ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल की जंग ने तेल बाजार में हलचल मचा दी है. कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चला गया है जिसे देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल को वैश्विक बाजार में आने की अस्थायी छूट दे दी है. अमेरिका ने इससे पहले भारत को रूसी तेल खरीदने की 30 दिनों की छूट जारी की थी और अब दुनियाभर के देशों के लिए रूसी तेल उपलब्ध हो गया है.
अमेरिका की यह छूट पहले से समंदर में मौजूद रूसी तेल की खरीद पर ही लागू होती है. इस छूट के बीच खबर आ रही है कि रूसी कच्चे तेल और ईंधन से भरे लगभग 30 टैंकर एशियाई समुद्र में मौजूद हैं. एशिया के देश अब रूस के इस तेल और गैस को बिना किसी रोकटोक के खरीद सकते हैं.
ब्लूमबर्ग की तरफ से जमा किए गए जहाज-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार इन जहाजों में कम से कम 1.9 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल और लगभग 3.10 लाख टन पेट्रोलियम रिफाइंड प्रोडक्ट मौजूद हैं. इन प्रोडक्ट्स में मुख्य रूप से नाफ्था शामिल है, जिसका इस्तेमाल प्लास्टिक बनाने में होता है, और कुछ मात्रा में डीजल भी है.
अमेरिका और इजरायल के हमलों के बीच ईरान ने दबाव बनाने के लिए होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया है जिससे तेल-गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है. यह स्ट्रेट मध्य-पूर्व के तेल और गैस सप्लाई के लिए अहम समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया के कुल तेल कारोबार का 20% हिस्सा तेल गुजरता है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल, गैस की सप्लाई में रुकावट आई है.
रूस के कितने जहाजों पर लदा है कच्चा तेल?
रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई समंदर में खड़े रूसी जहाजों में से 25 जहाजों में कच्चा तेल लदा हुआ है. इनमें सोकोल जैसे ग्रेड भी शामिल हैं, जो चीन के पास मौजूद जहाजों पर हैं. इसके अलावा अरब सागर में भी कई टैंकर हैं, जिनमें मुख्य रूप से रूसी तेल यूराल ब्लेंड भरा हुआ है. ये टैंकर महीनों से समंदर में बिना बिके खड़े हैं लेकिन ट्रंप के ऑर्डर के बाद एशियाई देश धड़ल्ले से इन्हें खरीद सकते हैं.
जहाज फिलहाल 'फॉर ऑर्डर्स' का संकेत दे रहे हैं, जिसका मतलब है कि अभी उन्हें किसी ने खरीदा नहीं है. कुछ जहाज सिंगापुर या मलेशिया जाने का संकेत भी दे रहे हैं. इन जगहों पर अक्सर टैंकर तब तक इंतजार करते हैं जब तक तेल की खेप का बाजार में सौदा नहीं हो जाता.
अमेरिकी ट्रेजरी ने गुरुवार से पहले लोड किए गए रूसी तेल के आयात के लिए एक महीने की छूट दी है. इससे पहले भारत को रूसी तेल खरीदने की अस्थायी छूट मिली थी जिसके बाद से भारत की रिफाइनरियां धड़ल्ले से रूसी तेल खरीद रही हैं.
अमेरिका का यह कदम ऐसे समय आया है जब कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों, जैसे डीजल और जेट ईंधन को ले जा रहे सैकड़ों जहाज होर्मुज स्ट्रेट के आसपास फंसे हुए हैं.
केप्लर लिमिटेड के वरिष्ठ कच्चा तेल विश्लेषक मयू शू के अनुसार, अमेरिका का फैसला 'खरीदने वाले देशों और रिफाइनरियों को मध्य-पूर्व में सप्लाई झटके से निपटने के लिए समय दे रहा है. बाजार में जो भी तेल उपलब्ध होगा, दुनिया के देश उसे खरीदेंगे, इस समय सबके लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है.'