मंगलवार को जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में दुनिया पहले की तुलना में अधिक खतरनाक हो गई है. ग्लोबल पीस इंडेक्स (GPI) के मुताबिक, 99 देशों में शांति की स्थिति बेहद खराब हुई है. पीस इंडेक्स लगभग दो दशक पहले शुरू हुआ था और तब से एक साल में दर्ज सबसे बड़ी गिरावट है.
इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडेक्स में शामिल 119 देशों (करीब 73%) में अब 2007 की तुलना में कम शांति है.
वहीं, दुनिया के देशों में स्टेट बेस्ड कंफ्लिक्ट्स की संख्या बढ़कर 61 हो गई है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे अधिक है.
सबसे शांतिपूर्ण और सबसे अशांत देश
लगातार 19वें साल आइसलैंड दुनिया का सबसे शांतिपूर्ण देश बना हुआ है. इसके बाद न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, स्लोवेनिया और आयरलैंड का स्थान है.
वहीं, पहली बार रूस इस लिस्ट में सबसे नीचे पहुंच गया है. उसके बाद सूडान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, यूक्रेन और इजरायल सबसे कम शांतिपूर्ण देशों में शामिल हैं.
दक्षिण एशिया में शांति में सबसे ज्यादा गिरावट, भारत की रैंकिंग क्या?
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में शांति की स्थिति सबसे तेजी से बिगड़ी है. नेपाल 26 स्थान नीचे खिसक गया, जो इस साल किसी भी देश की सबसे बड़ी गिरावट है. वहीं पाकिस्तान 152वें स्थान पर पहुंच गया. भारत की बात करें तो यह पिछले साल के अपने 115वें स्थान पर कायम है.
वहीं, अमेरिका की बात करें तो यह अपने इतिहास की सबसे खराब रैंकिंग 134वें स्थान पर पहुंच गया. इसके पीछे राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक प्रदर्शनों में बढ़ोतरी को प्रमुख कारण बताया गया है.
IEP के संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष स्टीव किलीलिया ने कहा कि दक्षिण एशिया से लेकर ईरान, पूरे मध्य पूर्व और हॉर्न ऑफ अफ्रीका तक अस्थिरता की एक लंबी पट्टी बन चुकी है, जो वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.
हिंसा की रिकॉर्ड आर्थिक कीमत चुका रही दुनिया
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में हिंसा का वैश्विक आर्थिक प्रभाव 3.2% बढ़कर 21.81 खरब डॉलर तक पहुंच गया. यह दुनिया की कुल जीडीपी का 10.5% है.
सबसे अधिक संघर्ष प्रभावित 10 देशों में हिंसा की आर्थिक लागत औसतन जीडीपी के 23.4% के बराबर है, जो दुनिया के सबसे शांतिपूर्ण देशों की तुलना में 10 गुना से भी अधिक है.
स्टीव किलीलिया ने कहा कि दुनिया 'ग्रेट फ्रैगमेंटेशन' के दौर से गुजर रही है. भू-राजनीतिक और तकनीकी बदलाव इतनी तेजी से हो रहे हैं कि शांति बनाए रखने वाली संस्थाएं और सरकारें उनके साथ कदम नहीं मिला पा रही हैं.
AI और ड्रोन बदल रहे हैं युद्ध की तस्वीर
रिपोर्ट में कहा गया है कि आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ड्रोन तकनीक ने बड़ा बदलाव ला दिया है. 2018 से 2025 के बीच ड्रोन हमलों में 11,500% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अब केवल देश ही नहीं, बल्कि 565 सशस्त्र संगठन भी ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं.
AI की वजह से टार्गेट तय करने की प्रक्रिया, जो पहले लगभग एक दिन लेती थी, अब कुछ सेकंड में पूरी हो जाती है.
स्टीव किलीलिया ने कहा कि 'AI और ड्रोन टेक्निक्स जीवन और मृत्यु से जुड़े फैसले ले रही है और इसमें इंसानों का दखल बहुत कम रह गया है. इससे आम लोगों के मरने की घटनाएं बढ़ रही हैं.'
मध्य पूर्व बना अस्थिरता का केंद्र
रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व वैश्विक अस्थिरता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. इसमें ईरान के साथ युद्ध को एक विशाल भू-राजनीतिक फोर्स मल्टीप्लायर बताया गया है, जिसका असर संघर्ष क्षेत्र से कहीं आगे तक फैल रहा है.
इंडेक्स में 163 देशों में इजरायल 159वें स्थान पर है, यानी वो दुनिया के पांच सबसे कम शांतिपूर्ण देशों में शामिल है.
वहीं, गाजा पट्टी में लगभग 81% इमारतें क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं और संघर्ष में मरने वालों की कुल संख्या 1 लाख से अधिक होने का अनुमान है.
अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और सैन्य खर्च में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2008 में 59 देश बाहरी संघर्षों में शामिल थे, जबकि 2026 में यह संख्या बढ़कर 103 हो गई है. इससे साफ है कि युद्ध अब पहले से कहीं अधिक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ले चुके हैं.
साथ ही, 2025 में वैश्विक सैन्य खर्च रिकॉर्ड 2.9 खरब डॉलर तक पहुंच गया. यूक्रेन पर रूस के 2022 के आक्रमण के बाद यूरोप ने दशकों से चली आ रही सैन्य कटौती की नीति को उलट दिया है. अमेरिका को छोड़कर अन्य देशों का सैन्य खर्च 9.2% बढ़ा है.
रिपोर्ट में सूडान के गृहयुद्ध को दुनिया का सबसे गंभीर मानवीय संकट बताया गया है, जिसमें अनुमानित 1.5 लाख लोगों की मौत हो चुकी है और 1.2 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं.