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होर्मुज खोलने के लिए MBS का गेम प्लान, ये है लेबनान सीजफायर की INSIDE STORY

लेबनान में हुआ सीजफायर सिर्फ एक सैन्य समझौता नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चली बड़ी कूटनीतिक रणनीति का नतीजा है. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप पर दबाव बनाकर यह डील करवाई. मकसद था होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना और ईरान के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना. इस पूरी कहानी में पाकिस्तान भी अहम भूमिका निभाता दिख रहा है.

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लेबनान में सीजफायर के लिए MBS ने ट्रंप पर बनाया दबाव. (Photo- Reuters)
लेबनान में सीजफायर के लिए MBS ने ट्रंप पर बनाया दबाव. (Photo- Reuters)

मध्य पूर्व की राजनीति में जो दिखता है, अक्सर उससे कहीं ज्यादा पर्दे के पीछे चल रहा होता है. लेबनान में हाल ही में लागू हुआ सीजफायर भी कुछ ऐसा ही है. ऊपर से यह अमेरिका की पहल और डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक सफलता नजर आता है, लेकिन असल कहानी कहीं ज्यादा दिलचस्प है. इस पूरी डील के पीछे सबसे अहम भूमिका सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की मानी जा रही है.

एक रिपोर्ट की मानें तो मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से एक निजी फोन कॉल पर साफ कहा कि अगर ईरान के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना है और क्षेत्र में स्थिरता लानी है, तो लेबनान में सीजफायर बेहद जरूरी है. दरअसल, सऊदी अरब का सबसे बड़ा लक्ष्य इस समय होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खुलवाना है, जो वैश्विक तेल सप्लाई का अहम रास्ता है. अगर यह रास्ता बंद रहता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है और सबसे ज्यादा दबाव खाड़ी देशों पर आता है.

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यही वजह है कि सऊदी अरब ने अपनी रणनीति बदली और सीधे युद्ध की बजाय कूटनीति पर जोर दिया. MEE की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिमी और अरब अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप द्वारा घोषित 10 दिन के सीजफायर के पीछे सऊदी लॉबिंग का बड़ा हाथ था. हालांकि, अब भी यह साफ नहीं है कि इजरायल इस समझौते का पूरी तरह पालन करेगा या नहीं, और ट्रंप इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर कितना दबाव बना पाएंगे.

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ईरान की शर्तों पर MBS ने ट्रंप पर बनाया दबाव

इस पूरी कहानी में ईरान का रुख भी अहम है. ईरान पहले से ही यह शर्त रख चुका था कि जब तक लेबनान में शांति नहीं होती, तब तक अमेरिका के साथ कोई ठोस बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी. हिज्बुल्लाह लेबनान में ईरान समर्थित ताकत है. वह भी इस समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है. ऐसे में लेबनान का सीजफायर, अमेरिका-ईरान बातचीत के लिए एक जरूरी कदम बन गया.

मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान की शर्तों को आधार बनाकर ही ट्रंप पर दबाव बनाया. फोन कॉल उन्होंने जोर देकर ट्रंप से कहा कि मिडिल ईस्ट में तभी शांति आएगी और सीजफायर तभी टिकेगा जब लेबनान में इजरायल हमला रोकेगा. बताया जा रहा है कि इसके बाद ट्रंप ने नेतन्याहू को सीजफायर के लिए राजी किया.

शहबाज-मुनीर के सिर पर भी MBS का हाथ!

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे कूटनीतिक खेल में पाकिस्तान भी एक अहम कड़ी बनकर उभरा है. इस्लामाबाद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने का मंच बन रहा है. लेकिन जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान अकेले यह भूमिका नहीं निभा सकता था. इसके पीछे सऊदी अरब का समर्थन और आर्थिक मदद भी शामिल है. हाल ही में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज देने का फैसला किया है, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति को मदद मिली.

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ईरान जंग में सऊदी का डबल गेम

सऊदी अरब की रणनीति को एक तरह से "डबल गेम" भी कहा जा सकता है. एक तरफ उसने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बनाए रखा, यहां तक कि अपने एयरबेस का इस्तेमाल भी करने दिया. MEE ने ही सबसे पहले बताया था कि उसने ताइफ में किंग फहद एयर बेस को US के लिए खोल दिया है. यह तब हुआ था जब ईरानी हमलों ने प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर तबाही मचा दी थी. वहीं दूसरी तरफ, अब वह तनाव कम करने और शांति बहाल करने की दिशा में काम कर रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक एक पश्चिमी अधिकारी ने इसे संतुलन बनाकर चलने की कोशिश बताया. इसके अलावा, सऊदी अरब नहीं चाहता कि संघर्ष और बढ़े. हालांकि उसके पास ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है, जिससे वह होर्मुज को बायपास कर सकता है, लेकिन क्षेत्र में अस्थिरता उसके लिए भी खतरा है. खासतौर पर यमन में हूती विद्रोहियों की वजह से बाब-अल-मंदेब जैसे दूसरे अहम समुद्री रास्ते भी खतरे में हैं.

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