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ईरान ने फारस की खाड़ी में US की एंट्री रोकी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी बंद! भारत पर क्या होगा असर

अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद ईरान ने होर्मुज की खाड़ी बंद कर दी है, जिससे वैश्विक तेल और गैस व्यापार प्रभावित हो सकता है. यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर पर हमले की धमकी दी है. इधर, ईरान ने अमेरिकी जहाजों के लिए फारस की खाड़ी बंद कर दी है. अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों पर इस तरह की रुकावट से वैश्विक व्यापार प्रभावित होगा और भारत पर भी असर होगा.

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ईरान ने होर्मुज बंदरगाह बंद कर दिया है जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है (Photo: Reuters/PTI)
ईरान ने होर्मुज बंदरगाह बंद कर दिया है जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है (Photo: Reuters/PTI)

अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर जबरदस्त हमला कर पूरे मध्य-पूर्व को युद्ध की आग में झोंक दिया है. लेकिन इस युद्ध का असर केवल मध्य-पूर्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में इसकी तपन अभी से महसूस होने लगी है. ईरान ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज की खाड़ी को बंद कर दिया है जिससे वैश्विक व्यापार पर संकट के बादल छा गए हैं. ईरान के प्रॉक्सी ग्रुप यमन के हूती विद्रोहियों ने भी कह दिया है कि वो ईरान के समर्थन में लाल सागर (रेड सी) और इजरायल से जुड़े जहाजों पर हमले करेंगे.

इस बीच ईरान के शीर्ष अधिकारी मोहसिन रजाई ने घोषणा की है कि अब फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में अमेरिकी जहाजों के लिए एंट्री बंद कर दी गई है. रजाई ने कहा कि अमेरिकी जहाजों को अब फारस की खाड़ी में आने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने 28 फरवरी 2026 को होर्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों को VHF रेडियो ट्रांसमिशन के जरिए वॉर्निंग दी. वॉर्निंग में कहा गया कि 'कोई जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से नहीं गुजर सकता' और यह 'असुरक्षित' है. 

IRGC की वॉर्निंग के कारण होर्मूज की खाड़ी में जहाजों का ट्रैफिक 70% तक गिर गया है, और कई टैंकरों ने अपना रास्ता बदल लिया है. ईरान और अमेरिका-इजरायल का यह युद्ध वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला सकता है क्योंकि होर्मुज की खाड़ी दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस निर्यात मार्ग है.

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तेल-गैस व्यापार के लिए बेहद अहम है होर्मुज की खाड़ी

होर्मुज की खाड़ी ईरान और ओमान के बीच स्थित है जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ती है. यह बेहद संकरी खाड़ी है जिसकी एक जगह चौड़ाई मात्र 21 मील (लगभग 34 किलोमीटर) रह जाती है. 

यह रास्ता सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कुवैत जैसे प्रमुख तेल उत्पादकों के लिए मुख्य निर्यात द्वार है. इस संकरे समुद्री मार्ग से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा और रिफाइंड तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल खपत का लगभग पांचवां हिस्सा है. अगर यह सप्लाई रुकती है तो भारत, चीन जैसी एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर व्यापक असर पड़ेगा. 

होर्मुज की खाड़ी बंद होने से दुनिया पर क्या असर होगा?

होर्मुज की खाड़ी से मुख्यतः ऊर्जा का व्यापार होता है इसलिए इसे तेल और गैस के लिए जीवनरेखा माना जाता है. कुल समुद्री तेल व्यापार का 27% और वैश्विक तरल पेट्रोलियम उत्पादों का 25% इसी रास्ते से होता है. 

LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस): वैश्विक LNG व्यापार का 20% यहां से गुजरता है, मुख्य रूप से कतर और UAE इस रास्ते से अपना LNG दुनिया को बेचते हैं. इस रास्ते से गुजरने वाला 84% तेल और 83% LNG एशियाई बाजारों (चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया) को जाता है. 

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अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है तो इसके विकल्प के रूप में सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इस्तेमाल की जा सकती है. लेकिन यह पाइपलाइन महज 5 मिलियन बैरल प्रति दिन ही संभाल सकती है. 

वैश्विक तेल बाजार पर असर

होर्मुज की खाड़ी को बंद करने की ईरान की चेतावनी के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें पहले ही 73 डॉलर से ऊपर पहुंच गई हैं, और एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि संघर्ष अगर जारी रहा तो तेल की कीमतें 5-10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ सकती हैं. 

ब्रिटेन स्थित मल्टीनेशनल बैंक Barclays के एनर्जी एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं.

पेट्रोलियम एक्सपर्ट Patrick De Haan ने यूएसए टुडे से बात करते हुए कहा, 'सप्लाई में रुकावट इस बात पर निर्भर करेगी कि संघर्ष कितने समय तक चलता है.'

भारत पर क्या असर होगा?

अगर होर्मुज की खाड़ी लंबे समय तक बंद रहती है तो भारत पर बड़ा असर देखने को मिल सकता है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है जो अपने इस्तेमाल के 85% से अधिक कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर है.

भारत का लगभग 50% क्रूड आयात (लगभग 2.5-2.7 मिलियन बैरल प्रति दिन) इस रास्ते से गुजरता है. भारत इस रास्ते से इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से तेल, गैस मंगाता है. 

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हाल के महीनों में रूस से कच्चा तेल आयात कम होने के कारण मध्य पूर्व पर भारत की निर्भरता बढ़ी है.  इसके अलावा, 54% LNG आयात भी इसी रास्ते से होता है. 

जैसा कि एक्सपर्ट्स कह रहे हैं, अगर तेल कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का आयात बिल सालाना 13-14 अरब डॉलर बढ़ सकता है. इससे ईंधन की कीमतें ऊपर जाएंगी और महंगाई बढ़ेगी.

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