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ट्रंप को चाहिए Peace, नेतन्याहू को War... इजरायल कहीं पटरी से ना उतार दे ईरान डील?

कई दशकों से नेतन्याहू ईरान को इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं. उन्होंने बार-बार कहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है और उन्होंने अमेरिकी सरकारों से ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाए रखने की अपील की है.

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क्या नेतन्याहू अमेरिका-ईरान डील को डिरेल करेंगे? (Photo: Reuters)
क्या नेतन्याहू अमेरिका-ईरान डील को डिरेल करेंगे? (Photo: Reuters)

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भले अमेरिका और ईरान को MoU पर साइन करने से रोकने में नाकाम रहे हों, लेकिन वह इसके फाइनल नतीजे को प्रभावित करने की कोशिश छोड़ने वाले नहीं हैं.

अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे टकराव को खत्म करने के मकसद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच एक MoU पर वर्चुअल रूप से दस्तखत होने के बाद, बातचीत का 60 दिन का नया दौर शुरू हुआ. इन बातचीत से ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज स्ट्रेट से तेल की सप्लाई और समझौते में तय किए गए वादों को लागू करने के बारे में भविष्य तय होगा.

हालांकि, नेतन्याहू के लिए इस समझौते पर हस्ताक्षर करना किसी लड़ाई के खत्म होने के बजाय एक नई लड़ाई की शुरुआत जैसा लगता है.

ईरान को लेकर नेतन्याहू की पुरानी चेतावनी

कई दशकों से नेतन्याहू ईरान को इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते रहे हैं. उन्होंने बार-बार कहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है और उन्होंने अमेरिकी सरकारों से ईरान पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाए रखने की अपील की है.

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अब, CNN और अमेरिका के दूसरे मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू को इस बात पर गहरा शक है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर कोई ठोस पाबंदी मानेगा. खबरों के अनुसार, इजरायली अधिकारियों का मानना ​​है कि ईरान आखिरकार अमेरिका की जरूरी शर्तों को मानने से इनकार कर देगा. इसी सोच के चलते नेतन्याहू और उनके सहयोगियों ने अमेरिका में चल रही बहस को प्रभावित करने की नई कोशिश शुरू की है.

खबरों के मुताबिक, इजरायली नेता इस समझौते को लेकर लोगों की राय बनाने और ट्रंप प्रशासन के भीतर चिंताएं पैदा करने के लिए कंजर्वेटिव मीडिया हस्तियों और इजरायल-समर्थक सांसदों का सहारा ले रहे हैं.

इस डील की सबसे मुखर आलोचना करने वालों में इजरायल के समर्थक कमेंटेटर मार्क लेविन शामिल हैं. उन्होंने कहा कि इस डील का 'कोई मतलब नहीं है.' उन्होंने ईरान के रिकंस्ट्रक्शन के लिए पैकेज को 'स्लश फंड' यानी बेहिसाब खर्च के लिए रखा गया फंड बताया है.

आलोचना सिर्फ मीडिया से जुड़े लोगों तक ही सीमित नहीं है. कई रिपब्लिकन नेताओं ने भी इस समझौते के कुछ पहलुओं, खासकर उन प्रावधानों पर चिंता जताई है जिनसे ईरान पर लगे प्रतिबंध कम हो सकते हैं या उसे आर्थिक राहत मिल सकती है.

लुइसियाना के सीनेटर बिल कैसिडी ने इस डील की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि रीगन अपनी कब्र में बेचैन हो रहे होंगे. कैसिडी ने कहा कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर रोक नहीं लगाई गई और उन्हें पता चल गया है कि होर्मुज को रोकने से काम बनता है और वे भविष्य में निश्चित रूप से इसका फायदा उठाएंगे.

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उन्होंने आगे कहा, 'युद्ध से पहले, होर्मुज खुला था, ईरान प्रतिबंधों से दबा हुआ था और अमेरिकी सेना के 13 जवान जिंदा थे. अब 13 अमेरिकी मारे जा चुके हैं, परिवारों को पेट्रोल-डीजल के लिए अरबों डॉलर चुकाने पड़े हैं, प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे, और बमबारी रुक गई है. यह दशकों में विदेश नीति की सबसे बड़ी गलती है.

टेक्सास के सीनेटर टेड क्रूज ने भी समझौते के आर्थिक प्रावधानों पर चिंता जताई. क्रूज ने अपने पॉडकास्ट पर पूछा, 'क्या इससे ईरानी अयातुल्लाह को 300 अरब डॉलर मिल रहे हैं? मुझे उम्मीद है कि ऐसा नहीं है. मैं प्रार्थना करता हूं कि ऐसा न हो.

अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी इसी तरह सावधानी बरतने की अपील की. पेंस ने कहा कि मैं राष्ट्रपति से एक कदम पीछे हटने, नाकाबंदी जारी रखने और बातचीत के जरिए समझौता करने का आग्रह करूंगा, जो ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को खत्म करने, इस मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करने, आतंकवादी प्रॉक्सी के लिए समर्थन को खत्म करने और होर्मुज को खोलने के लिए प्रतिबद्ध करेगा.ऐसा न होने पर, हमें अपने सेना को हमारी शर्तों पर काम पूरा करने देना चाहिए.'

लेबनान समस्या

जहां ईरान का परमाणु कार्यक्रम सुर्खियों में है, वहीं लेबनान वार्ताकारों के लिए सबसे कठिन मुद्दों में से एक साबित हो सकता है. MoU में 'लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से खत्म करने' का जिक्र है. यह लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को संरक्षित करने के लिए भी पार्टियों को बाध्य करता है. हालांकि, MoU अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं देता.

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इजरायल ने इस समझौते पर साइन नहीं किए हैं. इस समझौते पर अमेरिका और ईरान ने हस्ताक्षर किए थे, इजरायल और लेबनान ने नहीं. नतीजतन, इस बात पर एक बड़ा अंतर है कि युद्धविराम के किसी भी प्रावधान को वास्तव में जमीन पर कैसे लागू किया जाएगा?

MoU में यह भी नहीं बताया गया है कि क्या ईरान को हिजबुल्लाह के लिए समर्थन बंद करना चाहिए या समझौते के तहत तेहरान से जुड़े प्रॉक्सी के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? इन खामियों ने चिंताएं बढ़ा दी हैं कि लेबनान सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन सकता है.

'इस समझौते से हम बंधे नहीं'

यह चुनौती तब और साफ हो गई जब ऐसी खबरें आईं कि नेतन्याहू ने ट्रंप से कहा कि इजरायल खुद को इस समझौते से बंधा हुआ नहीं मानता. अमेरिका के दबाव के बावजूद, इजरायल इस बात पर अड़ा हुआ है कि उसकी सुरक्षा चिंताएं सबसे जरूरी हैं. समझौते के बावजूद इजरायली सेना ने लेबनान के दक्षिणी हिस्सों पर हमले जारी रखे.

इस हफ्ते की शुरुआत में नेतन्याहू ने साफ किया था कि वह अब भी ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों से मिलने वाले खतरों को एक बड़ा खतरा मानते हैं. उन्होंने कहा था कि हमने इजरायल के चारों ओर मजबूत सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं. हमने ऐसा गाजा, लेबनान और सीरिया में किया है.'

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इजरायल के रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने और भी कड़ा संदेश दिया. काट्ज ने कहा कि 'प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और मैं एक स्पष्ट नीति पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत सेना लेबनान, सीरिया और गाजा में सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित काल तक बनी रहेगी, ताकि सीमा और वहां रहने वाले इजरायलियों की जिहादियों से रक्षा की जा सके.

लेबनान को लेकर असहमति ट्रंप और नेतन्याहू के बीच पैदा हुए व्यापक तनाव को दिखाती है. इस समझौते को लेकर उनके बीच कई बार टकराव हुआ है. जहां नेतन्याहू लगातार सैन्य दबाव बनाने की वकालत करते रहे हैं, वहीं ट्रंप का ध्यान ज्यादातर एक स्थायी समझौता करने और क्षेत्र में बड़े युद्ध को रोकने पर रहा है.

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