
सोचिए, नील से लेकर यूफ्रेट्स, यानी फरात नदी तक फैली एक बहुत बड़ी ज़मीन. एक ऐसा इलाका, जिसमें पूरा फिलिस्तीन, लेबनान, जॉर्डन, आधा सीरिया, दो-तिहाई इराक, मदीना समेत सऊदी अरब का एक-तिहाई हिस्सा और मिस्र का आधा सिनाई शामिल है. जायोनिस्ट यहूदियों के लिए यही वह "प्रॉमिस्ड लैंड" है, जो बाइबिल के मुताबिक गॉड ने उनके पूर्वज इब्राहिम को, सिर्फ उनके लिए, गिफ्ट की थी. आज इसी आइडिया को जायोनिस्ट "ग्रेटर इजरायल" कहते हैं.
नया विवाद तब खड़ा हो गया जब इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने इस'ग्रेटर इजरायल' की कल्पना का समर्थन किया. एक ईसाई जायोनिस्ट हकाबी ने कहा, "अगर वे (इजरायल) सब कुछ ले लें (पूरी जमीन पर कब्जा कर लें) तो अच्छा होगा. इजरायल एक ऐसी जमीन है जिसे गॉड ने इब्राहिम के जरिए उन लोगों को दिया, जिन्हें उन्होंने चुना था. यह एक शख्स, एक जगह, और एक मकसद की बात है."
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माइक हकाबी के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में फिर उबाल है. अरब देशों में हलचल तेज हो गई. उन्होंने इसका कड़े शब्दों में विरोध किया. खाड़ी मुल्कों के साथ इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्की और फिलिस्तीन जैसे देशों ने भी हकाबी के बयान का कड़ा विरोध किया, और उनके बयान को "खतरनाक और भड़काऊ" और "क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा" बताया.
इजरायल द्वारा किया जा रहा "प्रॉमिस्ड लैंड" का दावा क्या सच में एक पवित्र वादा है? और अगर ऐसा है, तो फिर यह इब्राहिम के पूरे परिवार - यानी मुसलमानों और ईसाइयों - के लिए क्यों नहीं है. साथ ही हम यह भी समझेंगे कि तथाकथित "ग्रेटर इजरायल" के जरिए किस तरह जायोनिस्ट सोच के यहूदी अपने विस्तारवादी एजेंडे को खुले तौर पर साकार करने की कोशिश कर रहे हैं.
इब्राहिम के वंशजों के लिए गॉड गिफ्ट सिर्फ यहूदियों के लिए क्यों?
दावा है कि 4,000 साल से भी पहले, बाइबिल - यानी यहूदियों की किताब तोराह - में बताया गया कि गॉड ने इब्राहिम को ज़मीन देने का वादा किया था. यहूदियों के मुताबिक, जेनेसिस में गॉड की तरफ से इब्राहिम से किए गए वादे के साथ लिखा है, "मैं तुम्हारे वंशजों को ये ज़मीन देता हूं - मिस्र की वादी से लेकर ग्रेट रिवर यूफ्रेट्स तक"

ज़्यादातर जानकार "मिस्र की वादी" को आज की वादी अल-आरिश मानते हैं, जो मिस्र के सिनाई पेनिनसुला में एक मौसमी नदी है और प्राचीन समय में कनान और मिस्र के बीच बॉर्डर बनाती थी. कनान, जिसमें आज का इजरायल-फिलिस्तीन शामिल है. इसी क्षेत्र में लेबनान, जॉर्डन और सीरिया के हिस्से भी आते हैं. ऐतिहासिक रूप से इसे जॉर्डन नदी के पश्चिम का इलाका बताया गया है.
हालांकि, कई यहूदी स्कॉलर बाइबिलिक वादे के मुताबिक "मिस्र की वादी" को नील नदी की पूर्वी शाखा मानते हैं. वहीं यूफ्रेट्स - मिडिल ईस्ट, या कहें पश्चिमी एशिया - की लगभग 2800 किलोमीटर लंबी सबसे बड़ी नदियों में से एक है, जो तुर्की से निकलकर सीरिया और इराक होते हुए फारस की खाड़ी तक बहती है. यहूदी इसी नील नदी के हिस्से से लेकर यूफ्रेट्स नदी तक फैले क्षेत्र को "प्रॉमिस्ड लैंड" कहते हैं.
इस्लामिक मान्यता के हिसाब से यूफ्रेट्स को फरात कहा जाता है. "फरात" का मतलब होता है मीठा और ताज़ा पानी, और इसका ज़िक्र क़ुरआन में भी आता है. लेकिन इस्लामिक स्कॉलर्स के मुताबिक, क़ुरआन में सीधे तौर पर किसी "प्रॉमिस्ड लैंड" का जिक्र नहीं मिलता. जायोनिस्ट यहूदी इस इलाके को इब्राहिम के बेटे इसहाक के जरिए गॉड का दिया हुआ गिफ्ट मानते हैं. उनका कहना है कि यह इलाका उनके विश्वास और पहचान का केंद्र है. लेकिन यहां एक ट्विस्ट है. मुसलमानों का विश्वास है कि वे इब्राहिम के बड़े बेटे इस्माइल के वंशज हैं. इब्राहिम के दो बेटे थे, और दोनों की माएं अलग थीं.
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कहा जाता है कि इब्राहिम ने अल्लाह के हुक्म से इस्माइल और उनकी मां को आज के सऊदी अरब में शामिल हिजाज़ ले जाकर छोड़ दिया था, जबकि इसहाक और उनकी मां कनान में ही रहे, जिसमें आज का मॉडर्न इजरायल शामिल है. इस्माइल बड़े थे और इसहाक छोटे. इस्माइल की विरासत मोहम्मद तक पहुंची, जिनके अनुयायी मुसलमान - उम्मत - कहलाते हैं. वहीं इसहाक की विरासत सुलेमान तक पहुंची, जिन्होंने यरूशलम में वो इबादतगाह तैयार की, जिसे यहूदी सोलोमन टेंपल मानते हैं.
इसे आक्रमणकारियों और रोमन साम्राज्य के दौर में दो बार तोड़ा गया. इसी की तर्ज पर कुछ जायोनिस्ट यहूदी आज थर्ड टेंपल बनाना चाहते हैं. पवित्र किताब क़ुरआन में भी इब्राहिम और उनके बेटों का ज़िक्र है, और उन्हें कहा गया है. इब्राहिम द्वारा दी गई कुर्बानी की परंपरा की याद में मुसलमान बकर-ईद के मौके पर कुर्बानी देते हैं और हज के लिए मक्का-मदीना जाते हैं. इनके अलावा मोहम्मद ने भी नील और फरात यानी यूफ्रेट्स नदियों को खास बताया है. एक वाकिया है कि मोहम्मद ने कहा था कि नील और फरात ऐसी नदियां हैं जिनका ताल्लुक जन्नत से है, यानी इनके सोर्स जन्नत से जुड़े हैं.
मेराज की रात, जब मोहम्मद आसमानी यात्रा पर गए, तो उन्होंने सातवें आसमान पर सिदरतुल-मुन्तहा के पास चार नदियां बहती देखीं. उनमें से दो नदियां जन्नत में थीं और दो धरती पर दिखाई दे रही थीं. उन्होंने बताया कि धरती पर जो दो नदियां दिखीं, वे नील और फरात थीं. ईसाई भी इब्राहिम को अपना स्पिरिचुअल पिता मानते हैं. आज अमेरिका से लेकर यूरोप तक में रहने वाले कई ईसाई यहूदियों के "ग्रेटर इज़रायल" के विचार का समर्थन करते हैं.

हालांकि, बाइबिल में यह भी कहा गया है कि यहूदियों ने जीसस को सूली पर चढ़ा दिया था. खैर, 1965 में एक दस्तावेज के जरिए वेटिकन ने आधिकारिक तौर पर कहा कि जीसस यानी ईसा मसीह की मृत्यु के लिए सभी यहूदियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. यहां गौर करने वाली बात ये है कि बाइबिल कोई इतिहास की किताब नहीं, बल्कि आस्था की किताब है. जमीन के दावे के मालिकाना हक के कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं.
फिर भी, कुछ यहूदियों - खासकर धार्मिक जायोनिस्ट - के लिए यह वादा आज इजरायल के विस्तारवाद का आधार बनता है. अगर आध्यात्मिक रूप से जमीन का वादा इब्राहिम के "वंशजों" के लिए है, तो क्या इसमें मुसलमान और ईसाई शामिल हैं. यही साझा फैमिली ट्री इस झगड़े को और गहरा बनाती है. यह ऐसा है जैसे भाई विरासत के लिए आपस में लड़ रहे हों.
गॉड का वादा आज का प्लान कैसे बन गया?
1800 के दशक में यूरोप में यहूदियों को भारी नफरत और भेदभाव का सामना करना पड़ता था. ब्लैक डेथ प्लेग के दौरान अक्सर उन्हें जबरन दोषी ठहराया जाता, और कई जगह उनकी हत्या तक कर दी जाती थी. 1894 में फ्रांस में एक यहूदी ऑफिसर, अल्फ्रेड ड्रेफस को देशद्रोह के आरोप में गलत तरीके से जेल में डाल दिया गया. दावा किया जाता है कि ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि वह यहूदी था. थियोडोर हर्जल नाम के एक यहूदी पत्रकार भी उस समय यूरोप में थे. ड्रेफस विवाद के बाद उन्होंने यहूदियों के लिए एक सुरक्षित देश की अवधारणा पेश की.
1896 में उन्होंने अपनी किताब The Jewish State में इसकी रूपरेखा बताई, और 1897 में पहली जायोनी कांग्रेस में इस पर विस्तार से चर्चा हुई. फिलिस्तीन को उन्होंने उसके बाइबिल इतिहास की वजह से चुना. हर्जल की डायरियों में "मिस्र की नील नदी से लेकर फरात नदी तक" फैली जमीन का जिक्र मिलता है. उन्होंने एक देश स्थापित करने के लिए ऑटोमन सुल्तान से जमीन खरीदने की कोशिश भी की, लेकिन ऑटोमन हुकूमत ने इससे इनकार कर दिया.
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कहा ये भी जाता है कि ऑटोमन को यहूदियों के भविष्य के प्लान की भनक थी. इस बीच यूरोप में यह मुद्दा तेजी से उभर चुका था. यहूदी नेता ब्रिटिश के पास गए और ब्रिटिश हुकूमत ने एक देश बनाने के लिए युगांडा का सुझाव दिया, लेकिन जायोनी फिलिस्तीन ही चाहते थे.
क्या ग्रेटर इजरायल सिर्फ आस्था है, या पॉलिटिकल प्रोपेगैंडा?
1982 में ओडेड यिनोन नाम के एक जायोनिस्ट विचारक ने अपने एक लेख में इज़रायल की सुरक्षा के लिए अरब मुल्कों को तोड़ने और उन्हें आपस में उलझाए रखने की अवधारणा पेश की थी. उन्होंने सुझाव दिया था कि मिस्र में ईसाई और मुस्लिम इलाकों को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया जाना चाहिए. सीरिया और इराक भी धर्म और संप्रदाय के आधार पर बंट जाएं - जैसे शिया, सुन्नी और ड्रूज़. इतना ही नहीं, उन्होंने जॉर्डन को पूरी तरह खत्म कर देने की वकालत भी की थी.
कुछ लोगों को लगता है मानो इसी तरह की सोच के साथ इज़रायल काम कर रहा हो. खाड़ी क्षेत्र के कई देश आज अस्थिर हैं और आपसी टकराव में उलझे हुए हैं. सऊदी अरब और यूएई आपस में लड़ रहे हैं. सीरिया और इराक लंबे समय से धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों से जूझ रहे हैं. इसी "डिवाइड एंड रूल" जैसी नीतियों के संदर्भ में कुछ विश्लेषक मानते हैं कि इज़रायल धीरे-धीरे खुद को मजबूत बनाने की दिशा में बढ़ रहा है.

साल 2015 में सॉल कोहेन नाम के एक अन्य यहूदी लेखक ने अपनी किताब में मध्य पूर्व को "शैटरबेल्ट" यानी टूटा-फूटा और अस्थिर इलाका बताया था. उनका मानना था कि देश भी जीवित इकाइयों की तरह बढ़ते और बदलते हैं, इसलिए भविष्य में यहां और छोटे-छोटे देश बन सकते हैं. उन्होंने कुछ नक्शों में अरब देशों को कमजोर या अस्थिर रूप में दिखाया, जबकि इजरायल को इसके मुकाबले मजबूत स्थिति में दर्शाया.
आलोचकों का कहना है कि ऐसी सोच कभी-कभी विस्तारवाद को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल होती है, जैसे पहले यह तर्क दिया जाता था कि जमीन खाली है और उसे बसाया जा सकता है और इस आधार पर कब्जा कर लिया जाता था. लेकिन कई लोग मानते हैं कि इस तरह के नजरिये पक्षपाती हैं, क्योंकि इनमें अरब देशों के इतिहास और उनकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया जाता है. हाल के बयानों ने इस बहस को और तेज कर दिया है.
फास्ट फॉर्वर्ड के साथ अब हम मौजूदा हालात की बात करते हैं. अगस्त 2025 में नेतन्याहू ने एक इंटरव्यू दिया. इस दौरान होस्ट शेरोन गैल ने उन्हें एक छोटा सा ताबीज गिफ्ट किया, जिस पर एक नक्शा बना हुआ था. यह नक्शा सामान्य ग्लोबल मैप में शामिल इजरायली मैप जैसा नहीं था, बल्कि इसमें तथाकथित "ग्रेटर इज़रायल" दिखाया गया था, जिसमें जॉर्डन, सीरिया और मिस्र के कुछ हिस्से भी शामिल बताए जाते हैं. होस्ट ने पूछा, "“क्या आप इस विजन से जुड़ाव महसूस करते हैं?" तो नेतन्याहू ने तब जवाब दिया, "बहुत ज्यादा. मैं एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मिशन पर हूं… यह पीढ़ियों का मिशन है."
नेतन्याहू ने सिर्फ इतना ही नहीं कहा कि उन्हें वह नक्शा पसंद है, बल्कि उन्होंने यह भी कहा कि वे उससे "बहुत गहराई से जुड़े" हुए महसूस करते हैं. उन्होंने अपने काम को यहूदी लोगों के लिए एक आध्यात्मिक जिम्मेदारी बताया. यानी उनके लिए यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि एक मिशन जैसा है.. यह सिर्फ बयान नहीं था. उनकी सरकार पहले से ही जमीन पर ऐसे कदम उठा रही है, जिन्हें कुछ लोग इसी दिशा में बढ़ता हुआ मानते हैं. इसे "डी-फैक्टो एनेक्सेशन" कहा जाता है, यानी दुनिया के सामने आधिकारिक घोषणा किए बिना, धीरे-धीरे किसी इलाके पर नियंत्रण स्थापित करते रहना.
नेतन्याहू ने यह काम कानूनों में बदलाव करके किया. 2023 और 2024 में वेस्ट बैंक से जुड़े कई अधिकार सेना से हटाकर एक नागरिक दफ्तर को दे दिए गए, जिसकी जिम्मेदारी सरकार के समर्थन से कब्जेधारी बेसलेल स्मोट्रिच को सौंपी गई. यह सुनने में सिर्फ सरकारी कागजी कार्रवाई जैसा लग सकता है, लेकिन असल में यह बहुत बड़ा बदलाव था. इसका मतलब यह था कि उस जमीन को अब अस्थायी कब्जे वाली जगह नहीं, बल्कि इज़रायल के स्थायी हिस्से की तरह देखा जाने लगा है.
असली विवाद यही है कि कुछ यहूदी इस जमीन को ईश्वर का दिया हुआ गिफ्ट मानते हैं, जबकि मुसलमान कहते हैं कि वे भी इब्राहीम की ही औलाद हैं, तो उन्हें अलग क्यों किया जाए? इसी वजह से धर्म का सवाल राजनीति से जुड़ जाता है, और विवाद खत्म नहीं हो पाते.