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हूती मिसाइलों की जद में पाकिस्तान? मुनीर के सामने यमन ट्रैप का डेंजर!

जैसे-जैसे हूती हमले तेज हो रहे हैं और सैनिकों की तैनाती की खबरें आ रही हैं, पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद करने के और करीब आ गया है. इस संभावना ने मिस्र के यमन में किए गए विनाशकारी दखल की यादें ताज़ा कर दी हैं और आसिम मुनीर के लिए जोखिम बढ़ा दिए हैं.

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मुनीर ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेनाएं भेजी हैं (Photo: ITG)
मुनीर ने सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सेनाएं भेजी हैं (Photo: ITG)

अरब के ताकतवर नेता गमाल अब्देल नासिर ने काहिरा में अमेरिकी राजदूत के सामने एक चौंकाने वाली बात स्वीकार की थी. कहानी 1967 की है. उन्होंने कहा, "मैंने यमन में एक कंपनी (लगभग 200 सैनिक) भेजी थी, लेकिन बाद में वहां 70,000 सैनिक भेजने पड़े." मिस्र ने सऊदी समर्थित ताकतों के खिलाफ यमन में गृह युद्ध लड़ने के लिए लड़ाकू विमान, टैंक और अपनी सेना का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भेजा, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली.

लगभग छह दशक गुजर गए हैं. अब पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर 'मिस्र के वियतनाम' का अध्ययन कर रहे हैं. मुनीर के सहयोगी सऊदी अरब को 1990 में सद्दाम हुसैन द्वारा कुवैत पर कब्ज़ा करने के बाद से सबसे गंभीर सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ रहा है. यमन स्थित हूती विद्रोहियों द्वारा दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों ने रियाद हवाई अड्डे को एक बार नहीं, बल्कि दो बार निशाना बनाया है. हूतियों के ताजा हमले में तो 13 लोगों की जान गई है. 

हूती-सऊदी की लड़ाई में वियतनाम का जिक्र क्यों?

यहां वियतनाम का जिक्र समझना जरूरी है. वियतनाम का जिक्र एक ऐसी जंग के प्रतीक के तौर पर है, जिसमें ताकतवर सेना को लंबे समय तक उलझकर भारी नुकसान उठाना पड़ा. 1965 में अमेरिका वियतनाम युद्ध में अपनी सैन्य ताकत के बावजूद वियतनामी गुरिल्ला लड़ाकों को निर्णायक रूप से हरा नहीं सका और आखिरकार उसे पीछे हटना पड़ा. यमन में हूती विद्रोही भी मिसाइलों, ड्रोन और असममित युद्ध की रणनीति से अपने से ताकतवर विरोधियों को चुनौती देते रहे हैं.

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हूती विद्रोहियों ने ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी अरब की तेल सप्लाई ठप कर दी है. सितंबर की शुरुआत में जमीनी हमले के जरिए विद्रोहियों ने यमन के पूरे रेड सी तट पर कब्ज़ा कर लिया और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया; इसी रास्ते से सऊदी अरब अपने तेल का बड़ा हिस्सा एक्सपोर्ट करता है. ईरान के साथ तनाव में उलझे डोनाल्ड ट्रंप ने रियाद की मदद करने से इनकार कर दिया है.

ट्रंप की अपनी चिंताएं हैं. उनकी अप्रूवल रेटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर 29 प्रतिशत पर है. इस बीच अहम मध्यावधि चुनाव में एक महीने से भी कम समय बचा है. 

मुनीर इस्लामिक दुनिया की सबसे बड़ी सेना के चीफ हैं. उनके अंदर 6 लाख सेना काम करती है. उन पर सऊदी अरब की मदद करने की ज़िम्मेदारी है, और यह मदद उन्हें दो आपसी रक्षा समझौतों के तहत करनी है. सितंबर 2025 में हुआ द्विपक्षीय 'स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट' और इस साल 7 अगस्त को हुआ त्रिपक्षीय 'मक्का डिफेंस एग्रीमेंट' जिसमें तुर्की भी शामिल है.

मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने यमन में अपनी सेना भेजी थी. (Photo: Wikipedia)

MDA का एक अहम हिस्सा यह प्रस्ताव है कि 'किसी एक पर हुआ सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा.' उस समय यह बात शायद बहुत दूर की कौड़ी लगती थी, लेकिन सऊदी अरब पर हूती हमलों के बाद अब इस पर तुरंत कार्रवाई की ज़रूरत है. 

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काफ़ी उतार-चढ़ाव के बाद 5 अक्टूबर को मक्का पैक्ट के सहयोगी देश तुर्की और पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिक तैनात करने का फैसला किया है. 2025 के समझौते के तहत पाकिस्तान के पास पहले से ही फ़ाइटर जेट्स का एक स्क्वाड्रन मौजूद है. 7 अक्टूबर को न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि पाकिस्तान वायु सेना ने हूती विद्रोहियों पर हमले किए हैं. 

मुनीर ख़ुद गंभीर आंतरिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं. पाकिस्तान पिछले एक दशक से भी ज़्यादा समय में सबसे बुरे विद्रोह का सामना कर रहा है; बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में एक साथ विद्रोह हो रहे हैं, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में नागरिक अशांति है और जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थकों का बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन चल रहा है. 

 11 अक्टूबर को पाकिस्तान की संघीय सरकार ने KP की प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया और आपातकाल लागू कर दिया. पाकिस्तान की आर्थिक हालत बहुत ख़राब है, खाने-पीने की चीज़ों और ईंधन की कीमतें बहुत ज़्यादा हैं, जिसकी वजह से उसे गुज़ारे के लिए IMF की मदद पर निर्भर रहना पड़ता है. 

लेकिन मुनीर की असली चुनौती रियाद में है. मुनीर के सामने हैं धैर्य खो रहे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान. उनके 'सऊदी विज़न 2030' का मकसद सऊदी समाज और अर्थव्यवस्था को बदलना है, लेकिन हूती विद्रोही लगातार हमलों से इसे कमजोर कर रहे हैं. मुनीर पाकिस्तान के इतिहास के सबसे ताकतवर सैन्य अधिकारी हैं. वे 2030 तक तीनों सेनाओं की कमान संभालेंगे और उनके पास आजीवन रैंक और कानूनी कार्रवाई से छूट है. उन्हें भी अपनी सुरक्षा के लिए सऊदी मदद की ज़रूरत है.

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अप्रैल 2026 में सऊदी अरब और कतर ने पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर की बड़ी आर्थिक मदद दी. लेकिन दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता. 2015 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्ते सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे, जब इस्लामाबाद ने यमन में सेना भेजने से इनकार कर दिया था.  पाकिस्तान की संसद ने तटस्थ रहने का फैसला किया और वादा किया कि वे तभी दखल देंगे जब उनके इलाके या मक्का और मदीना के दो पवित्र स्थलों पर कोई खतरा होगा.

अब एक दशक बाद मुनीर को ऐसी किसी संसदीय एप्रूवल की ज़रूरत नहीं है. सऊदी अरब में और सेना भेजने का उनका 8 अक्टूबर का समझौता बिना किसी संसदीय वोट के हुआ. यह पता नहीं है कि सऊदी अरब में कितने नए पाकिस्तानी सैनिक तैनात किए गए हैं. मुनीर के पास इन आंकड़ों को सार्वजनिक न करने की वजह है, क्योंकि इससे ईरान नाराज हो सकता है, जो हूतियों का मुख्य समर्थक है. 

4 अक्टूबर को ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने उम्मीद जताई कि पाकिस्तान की सेना की तैनाती की अफवाहें सच नहीं हैं और चेतावनी दी कि 'किसी भी नए दखल से हालात और मुश्किल हो जाएंगे.'

11 अक्टूबर की अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में हूतियों की चेतावनी का ज़िक्र किया गया कि 'अगर पाकिस्तान सऊदी अरब की तरफ़ से उनके ख़िलाफ़ कोई सैन्य कार्रवाई करता है, तो उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव किया जाएगा जैसा अभी सऊदी अरब के साथ किया जा रहा है.' सैद्धांतिक रूप से हूती 2,000 किलोमीटर की रेंज वाली 'फिलिस्तीन-2' बैलिस्टिक मिसाइल और 2,500 किलोमीटर की रेंज वाले 'शहेद-136' कामिकेज़ ड्रोन का इस्तेमाल करके पाकिस्तान पर सीधा हमला कर सकते हैं.

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इसके अलावा वे अरब सागर और फारस की खाड़ी में पाकिस्तानी व्यापारिक जहाजों जैसे नजदीक के लक्ष्यों को चुन सकते हैं. मुनीर के लिए बड़ी चिंता एक कभी न खत्म होने वाली मुश्किल स्थिति है, जिसमें पाकिस्तानी सैनिक लंबे समय तक तैनाती में फंस सकते हैं और पाकिस्तानी सैनिकों के साथ यमन में वही हो सकता है जो मिस्र नासिर के सैनिकों के साथ हुआ. 

1960 के दशक में नासिर अपने करियर के सर्वश्रेष्ठ दौर पर थे. वे अरब दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता थे. उन्होंने स्वेज नहर से अंग्रेजों को बाहर निकाला था और उसका राष्ट्रीयकरण किया था, अरब एकता की वकालत की थी और जवाहरलाल नेहरू के साथ तीसरी दुनिया के नेतृत्व के लिए होड़ की थी. 

उत्तरी यमन के पहाड़ों में छिपे जिद्दी गुरिल्ला लड़ाकों ने नासिर की विरासत को खत्म कर दिया. यमन युद्ध में अरबों डॉलर खर्च हुए. 10,000 से ज़्यादा मिस्र के सैनिक मारे गए और देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई. 

कमजोर पड़ चुकी नासिर की सेना 1967 में इज़रायल से युद्ध हार गई और तीन साल बाद 52 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई. मुनीर जिनकी उपलब्धियां नासिर के मुकाबले बहुत कम हैं. शायद यमन से मिली इस चेतावनी पर ध्यान देंगे. 

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