
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने एक बार फिर दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अहमियत को सामने ला दिया है. लेकिन इस बार कहानी सिर्फ जंग की नहीं है, बल्कि उस डर की है, जिसने खाड़ी देशों को अपनी दशकों पुरानी रणनीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल यह है कि अगर होर्मुज पर ईरान का दबदबा लंबे समय तक बना रहा, तो क्या दुनिया की ऊर्जा सप्लाई इसी तरह जोखिम में रहेगी?
इसी चिंता ने अब खाड़ी देशों को एक बड़े फैसले की ओर धकेल दिया है और वो है होर्मुज को बाइपास करने का प्लान. यानी ऐसा विकल्प, जिसमें तेल और गैस की सप्लाई इस समुद्री रास्ते पर निर्भर न रहे. यह आसान नहीं है, सस्ता भी नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में इसे जरूरी माना जा रहा है.
दरअसल, दुनिया की करीब 20% तेल और गैस सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. लेकिन ईरान के बढ़ते नियंत्रण और हालिया जंग के बाद यह मार्ग बेहद असुरक्षित हो गया है. ड्रोन हमले, समुद्री माइंस और मिसाइल खतरे ने इसे एक "चोक पॉइंट" बना दिया है. ऐसे में खाड़ी देशों को यह एहसास हो गया है कि अगर इस रास्ते पर निर्भरता कम नहीं की गई, तो हर संकट के समय उनकी अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ सकती है.
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युद्ध में ऑयल पाइपलाइन बनी गल्फ की लाइफलाइन
यही वजह है कि अब पुराने पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स को फिर से जिंदा करने की बात हो रही है. सऊदी अरब की 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान बनाई गई यह पाइपलाइन आज भी एक लाइफलाइन बनी हुई है. यह रोजाना करीब 70 लाख बैरल तेल को रेड सी के यनबू पोर्ट तक पहुंचाती है, वह भी बिना होर्मुज से गुजरे.

सऊदी की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको के प्रमुख अमीन नासिर ने हाल ही में कहा कि यही पाइपलाइन इस वक्त सबसे अहम रूट बन गई है. अब सऊदी अरब इस पर विचार कर रहा है कि इसकी क्षमता और बढ़ाई जाए या नई पाइपलाइनों का नेटवर्क तैयार किया जाए, ताकि उसके कुल 1.02 करोड़ बैरल रोजाना उत्पादन का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्तों के बजाय जमीन के रास्ते भेजा जा सके.
यूनाइटेड अरब अमीरात भी तलाश रहा विकल्प
सिर्फ सऊदी ही नहीं, बल्कि यूएई भी अपने विकल्पों पर काम कर रहा है. अबू धाबी पहले से ही फुजैरा तक पाइपलाइन चला रहा है, जो होर्मुज को बायपास करती है. अब इसे और मजबूत करने और नई लाइन जोड़ने की योजना पर विचार हो रहा है.
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हालांकि, यह रास्ता जितना जरूरी दिखता है, उतना ही मुश्किल भी है. विशेषज्ञों के मुताबिक, नई पाइपलाइन बनाना बेहद महंगा सौदा है. सिर्फ सऊदी जैसी पाइपलाइन को दोबारा बनाना ही कम से कम 5 अरब डॉलर का खर्च ला सकता है. अगर कई देशों को जोड़ने वाला नेटवर्क बनाया गया, तो यह लागत 15 से 20 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है.
इराक, सीरिया जैसे इलाकों में टेरर अटैक का खतरा
सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है. इराक, सीरिया जैसे इलाकों से गुजरने वाली पाइपलाइनों को आतंकी खतरों, पुराने बमों और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है. वहीं, ओमान की तरफ जाने वाले रास्ते रेगिस्तान और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरते हैं, जिससे निर्माण और मुश्किल हो जाता है.

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राजनीतिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े होते हैं. जैसे कि कौन इस नेटवर्क को कंट्रोल करेगा? तेल का फ्लो किसके हाथ में होगा? क्या खाड़ी देश अपनी अलग-अलग नीतियों को छोड़कर एक साझा सिस्टम पर काम करेंगे? यही वजह है कि अब तक ऐसे कई प्रोजेक्ट्स कागजों से बाहर नहीं निकल पाए थे.
लेकिन इस बार हालात अलग हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अब चर्चा सिर्फ "आइडिया" तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे जमीन पर उतारने की सोच बन रही है. कुछ योजनाओं में भारत से लेकर यूरोप तक जाने वाले कॉरिडोर की भी बात हो रही है, जिससे तेल-गैस के साथ-साथ व्यापार के नए रास्ते खुल सकते हैं.
फिलहाल, सबसे व्यवहारिक कदम यही माना जा रहा है कि मौजूदा पाइपलाइनों की क्षमता बढ़ाई जाए. सऊदी अरब रेड सी के तट पर नए एक्सपोर्ट टर्मिनल बनाने पर भी विचार कर सकता है, खासकर NEOM जैसे प्रोजेक्ट्स के तहत लेकिन इसको लेकर फिलहाल किसी तरह का फैसला नहीं लिया गया है.