यह कहानी सिर्फ फंगीसाइड कैमिकल यानी थीरम की नहीं है, बल्कि उन फैसलों की है जो सीधे देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की जिंदगी और आम लोगों की सेहत से जुड़े हैं. सवाल एक ऐसे रसायन थीरम का है, जिसे यूरोप समेत दुनिया के कई विकसित देशों ने स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा मानते हुए वर्षों पहले बैन कर दिया. इसके बावजूद भारत में यह आज भी खुलेआम बिक रहा है और कृषि में इस्तेमाल हो रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी वैज्ञानिक खुद इसे खतरनाक बता चुके थे, तब आखिर इसे प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया?
इस इनसाइड स्टोरी के जरिए हम थीरम के इतिहास, वैज्ञानिक खतरों, एग्रो केमिकल कंपनियों की साठगांठ और विकल्पों के उस बड़े विरोधाभास को बेनकाब करेंगे जो सीधे हमारी भोजन की थाली से जुड़ा है.
2020 में कृषि मंत्रालय से जारी हुआ ड्राफ्ट
साल 2020 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के बंद कमरों से एक ड्राफ्ट गजट बाहर आया था. सरकारी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञ कमेटियों ने खुद अपनी कलम से लिखा था कि थीरम इंसानी सेहत और पर्यावरण के लिए एक टाइम बम की तरह है. इस वैज्ञानिक दस्तावेज में थीरम को बैन करने के जो मुख्य कारण दिए गए थे, उसे जानना और समझना जरूरी है.
वैज्ञानिकों ने साफ पाया कि थीरम के टूटने से बनने वाले बाय-प्रोडक्ट मेटाबोलाइट्स एम 1 और एनडीएमए स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं. एनडीएमए एक अत्यंत खतरनाक कैंसरकारी पदार्थ है. इसके साथ ही यूरोपीय संघ के अध्ययनों का हवाला देते हुए दस्तावेज में स्पष्ट किया गया कि थीरम श्रेणी 1 का एंडोक्राइन डिसरप्टर है, यानी यह मानव शरीर के पूरे हार्मोनल सिस्टम को तहस नहस कर सकता है.
प्रकृति के लिए भी अच्छा नहीं ये केमिकल
प्रकृति पर इसका प्रहार ऐसा है कि यह केमिकल हवा, मिट्टी और पानी में लंबे समय तक टिका रहता है. यह मिट्टी में मौजूद मित्र जीवाणुओं को मारता है, पक्षियों की प्रजनन क्षमता को नष्ट करता है और पानी के भीतर जलीय जीवों व मछलियों के लिए तो साक्षात यमराज की तरह काम करता है. दस्तावेज के अंत में साफ और दो टूक अक्षरों में सिफारिश की गई थी कि इसके आयात, निर्माण, बिक्री, परिवहन और कृषि उपयोग पर तुरंत पूरी तरह बैन लगाया जाए.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की तकनीकी परिभाषाओं में भले ही इसे सीधे ग्रुप 3 यानी असंभावित कैंसरकारी की श्रेणी में रखकर एग्रो केमिकल कंपनियां कानूनी और तकनीकी लूपहोल का फायदा उठा लेती हैं, लेकिन सच यह है कि पर्यावरण और शरीर में इसके टूटने से जो एनडीएमए बनता है, वह अत्यधिक जानलेवा कैंसर की वजह है. इसी दोहरे चरित्र और हॉर्मोन बिगाड़ने वाले रवैये को भांपकर यूरोप ने इसे सिरे से खारिज किया था.
थीरम का ऐतिहासिक विरोधाभास
थीरम का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं है. यह दुनिया के सबसे शुरुआती कृत्रिम कार्बनिक फंगीसाइड में से एक है, जिसका आविष्कार मूल रूप से खेती के लिए हुआ ही नहीं था. रबर उद्योग से इसकी शुरुआत हुई थी. 1920 के दशक में जर्मनी की कुख्यात केमिकल कंपनी आईजी फार्वेन इंडस्ट्री और अमेरिका की ड्यूपोंट ने मिलकर रबर को मजबूत करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए इस केमिकल को तैयार किया था.
इसके बाद 1930 और 1940 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि इस औद्योगिक केमिकल में कवक यानी फंगस को मारने की गजब की क्षमता है. इसके बाद इसे खेती में सीड ट्रीटमेंट यानी बीज उपचार का मुख्य हथियार बना दिया गया. विडंबना देखिए, जिन पश्चिमी देशों ने इस जहर को ईजाद किया और दशकों तक दुनिया को बेचा, उन्होंने इसके दीर्घकालिक खतरनाक प्रभावों को देखते हुए अपने नागरिकों को बचाने के लिए इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया. लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों के विशाल बाजार में यह आज भी उन कंपनियों के मुनाफे का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है.
कंपनियों की लॉबिंग, मंत्रालय यू टर्न
वैज्ञानिकों की इतनी गंभीर चेतावनियों के बाद भी यह जहर आज भारत में क्यों बिक रहा है? यहां से शुरू होती है एग्रो केमिकल कंपनियों के रसूख और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वो इनसाइड स्टोरी, जिसने पूरे वैज्ञानिक तंत्र को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. जैसे ही 2020 में थीरम समेत 27 खतरनाक कीटनाशकों को बैन करने का ड्राफ्ट सामने आया, भारत का एग्रोकेमिकल उद्योग सक्रिय हो गया. कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए बने संगठनों ने सरकार की बांह मरोड़ना शुरू कर दिया.
एग्रो केमिकल कंपनियों ने मंत्रालय के सामने कुछ बेहद चालाकी भरे तर्क रखे. आर्थिक नुकसान का रोना रोया और कहा कि यदि इन जेनेरिक और सस्ते कीटनाशकों को बैन किया गया तो हजारों नौकरियां चली जाएंगी. इसके साथ ही निर्यात से जुड़ा दबाव बनाया गया क्योंकि भारत दुनिया में कीटनाशकों का बड़ा निर्यातक देश है. कंपनियों ने दलील दी कि बैन से भारत की वैश्विक निर्यात छवि और कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय साख खराब होगी.
नतीजा यह हुआ कि कृषि मंत्रालय ने ऐसा यू टर्न लिया कि देश के वैज्ञानिक भी देखते रह गए. कंपनियों के मुनाफे को बचाने के लिए सरकार ने तर्क गढ़ दिया कि चूंकि भारत में इसका उपयोग सीधे खेतों में छिड़काव के बजाय मुख्य रूप से बीजों पर लेप लगाने के लिए होता है, इसलिए इससे मनुष्यों को सीधा खतरा कम है. इस लचर तर्क के सहारे थीरम को प्रतिबंधित केमिकल की सूची से बाहर कर दिया गया.
बाजार में जैविक विकल्प भी हैं मौजूद
इस पूरे खेल की सबसे कड़वा सच तो यह है कि बाजार में ट्राइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैसे सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल माने जाने वाले जैविक विकल्प पहले से मौजूद हैं. इसके बावजूद थीरम का एकाधिकार बना हुआ है क्योंकि व्यवस्था ने सुरक्षित विकल्पों को कभी व्यावहारिक बनने ही नहीं दिया. केमिकल लॉबी तर्क देती है कि जैविक विकल्प जीवित फंगस होते हैं, जिनकी लाइफ कम होती है और वे खराब मौसम में धीरे काम करते हैं. जबकि केमिकल थीरम सालों साल गोदामों में सुरक्षित रहता है और एक दवा सौ इलाज की तरह काम करता है.
सवाल यह उठता है कि जब विकल्प मौजूद हैं, तो सरकार ने आज तक इन सुरक्षित जैविक दवाओं के उत्पादन को बढ़ाने और इन्हें किसानों के लिए सस्ता बनाने के लिए सब्सिडी क्यों नहीं दी? सरकार ने विकल्पों को जानबूझकर महंगा छोड़ दिया, ताकि थीरम को बाजार में एकाधिकार मिलता रहे और सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ भी न पड़े.
सच यही है कि यूरोप में जिस केमिकल को छूना भी मना है, वह भारत में नीले और हरे त्रिकोण का मुखौटा पहनकर हमारी फसलों के जरिए हर रोज हमारी और आपकी थाली तक पहुंच रहा है. जब तक नीतियां दूरगामी स्वास्थ्य के बजाय तात्कालिक आर्थिक मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई जाएंगी, तब तक आम नागरिक अनजाने में इस धीमे जहर का शिकार बनता रहेगा. सरकार सो रही है, एग्रो केमिकल कंपनियां नोट छाप रही हैं, और जनता की जान की कीमत कंपनियों के मुनाफे के आगे कौड़ियों के भाव आंकी जा रही है.