मां बगलामुखी (Maa Bagalamukhi) हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में से एक मानी जाती हैं. उन्हें देवी शक्ति का एक स्वरूप माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं और तांत्रिक परंपराओं में बगलामुखी देवी का विशेष स्थान है. उन्हें बगला देवी और पीतांबरा देवी के नाम से भी जाना जाता है. उनकी पूजा से जुडी परंपराएं भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित हैं.
मां बगलामुखी देवी का नाम संस्कृत में बगलामुखी लिखा जाता है. उनके नाम की व्याख्या अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में मिलती है. कुब्जिका तंत्र में बगला शब्द के तीन अक्षरों के आधार पर उनके नाम का अर्थ बताया गया है. इसमें ब अक्षर को वारुणी, ग अक्षर को सिद्धि प्रदान करने वाली शक्ति और ल अक्षर को पृथ्वी तथा चेतना से जोडा गया है. हालांकि, इन अर्थों की व्याख्या धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.
मां बगलामुखी की प्रतिमा सामान्य रूप से पीले वस्त्रों और पीले आभूषणों से सुसज्जित दिखाई जाती है. उन्हें पीले फूलों की माला पहने हुए भी दर्शाया जाता है. उनकी प्रतिमा के दो प्रमुख रूप प्रचलित हैं. पहले रूप में उनके दो हाथ होते हैं, जबकि दूसरे रूप में चार हाथों का वर्णन मिलता है. दो हाथों वाले स्वरूप में देवी के एक हाथ में गदा और दूसरे हाथ से एक असुर की जीभ पकडे हुए दिखाया जाता है. धार्मिक चित्रों में इस दृश्य को शत्रु की वाणी और शक्ति को रोकने के प्रतीक के रूप में समझा जाता है. कुछ वर्णनों में उनके माथे पर अर्धचंद्र और तीसरी आंख का भी उल्लेख मिलता है.
मां बगलामुखी देवी के प्रमुख मंदिर भारत के कई राज्यों में स्थित हैं. हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले के बनखंडी में उनका प्रसिद्ध मंदिर है. मध्य प्रदेश के दतिया में श्री पीतांबरा पीठ स्थित है. इसी राज्य के नलखेडा में भी बगलामुखी देवी का सिद्धपीठ है. तेलंगाना के शिवमपेट में श्री बगलामुखी शक्ति पीठम स्थित है. आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के चंदोले में भी उनकी पूजा की जाती है.
इसके अलावा असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या मंदिर परिसर में बगलामुखी देवी से जुडा धार्मिक स्थल है. उत्तराखंड के बुगिलाधार और नेपाल के ललितपुर में भी उनके मंदिर हैं. पंजाब के लुधियाना में मां बगलामुखी धाम स्थित है. इन मंदिरों में श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.
बिहार के मुजफ्फरपुर में मां बगलामुखी का करीब 250 साल पुराना मंदिर है. यहां गर्भगृह के नीचे सहस्त्रदल महायंत्र स्थापित है और मां की दस भुजाओं वाली अष्टधातु की प्रतिमा विराजमान है. मंदिर के पुजारियों के मुताबिक, यहां वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग, दोनों पद्धतियों से पूजा होती है. पश्चिम बंगाल और वाराणसी समेत दूर-दूर से साधक यहां क्यों पहुंचते हैं? जानिए इस प्राचीन मंदिर की कहानी.
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