मिडिल ईस्ट में मचे घमासान के बीच एक ऐसी खबर आई है जो थोड़ी राहत भी देती है और थोड़ी चिंता भी. ईरान के एक सीनियर अधिकारी ने इशारों-इशारों में बताया है कि परदे के पीछे की बातचीत यानी 'डिप्लोमेसी' अभी थमी नहीं है. सबसे बड़ी बात ये है कि इस लड़ाई को शांत करवाने के लिए अब तुर्की और पाकिस्तान ने बिचौलिए की भूमिका निभानी शुरू कर दी है. ये दोनों देश मिलकर ईरान और अमेरिका के बीच कोई ऐसा बीच का रास्ता ढूंढ रहे हैं, जिस पर दोनों राजी हो सकें.
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, ईरानी अधिकारी का कहना है कि अगर अमेरिका अपनी जिद छोड़कर जमीनी हकीकत को समझे, तो आगे बढ़ने का रास्ता निकल सकता है. हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि अभी तक आमने-सामने बैठकर चर्चा करने की कोई तैयारी नहीं हुई है. फिलहाल ऐसा कोई रास्ता या प्लान नहीं दिख रहा है जिसे देखकर लगे कि सुलह हो जाएगी. यानी पर्दे के पीछे कोशिशें तो चल रही हैं, लेकिन अभी बात बनती नजर नहीं आ रही है.
सुलह कराने की इन कोशिशों के बीच ईरान ने अपनी स्थिति भी साफ कर दी है. पाकिस्तान ने जो प्रस्ताव दिया था, उस पर ईरान ने शुरुआती जवाब देते हुए कहा है कि इस ऑफर में दम नहीं है. ईरानी अधिकारी के मुताबिक, जो शर्तें सामने रखी गई हैं, उनमें कामयाबी की गुंजाइश न के बराबर है. सीधे शब्दों में कहें तो, जब तक ईरान की कम से कम मांगें भी पूरी नहीं होतीं, तब तक वे किसी भी समझौते के मूड में नहीं दिख रहे हैं.
क्या शांत होगी जंग की आग?
भले ही तुर्की और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश एक राय बनाने की कोशिश में जुटे हों, लेकिन सुलह की राह अभी बहुत मुश्किल है. ईरान का साफ कहना है कि जब तक अमेरिका का नजरिया नहीं बदलता, तब तक किसी भी तरह की बातचीत का कोई मतलब नहीं रह जाता. अब सबकी नजरें इस पर हैं कि क्या पाकिस्तान और तुर्की की ये मध्यस्थता रंग लाएगी या फिर ये जंग और भी भयानक मोड़ लेगी.