अमेरिका और ईरान के बीच घोषित दो हफ्ते के अस्थायी सीजफायर में लेबनान को शामिल करने को लेकर जो विवाद खड़ा हो गया है, उसकी जिम्मेदारी अब पाकिस्तान पर डाली जा रही है. पाकिस्तान ने खुद को इस समझौते का मध्यस्थ बताया था, लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान ने दोनों पक्षों को अलग-अलग मैसेज दिए या समझौते की शर्तों को अच्छे ढंग से कम्युनिकेट नहीं कर पाया.
दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने सार्वजनिक संदेश में बड़े अक्षरों (Capital Letters) में लिखा था कि अमेरिका और ईरान अपने सहयोगियों के साथ लेबनान समेत हर जगह तत्काल युद्धविराम पर सहमत हुए हैं, जबकि इसके कुछ ही मिनटों बाद इजराइल ने समझौते का स्वागत तो किया, लेकिन साफ कर दिया कि लेबनान इसका हिस्सा नहीं है. और कुछ ही घंटों बाद इजरायल ने लेबनान को निशाना बनाते हुए भीषण हमला किया था.
इस हमले में 250 से ज्यादा लोग मारे गए और एक हजार से अधिक घायल हुए. इजराइल का कहना है कि वह 2 मार्च से जारी हिज्बुल्लाह के खिलाफ अपनी कार्रवाई को बंद नहीं करेगा.
PAK से हुई गलती?
इस पूरे विवाद के केंद्र में पाकिस्तान की भूमिका है, जिस पर समझौते की शर्तों को दोनों पक्षों तक सही तरीके से पहुंचाने की जिम्मेदारी थी.
खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान ने संभवतः ईरान को समझौते का वह ड्राफ्ट (संस्करण) दिया जो वाशिंगटन को दिए गए ड्राफ्ट से अलग था. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी संकेत दिया कि ईरानियों को ये विश्वास दिलाया गया था कि सीजफायर में लेबनान शामिल है. वेंस ने इसे एक 'तथ्यात्मक गलतफहमी' करार देते हुए कहा कि अमेरिका ने ऐसा कोई वादा नहीं किया था. ये स्थिति इस्लामाबाद की मध्यस्थता प्रक्रिया में बड़ी कमियों को उजागर करती है.
24 घंटे में डगमगाने लगा सीजफायर
इजरायली हमलों के बाद ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने अमेरिका और इजरायल पर सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में बातचीत करना तर्कहीन है. जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से बंद कर दिया है और तेल टैंकरों की आवाजाही रोक दी है. ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है. इससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर एक बार फिर संकट खड़ा हो गया है और सीजफायर लागू होने के 24 घंटे के अंदर ही डगमगाने लगा है.
पाकिस्तान की कूटनीति की आलोचना
विशेषज्ञों ने पाकिस्तान के इस 'फ्लॉप्ड' कूटनीतिक कोशिश की कड़ी आलोचना की है. जियो-पॉलिटिकल एनालिस्ट सुशांत सरीन ने इसे 'बातचीत का पंजाबी तरीका' बताते हुए तंज कसा कि ये बिना बारीकियों को समझे केवल समझौते तक पहुंचने की हड़बड़ी का नतीजा है.
उन्होंने इसकी तुलना न्यूयॉर्क और लाहौर के उन डीलरों से की जो अधूरे विवरणों के साथ सौदेबाजी करते हैं. पाकिस्तान के लिए ये स्थिति बेहद शर्मनाक है, विशेष रूप से तब जब अमेरिका और इजरायल ने उसके दावों को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया है.
सोशल मीडिया पोस्ट पर भी हंगामा
इसके अलावा मध्यस्थता के इस ड्रामे में पाकिस्तान की किरकिरी तब और बढ़ गई जब शहबाज शरीफ ने एक्स (X) पर एक पोस्ट साझा की. इस पोस्ट के शुरुआती वर्जन में 'Draft - Pakistan's PM Message on X' लिखा रह गया था.
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट ने बाद में पुष्टि की कि इस पोस्ट को साझा करने से पहले व्हाइट हाउस ने इसे चेक किया था. इससे ये भी संकेत मिलता है कि पाकिस्तान एक स्वतंत्र मध्यस्थ के बजाय केवल एक मैसेंजर की तरह काम कर रहा था. अब पाकिस्तान को ये स्पष्ट करना होगा कि दोनों पक्षों के बीच शर्तों को लेकर इतना बड़ा अंतर कैसे रह गया.