Ethanol From Human Hair: बाल अब तक सिर की शोभा बढ़ाते थे. कटे, तो कूड़ेदान में पहुंचे. अब तक बाल कटवाने के बाद लोग नाई को पैसे देते थे. लेकिन गुजरात के एक स्टार्टअप का दावा सही निकला, तो हो सकता है कल यही कटे हुए बाल पेट्रोल की टंकी तक पहुंच जाएं. जी हां, इंसानों के बालों से इथेनॉल बनाने की तकनीक विकसित करने का दावा किया गया है. सोचिए, जिन बालों को अब तक झाड़ू लगाकर कूड़ेदान में पहुंचा दिया जाता था, वो पेट्रोल में जान फूंकने के काम आ सकते हैं.
भारत को पेट्रोल में मिलाने के लिए इथेनॉल चाहिए और उसके लिए गन्ने-अनाज की जरूरत पड़ती है. अब बालों से यह जरूरत कितनी पूरी होगी, यह बड़ा सवाल है. क्योंकि बालों से आखिर कितना इथेनॉल बनेगा, कितने रुपये में बनेगा और क्या यह फैक्ट्री तक पहुंच पाएगा. इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं. यानी फिलहाल दावा बड़ा है, लेकिन असली परीक्षा बाकी है.
गुजरात के स्टार्टअप का दावा
गुजरात की कंपनी टेक्नोफेस्ट ग्लोबल (Techofest Global) का कहना है कि उसने बायोमेकरज़ (Biomakerz) के साथ मिलकर यह टेक्नोलॉजी डेवलप की है. कंपनी के मुताबिक, इस प्रोसेस को 5G SAFE नाम दिया गया है. इसका परीक्षण करीब 100 लीटर क्षमता वाली एक रिसर्च फैसिलिटी में किया गया है. कंपनी ने इस टेक्नोलॉजी में एक फेज में कच्चे माल के ट्रीटमेंट के बाद फर्मेंटेशन के प्रोसेस की बात कही है.
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स्टार्टअप का दावा है कि इस प्रोसेस में इस्तेमाल होने वाले बायोकैटेलिस्ट का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा दोबारा प्राप्त किया जा सकता है. बायोकैटेलिस्ट एक ऐसा पदार्थ होता है, जो केमिकल और बायोलॉजिकल रिएक्शन को आगे बढ़ाने में मदद करता है. कंपनी ने इस्तेमाल किए गए कुकिंग ऑयल से जुड़े प्रयोग और फेंके गए सैनिटरी नैपकिन से बायोमीथेन बनाने पर भी काम करने की जानकारी दी है.
हालांकि, कंपनी की ओर से इस तकनीक को फिफ्थ जेनरेशन का बताना उसका अपना दावा है. इसे अभी फ्यूल की गुणवत्ता से जुड़ा कोई सर्टिफाइड कैटेगराइजेशन नहीं माना जा सकता. सबसे अहम बात यह है कि तैयार होने वाला इथेनॉल पेट्रोल में मिलाने के लिए जरूरी शुद्धता और दूसरे मानकों पर खरा उतरता है या नहीं. यह भी एक बड़ा सवाल है.
IMPHA टेक्नोलॉजी
टेक्नोफेस्ट ग्लोबल ने बालों से अल्कोहल यानी इथेनॉल बनाने की अपनी तकनीक को IMPHA(इन-वाइट्रो मेटाबॉलिक-इंजीनियर्ड पाथवे फॉर हेयर टू अल्कोहल) नाम दिया है. कंपनी के मुताबिक, इस टेक्नॉलाजी का मकसद बायोलॉजिकल प्रोसेस के जरिए बालों जैसे कचरे से अल्कोहल तैयार करना है. इथेनॉल का रासायनिक सूत्र C₂H₆O है, यानी इसके एक अणु में 2 कार्बन, 6 हाइड्रोजन और 1 ऑक्सीजन परमाणु होते हैं. हालांकि, तैयार इथेनॉल का फ्यूल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए जरूरी शुद्धता मानकों पर खरा उतरना भी अहम होगा.
कंपनी का दावा है कि उसकी पेटेंट तकनीक 5G SAFE में सेल्यूलोज से भरपूर ऑर्गेनिक रॉ मैटेरियल को तैयार करने के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली प्री-ट्रीटमेंट प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती. इसके अलावा, कंपनी के मुताबिक, इसमें अलग से एंजाइमों का मिश्रण डालने के बजाय एक खास बायोकैटेलिस्ट का इस्तेमाल किया जाता है. यह बायोकैटेलिस्ट जैविक पदार्थ को शर्करा में बदलने यानी सैकरिफिकेशन प्रोसेस में मदद करता है. कंपनी का कहना है कि इस प्रोसेस के बाद बायोकैटेलिस्ट का बड़ा हिस्सा दोबारा हासिल किया जा सकता है.
85-90 प्रतिशत रिकवरी का क्या मतलब है?
इस टेक्नोलॉजी को लेकर एक अहम बात समझना जरूरी है. कंपनी ने बायोकैटेलिस्ट की 85 से 90 प्रतिशत रिकवरी का दावा किया है. इसका मतलब यह नहीं है कि एक किलोग्राम बालों से 850 से 900 ग्राम इथेनॉल बन जाता है. ये दोनों अलग-अलग बातें हैं.
कंपनी ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि एक किलोग्राम बालों से वास्तव में कितना इथेनॉल तैयार होता है. इसके अलावा, तैयार फ्यूल की शुद्धता, उत्पादन में लगने वाली ऊर्जा और प्रयोगशाला से मिले सर्टिफिकेशन की जानकारी भी सामने नहीं आई है. कंपनी ने यह भी नहीं बताया है कि किसी तेल डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने इस इथेनॉल को खरीदने में रुचि दिखाई है या नहीं.
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इसलिए तकनीक की वास्तविक उपयोगिता समझने के लिए केवल शुरुआती परीक्षण का सफल होना पर्याप्त नहीं है. यह देखना भी जरूरी होगा कि प्रोसेस से कितनी मात्रा में इथेनॉल मिलता है और बड़े स्तर पर इसका उत्पादन आर्थिक रूप से कितना फायदेमंद साबित हो सकता है.
बालों से इथेनॉल बनाना क्यों है मुश्किल
इंसानों के बालों से इथेनॉल बनाना सामान्य तरीकों के मुकाबले चुनौतीपूर्ण है. बालों में मुख्य रूप से केराटिन नाम का प्रोटीन पाया जाता है, जिसका स्ट्रक्चर काफी मजबूत होता है. इसके उलट, ट्रेडिशनल तरीके से इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने, मक्का और दूसरे कार्बोहाइड्रेट से भरपूर कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है. इनसे मिलने वाली शर्करा को फर्मेंटेशन के जरिए इथेनॉल में बदला जा सकता है.
बालों में मौजूद केराटिन को तोड़ने पर आमतौर पर अमीनो एसिड जैसे पदार्थ मिलते हैं. इन्हें सामान्य इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली शर्करा की तरह सीधे फर्मेंटेशन के जरिए फ्यूल में बदलना आसान नहीं है. हालांकि, इन पदार्थों में मौजूद कार्बन को दूसरे तरीकों से फ्यूल में बदलने की संभावनाएं हो सकती हैं.
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टेक्नोफेस्ट ने अभी तक अपनी तकनीक की पूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े पर्याप्त आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं. इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि कंपनी बालों को किस तरह इथेनॉल में बदल रही है. इसकी पुष्टि के लिए लैब टेस्ट और विस्तृत आंकड़ों की जरूरत होगी. इनमें इस्तेमाल किए गए बालों की मात्रा, इथेनॉल का उत्पादन, अन्य कच्चे पदार्थों की जरूरत और प्रोसेस के दौरान निकलने वाले कचरे का पूरा हिसाब शामिल होना चाहिए.
क्या काम आएगा सैलून वाला बाल
भारत में फिलहाल E20 पेट्रोल बेचा जा रहा है, जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जाता है. इस जरूरत को पूरा करने के लिए देश को बड़े पैमाने पर इथेनॉल की आपूर्ति चाहिए. तेल कंपनियों को तय कीमत पर लगातार और भरोसेमंद तरीके से फ्यूल उपलब्ध कराना भी जरूरी है. ऐसे में प्रयोगशाला में तैयार इथेनॉल और कमर्शियल लेवल पर लगातार प्रोडक्शन बनाए रखने के बीच बड़ा अंतर है.
सैलून और नाई की दुकानों से निकलने वाले बालों का इस्तेमाल करने का विचार इसलिए आकर्षक लगा रहा है, क्योंकि इसके लिए खेती की जमीन, सिंचाई या खाद्य फसलों की जरूरत नहीं होगी. अगर बालों को इकट्ठा करने और उनसे इथेनॉल बनाने की लागत कम रखी जा सके, तो कचरे के इस सोर्स का उपयोग किया जा सकता है. लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं.
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अगर मान लिया जाए कि, बालों से इथेनॉल का सफल कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू किया जा सकता है. तो देशभर में हजारों सैलून से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बाल निकलते हैं. इन्हें इकट्ठा करना, अलग-अलग तरह के कचरे से छांटना और फैक्ट्री तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होगी. खर्च बढ़ा सकता है. बालों में मौजूद हेयर डाई, तेल और दूसरे बाहरी पदार्थों को भी संभालना होगा. इसके अलावा, करीब 100 लीटर क्षमता वाले पायलट प्लांट में टेस्टिंग हो जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि कोई फैक्ट्री लगातार हजारों लीटर इथेनॉल बना सकती है.
टेक्नोफेस्ट ग्लोबल के मुताबिक, इस तकनीक को बाजार में उतारने से पहले की टेस्टिंग अभी चल रही है. इसका मतलब है कि प्रोजेक्ट फिलहाल कमर्शियल प्रोडक्शन से पहले के चरण में है. कंपनी के लिए अगला अहम कदम यह होगा कि वह जांच से प्रमाणित इथेनॉल उत्पादन के आंकड़े, प्रति लीटर लागत और बड़े स्तर पर किए गए परीक्षणों के नतीजे सार्वजनिक करे.
अगर इन परीक्षणों में तकनीक सफल साबित होती है और लागत भी कम रहती है, तो सैलून से निकलने वाले बालों का इस्तेमाल फ्यूल बनाने के लिए किया जा सकता है. लेकिन फिलहाल इसे पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की भारत की जरूरत का बड़ा समाधान मानना जल्दबाजी होगी.
अश्विन सत्यदेव