छत्तीसगढ़ अब सिर्फ पारंपरिक पहचान के भरोसे नहीं है, बल्कि अपनी इसी सदियों पुरानी धरोहर को 21वीं सदी का नया एग्री-बिजनेस मॉडल बना रहा है. खेतों में लहलहाती हजारों पारंपरिक धान की किस्में जो अपने अनोखे स्वाद, भीनी खुशबू और औषधीय गुणों के लिए जानी जाती हैं अब वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ कदमताल कर रही हैं.
जैव विविधता के इस संरक्षण को अब सीधे मार्केट लिंकेज से जोड़ा जा रहा है. लैब-टू-लैंड के इस नए एप्रोच से न सिर्फ छत्तीसगढ़ की अनोखी धान विरासत सुरक्षित हो रही है, बल्कि प्रीमियम और न्यूट्रास्युटिकल मार्केट में जगह बनाकर यह स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने का एक मजबूत जरिया भी बन रही है.
रायपुर का इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) धान की पुरानी और अनोखी प्रजातियों को बचाने का बड़ा केंद्र बन चुका है. यूनिवर्सिटी के पास एक खास 'जर्मप्लाज्म बैंक' है, जहां धान की लगभग 23,250 किस्मों को सुरक्षित रखा गया है.
क्यों खास है यह खजाना?
इस बैंक में सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर की पारंपरिक और दुर्लभ किस्मों का संग्रह है. यह डेटाबेस वैज्ञानिकों के लिए एक खजाने जैसा है, जो आने वाले समय में बदलते मौसम के अनुकूल, ज्यादा न्यूट्रिशन देने वाली और नई किस्मों की फसलें तैयार करने में काम आएगा.
छत्तीसगढ़ के किसान सालों से ऐसी फसलें उगाते आ रहे हैं, जिनका इस्तेमाल खान-पान के साथ-साथ सेहत सुधारने और बीमारियों के इलाज में भी होता रहा है. अब वैज्ञानिक लैब्स में इन किस्मों पर टेस्ट कर रहे हैं ताकि इनके औषधीय गुणों को वैज्ञानिक प्रमाण देकर दुनिया के सामने लाया जा सके.
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की अनोखी पारंपरिक किस्मों पर गहराई से रिसर्च जारी है, जिसमें लाइचा, महाराजी और गठुवन जैसी प्रजातियां प्रमुख हैं. शोध बताते हैं कि सामान्य चावल के मुकाबले लाइचा में 231 अधिक फाइटोकेमिकल्स मौजूद हैं, जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं, वहीं महाराजी धान के तत्वों का उपयोग कर स्तन और फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी कोशिकाओं पर इसके संभावित असर का अध्ययन किया जा रहा है. इसी तरह, गठिया के इलाज में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाली गठुवन किस्म के संभावित औषधीय गुणों और कैंसररोधी क्षमताओं को भी अब वैज्ञानिक लैब्स में आधुनिक शोध के जरिए परखा जा रहा है.
खेती से समृद्धि और नए अवसर
इन औषधीय धान की खूबियां सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह किसानों के लिए कमाई के नए और बड़े दरवाजे भी खोल रही हैं. कृषि विश्वविद्यालय की सोच एकदम साफ है किसान केवल पारंपरिक तौर-तरीकों से धान उगाने तक न सीमित रहें, बल्कि ऐसी खास और मांग वाली किस्में उगाएं जो फार्मास्युटिकल और न्यूट्रास्युटिकल उद्योगों के लिए कच्चा माल बन सकें. जब किसान सीधे हेल्थ-फूड और दवा कंपनियों से जुड़ेंगे, तो उन्हें अपनी फसल का बेहतर और प्रीमियम दाम मिलेगा.
छत्तीसगढ़ की यह धान विरासत अब पुरानी कहानियों में सिमटी हुई नहीं है. वैज्ञानिक शोध, अत्याधुनिक तकनीक और सीधे मार्केट लिंकेज के दम पर यही पारंपरिक धान आने वाले दिनों में लोगों को सेहत और किसानों को आर्थिक मजबूती देने का सबसे बड़ा जरिया बनने जा रहा है.