
समंदर में कितना पानी? ये एक ऐसा सवाल है जो बचपन में हम सबसे खेल-खेल में कभी न कभी पूछा गया होगा. लेकिन इसका जवाब देते हुए हम उसी लहजे में कहते थे कि जितने आसमान में तारे, उतना ही समंदर में पानी. मतलब न तो आसमान में चमकने वाले तारों की गिनती संभव है और न ही समंदर में मौजूद पानी को नापना किसी के वश में है. लेकिन क्या अथाह समंदर में भी कोई पानी के लिए तरस सकता है और समंदर में सफर करने वाले नाविकों के सामने कभी जल संकट पैदा हो सकता है? मौजूदा हालात में ऐसा संभव है और समंदर में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर चुके मर्चेंट नेवी के तीन नाविकों ने विस्तार से इसकी वजह भी बताई है.
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की तरफ से छेड़ी गई जंग को एक महीने से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है. वैसे तो ये जंग सिर्फ तीन देशों के बीच है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर व्यापक रूप से देखा जा रहा है. भारत समेत तमाम देश जंग की तपिश को महसूस कर रहे हैं. खाड़ी देशों से आने वाली तेल और गैस की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई, जिससे कई देशों में संकट गहरा गया है.
जंग के बीच फ्रंट लाइनर्स हैं नाविक
इस जंग का एक पक्ष उन देशों के नागरिक हैं, जहां लगातार एयर स्ट्राइक और मिसाइल अटैक हो रहे हैं. इसके अलावा सप्लाई चेन बाधित होने से दुनिया के अन्य मुल्कों के नागरिकों पर भी इस जंग का असर पड़ा है. जंग का एक पक्ष वह नाविक भी हैं जो दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक जहाजों के जरिए जरूरी सामानों की सप्लाई का अहम हिस्सा हैं. वह इस जंग के फ्रंट लाइनर्स हैं और खतरे को सीधे तौर पर देख रहे हैं. समंदर के ये सिपाही अपनी जान जोखिम में डालकर जंग के बीच से हम और आप तक जरूरी सामान पहुंचा रहे हैं.
मौजूदा हालात में सप्लाई चेन का सबसे अहम रास्ता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का नया वॉर सेंटर बन चुका है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान अपने 'मित्र देशों' को छोड़कर किसी भी अन्य देश के जहाज इस रास्ते से नहीं गुजरने दे रहा. साथ ही इस रूट से गुजरने वाले जहाजों से मोटा टैक्स भी वसूलने की भी तैयारी है. ऐसे में सैकड़ों की तादाद में ऐसे जहाज हैं जो बीच समंदर फंसे हुए हैं. आमतौर पर ऐसे हालात में आसपास के किसी बंदरगाह पर लोकल एजेंसियों की सुरक्षा में जहाजों को एंकर किया जाता है. लेकिन ओमान, UAE और कतर के तमाम पोर्ट्स को भी हाल के दिनों में निशाना बनाया गया है, ऐसे में अब बंदरगाह भी सुरक्षित नहीं बचे हैं.
जहाज पर 45 दिन का ड्राई प्रोविजन
मर्चेंट नेवी में थर्ड ऑफिसर दर्शन सिंह कई बार हॉर्मुज के रास्ते एक देश से दूसरे देश में टैंकर की सप्लाई का हिस्सा रहे हैं. वह कतर, ओमान, सऊदी अरब, चीन, स्पेन, पोलैंड, सिंगापुर समेत 20 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं. जंग के हालात में आने वाली चुनौतियों पर वह बताते हैं कि जहाजों पर मौजूद रसद की भी एक सीमा होती है और नियमों के मुताबिक 45 दिन का ड्राई प्रोविजन शिप पर रहना चाहिए. इसमें दाल, चावल और आटा जैसा सामान आता है. लेकिन फल-सब्जियों जैसा फ्रेश प्रोविजन हर 10 से 15 दिन में किसी भी पोर्ट से उठाया जाता है. लेकिन अगर कोई जहाज बिना एंकर पर आए ज्यादा दिन तक समंदर में ही रहता है तो इस सामान की किल्लत होने लगती है.

दर्शन बताते हैं कि एक जहाज पर 15-20 लोगों का क्रू रहता है, जिसमें कैप्टन से लेकर सेकंड ऑफिसर, थर्ड ऑफिसर तक, अलग-अलग स्टाफ शामिल है. थर्ड ऑफिसर का मुख्य काम नेविगेशन का रहता है और उसी के दिखाए रास्ते पर समंदर में जहाज अपना रास्ता तय करता है. इसके अलावा एक जहाज की यात्रा में कई पार्टी शामिल होती हैं. मसलन कार्गो सप्लाई करने वाली कंपनी से लेकर इसकी रिसीवर कंपनी, जहाज की मालिकाना कंपनी और जिन-जिन देशों से होकर जहाज गुजरता है, वहां का स्थानीय प्रशासन भी इस पूरी सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है. वह बताते हैं कि संकट के समय में सबसे पहले जल क्षेत्र में काम करने वाली नेवल फोर्स ही उनकी पहली रक्षक होती है.
नाविकों के लिए आया नया सर्कुलर
वेस्ट एशिया में जंग के हालात पर बात करते हुए एक अन्य थर्ड ऑफिसर शुभम पोरिया ने बताया कि अभी नाविकों के लिए नया सर्कुलर आया है जिसमें आप किसी भी ऑफिसर को शिप पर रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकते. मुख्य तौर पर यह सर्कुलर हॉर्मुज या फिर ओमान की खाड़ी से होकर गुजरने वाले जहाजों पर लागू है, जो अभी हाई रिस्क एरिया में आते हैं. शुभम ने बताया कि अगर कोई नाविक वॉर जोन में जाने से मना करते हुए ड्यूटी छोड़कर जहाज से उतरना चाहता है, तब भी उसे कंपनी की तरफ से दो महीने की बेसिक सैलरी का भुगतान किया जाएगा. लेकिन पहले ऐसा नहीं था.
शुभम ने बताया कि पहले हमें अपने कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक चलना होता था और जहां भी शिप जाएगा वहां जाना पड़ता था, हम उसे मानने के लिए बाध्य थे. हालांकि कंपनी रिस्क एरिया में जाने वाले नाविकों को ज्यादा भुगतान करती थी. लेकिन तब वॉर जोन के अलावा कहीं और के लिए ना करने का ऑप्शन नहीं था. हालिया सर्कुलर में अगर कोई नाविक किसी भी देश में साइनऑफ मतलब शिप से उतरता भी है तो कंपनी उस देश से गंतव्य तक की यात्रा का खर्च भी वहन करेगी. लेकिन पोर्ट्स के सुरक्षा हालात, फ्लाइट्स की उपलब्धता को देखते हुए यह फिलहाल काफी मुश्किल है. बावजूद इसके शुभम कहते हैं कि जंग के हालात में ये सर्कुलर हम नाविकों के लिए संजीवनी के समान है, जहां हमारी सुरक्षा को सुनिश्चित किया गया है.

थर्ड ऑफिसर दर्शन सिंह ने बताया कि हमें अप्रैल के आखिर में शिप जॉइन करना है लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए शायद ही हम अभी ड्यूटी जॉइन करें. उन्होंने कहा कि रोजाना हालात बिगड़ रहे हैं. अब यह जंग एनर्जी वॉर में बदल चुकी है और एक-दूसरे के एनर्जी प्लांट्स को टारगेट किया जा रहा है. दर्शन थोड़ा रुकते हैं और कहते हैं कि जंग में लाइन ऑफ एक्शन पर सबसे पहले नाविक ही आते हैं और वही इस जंग से प्रभावित होने वाले पहले शख्स होंगे. भले ही वह शिप पर हों, पोर्ट पर हों या फिर अपने घर पर.
जहाज पर भी पानी की किल्लत!
दर्शन ने बताया कि जो नाविक शिप पर हैं वे अभी साइनऑफ नहीं कर सकते, क्योंकि जो घर पर हैं वे अभी शिप को जॉइन नहीं करना चाहते. बगैर रिलीवर के किसी भी नाविक को शिप से उतरने की इजाजत नहीं दी जा सकती. पहले से ही जहाज पर सीमित संख्या में क्रू रहता है और बीच समंदर उनका कोई रिप्लेसमेंट नहीं है. मौजूदा संकट पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि समंदर में खड़े जहाज पर सिर्फ रसद का संकट नहीं है, बल्कि जहाज पर रहने वाले क्रू के सामने पानी का संकट भी पैदा हो रहा है, क्योंकि बीच समंदर में खड़ा हुआ जहाज पीने का पानी जेनरेट नहीं कर सकता.

क्या अपार समंदर में खड़े जहाज पर भी पीने के पानी का संकट पैदा हो सकता है? इस सवाल का विस्तार से जवाब देते हुए मर्चेंट नेवी में एक अन्य थर्ड ऑफिसर चक्रधर सिंह ने बताया कि शिप पर हम अपने इस्तेमाल के लिए फ्रेश वाटर जेनरेट करते हैं. उन्होंने कहा कि जब समंदर में जहाज चलता है तब खारे पानी को रिवर्स ऑस्मोसिस प्रोसेस के जरिए मीठे पानी में बदला जाता है. इसके बाद उसमें मिनिरल्स भी एड किए जाते हैं और फिर क्रू के लिए सभी कैबिन में उस पीने लायक पानी की सप्लाई की जाती है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पोर्ट पर खड़े किसी शिप में या फिर किनारे पर आ चुके जहाज में यह प्रोसेस नहीं हो सकता, क्योंकि इसके लिए गहरे पानी की जरूरत होती है.
बाहर से पीने के पानी की सप्लाई मुश्किल
चक्रधर बताते हैं कि शिप पर फ्रेश वाटर तभी जेनरेट होगा, जब शिप खुले समंदर में चलता है. अगर शिप किसी पोर्ट पर दो-तीन दिन तक खड़ा है तो ऐसे में स्टोर किए गए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन पानी को स्टोर करने की भी सीमा होती है और जहाज पर 7-8 दिन का पानी ही जमा किया जा सकता है. अगर कोई जहाज पोर्ट पर ज्यादा दिन खड़ा रहता हो तो हमें टैंकर के जरिए बाहर से पानी की सप्लाई लेनी पड़ती है. लेकिन वॉर जोन में किसी भी जहाज को छोटी नाव या जेटी के जरिए बाहर से पानी की सप्लाई देना काफी जोखिम भरा हो सकता है. इससे साफ है बीच समंदर में जो जहाज 10-15 दिन या उससे भी ज्यादा समय से फंसे हुए हैं, वहां पानी की किल्लत हो रही होगी.
कहने को समंदर में पानी का भंडार है. बावजूद इसके ऐसे मुश्किल हालात में जहाज पर इस्तेमाल करने योग्य पानी की कमी है. तीनों नाविकों के साथ बातचीत से यह बात निकलकर आई है कि संकट के हालात में जहाज पर चुनौतियों का अंबार है. लेकिन इन मुश्किलों को पार करते हुए ही जंग के बीच से दुनिया के तमाम देशों में जरूरी सामानों की सप्लाई की जा रही है.