुताबिक, पश्चिम बंगाल और वाराणसी समेत अलग-अलग जगहों से साधक यहां पहुंचते हैं. वह बताते हैं कि उनके परिवार की पिछली पीढ़ियों के समय भी दूर-दूर से लोग साधना के लिए आते थे. मंदिर के लिए यह सिर्फ पुरानी इमारत की कहानी नहीं है. इसके साथ परिवार की परंपरा, पूजा-पाठ का सिलसिला और श्रद्धालुओं का भरोसा जुड़ा है.
आखिर में बात इतनी सी है. किसी मंदिर की पहचान सिर्फ उसकी उम्र से नहीं बनती. उसकी पहचान उन कहानियों से भी बनती है, जिन्हें लोग पीढ़ियों तक अपने साथ लेकर चलते हैं. मुजफ्फरपुर के मां बगलामुखी मंदिर की कहानी में भी यही तीन चीजें साथ दिखाई देती हैं. करीब ढाई सौ साल पुरानी बताई जाने वाली परंपरा, गर्भगृह के नीचे स्थापित सहस्त्रदल महायंत्र और तंत्र साधना से जुड़ी मान्यताएं. बाकी, इन मान्यताओं के पीछे का इतिहास कितना पुराना है और महायंत्र की वास्तविक कहानी क्या है, इसका जवाब पुराने दस्तावेजों और जानकारों की पड़ताल से ही मिलेगा.
मणि भूषण शर्मा