संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का सदस्य होने का मुख्य आकर्षण वीटो पावर है. वीटो पावर ही इसके सदस्यों को वो अधिकार देता है कि UNSC से पारित किसी फैसले पर अमल होगा या नहीं. दुनिया की महाशक्तियों में शुमार हो रहे भारत ने इस सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग लंबे समय से की है.
लेकिन बिना वीटो पावर के स्थायी सदस्यता की चर्चाओं के बीच भारत ने ऐसे किसी भी प्रस्ताव को साफ खारिज किया है. UNSC में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वथनेनी ने स्पष्ट कहा कि बिना वीटो पावर के स्थायी सदस्यता ‘सेकंड क्लास’ स्टेटस के बराबर है और भारत इसे स्वीकार नहीं करेगा.
सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर-सरकारी वार्ता की पूर्ण बैठक में 'वीटो के सवाल' पर बोलते हुए राजदूत पर्वथनेनी ने कहा, "जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक रिफॉर्म के बाद बने सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए." निष्पक्षता और न्याय की मांग है कि सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलें."
उन्होंने कहा, "वीटो को लेकर भारत का रुख सिद्धांतों पर आधारित है और सबको पता है. हम फिर दोहराते हैं कि जब तक वीटो का प्रावधान है, तब तक सुधार के बाद बनने वाली परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए."
पर्वथनेनी ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के तहत "बिना वीटो वाले दीर्घकालिक सदस्यों की एक नई कैटेगरी" बनाना, उन्हें असल में 'दूसरे दर्जे' का सदस्य बना देगा. इससे P5 (पांच स्थायी सदस्यों) की निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं आएगा.
उन्होंने कहा कि स्थायी सदस्यों की एक नई श्रेणी बनाना. चाहे उसमें वीटो का अधिकार हो या न हो. पहले से ही जटिल चर्चा को और उलझा देगा. इससे "वही असमानता और गहरी हो जाएगी, जिसे हम दूर करना चाहते हैं."
भारत के राजनयिक ने कहा, "समय-समय पर होने वाले चुनाव और स्थायी सदस्यता की अवधारणा, बुनियादी तौर पर एक-दूसरे के विपरीत हैं."
उन्होंने कहा, "इतिहास से हमें एक सबक मिलता है." उन्होंने याद दिलाया कि 1965 में जब सुरक्षा परिषद का विस्तार हुआ था, तब अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 कर दी गई थी, जबकि स्थायी सदस्यों की संख्या 5 ही बनी रही.
पर्वथनेनी ने कहा कि इससे स्थायी और निर्वाचित सदस्यों का अनुपात 5:6 से बदलकर 5:10 हो गया, जिससे P5 की ताकत और अधिक मजबूत हो गई.
भारत के राजनयिक ने कहा कि वीटो को सीमित करने के सवाल पर सुरक्षा परिषद में सुधार के अन्य पहलुओं - जैसे सदस्यता की श्रेणियां, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, परिषद का आकार और इसके काम करने के तरीके - से अलग हटकर विचार नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा, "भारत सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की अपनी मांग को दोहराता है. इसकी शुरुआत स्पष्ट समय-सीमा और तय लक्ष्यों के साथ, लिखित प्रस्तावों पर आधारित बातचीत शुरू करने से होनी चाहिए."
परिषद के काम करने के तरीकों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वीटो केवल स्थायी सदस्यों द्वारा औपचारिक रूप से डाले गए वोटों तक ही सीमित नहीं है.
अस्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी
भारत ने लगातार स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की सदस्यता कैटेगरी का विस्तार करने की मांग की है. साथ ही भारत ने चेतावनी दी है कि अगर सुधार के प्रयास केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक ही सीमित रहे, तो इसे एक तरह से "विफलता" ही माना जाएगा.
सुरक्षा परिषद में सुधार लाने के लिए कई वर्षों से चल रहे प्रयासों में नई दिल्ली सबसे आगे रही है. भारत का कहना है कि 1945 में बनी यह संस्था 21वीं सदी के हिसाब से उपयुक्त नहीं है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है.
भारत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि सुरक्षा परिषद की मेज पर एक स्थायी सीट पाने का वह पूरी तरह से हकदार है.
इसके अलावा इंडिया 2028-29 के कार्यकाल के लिए एक अस्थायी सीट भी हासिल करना चाहता है. इस कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होने हैं, जिसमें एशिया-प्रशांत समूह के लिए तय की गई एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा.
सुरक्षा परिषद में वीटो पावर के विशेषाधिकार
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) के पास वीटो पावर का विशेष अधिकार है. इसके जरिए कोई भी एक स्थायी सदस्य किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को अकेले रोक सकता है, भले ही बाकी 14 सदस्य उसके पक्ष में हों.
यह शक्ति मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, प्रतिबंध लगाने, सैन्य कार्रवाई को मंजूरी देने और नए सदस्यों के प्रवेश जैसे मामलों पर लागू होती है.
वीटो के कारण इन देशों का परिषद पर निर्णायक प्रभाव रहता है. वे अपने राष्ट्रीय हितों, सहयोगियों या संवेदनशील मुद्दों की रक्षा कर सकते हैं. यह उन्हें अन्य सदस्यों की तुलना में असाधारण राजनीतिक वजन और प्रभाव देता है, जिससे परिषद के फैसलों में उनकी सहमति अनिवार्य हो जाती है.