
फ्रांस में पिछले कुछ दिनों से जारी विरोध प्रदर्शन अब हिंसा और लूटपाट में बदल गए हैं. स्कूलों की खराब हालत को लेकर छात्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे इसमें महंगाई, बढ़ते खर्च और सरकारी सेवाओं में गिरावट जैसे मुद्दे भी जुड़ गए. पिछले वीकेंड हालात और बिगड़ गए. नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने इमारतों में आग लगाई, दुकानों में लूटपाट की और पुलिस से भिड़ गए.
इस हिंसा के बीच फ्रांस की धुर दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर तीखा हमला बोला है. दिलचस्प बात यह रही कि उनका संबोधन भी चर्चा में आ गया. ले पेन एक डेस्क के पीछे बैठी नजर आईं और उनके पास फ्रांस का झंडा लगा था. उनका अंदाज ऐसा था, मानो वह देश की राष्ट्रपति हों और जनता को संबोधित कर रही हों.
मैक्रों इन दिनों पश्चिम एशिया के दौरे पर हैं. ऐसे में ले पेन ने खुद को कानून-व्यवस्था बहाल करने में सक्षम नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है. उन्होंने हिंसा के लिए वामपंथियों और दशकों से जारी इमिग्रेशन यानी दूसरे देशों से लोगों के फ्रांस आने की नीति को जिम्मेदार ठहराया. हालांकि, उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं दिया कि हिंसा में प्रवासियों की भूमिका थी. फ्रांस के अधिकारियों ने भी हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार नहीं ठहराया है.
यह भी पढ़ें: UN का डबल स्टैंडर्ड... फ्रांस के प्रोटेस्ट पर जो लिखा वह भारत वाले मैसेज से एकदम अलग

ले पेन को कैसे मिल सकता है फायदा?
ले पेन लंबे समय से फ्रांस में इमिग्रेशन और कानून-व्यवस्था को बड़ा मुद्दा बनाती रही हैं. मौजूदा हिंसा ने उन्हें अपने इसी एजेंडे को आगे बढ़ाने का मौका दिया है. उन्होंने दावा किया कि विरोध प्रदर्शन के पीछे कट्टर वामपंथी समूह हैं, जिनका गरीब इलाकों में रहने वाले युवाओं से गठजोड़ है. फ्रांस की मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हीं इलाकों में रहता है और उनमें से कई परिवारों की जड़ें दूसरे देशों से जुड़ी हैं.
ले पेन की पार्टी ने अपने दावों के समर्थन में कुछ प्रदर्शनकारियों के हाथों में फिलिस्तीन और अल्जीरिया के झंडे होने का भी जिक्र किया है. हालांकि, झंडे दिखने भर से हिंसा में शामिल लोगों की पहचान या उनकी भूमिका साबित नहीं होती.
ले पेन ने अपने संबोधन में कहा, "छह महीने में फ्रांस के लोग एक अलग रास्ता चुन सकेंगे, जहां सख्ती और सुरक्षा बहाल होगी." उनके इस बयान को राष्ट्रपति चुनाव से पहले खुद को मैक्रों के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश माना जा रहा है.
फ्रांस के एक चुनावी सर्वेक्षक ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि ले पेन ऐसे बोल रही थीं, जैसे वह पहले से राष्ट्रपति कार्यालय में बैठी हों. मैक्रों की विरोधी और सेंटर-राइट सांसद नथाली लुआजो ने भी कहा कि मौजूदा अशांति का सबसे ज्यादा फायदा धुर दक्षिणपंथ को मिल रहा है.

चुनावी मुकाबले में ले पेन की स्थिति
रिपोर्ट में बताए गए हालिया इफॉप सर्वे के मुताबिक, मरीन ले पेन को 54 फीसदी और पूर्व प्रधानमंत्री एडुआर फिलिप को 46 फीसदी समर्थन मिला. फिलिप को मैक्रों की मध्यमार्गी राजनीति का संभावित उत्तराधिकारी माना जा रहा है.
हालांकि, मैक्रों खुद अगले साल दोबारा राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते, क्योंकि फ्रांस के संविधान के तहत कोई राष्ट्रपति लगातार दो पांच साल के कार्यकाल से ज्यादा पद पर नहीं रह सकता. ऐसे में अगले चुनाव में उनकी राजनीतिक विरासत और उनकी पार्टी का प्रदर्शन भी अहम होगा.
अर्थव्यवस्था भी मैक्रों के लिए चुनौती
हिंसा ने ले पेन को मैक्रों की आर्थिक नीतियों पर हमला करने का भी मौका दिया है. उन्होंने मैक्रों की नीतियों को फ्रांस के लिए नुकसानदेह बताया है. देश का राजकोषीय घाटा कई साल से जीडीपी के 5 फीसदी से ऊपर बना हुआ है, जबकि सरकारी कर्ज जीडीपी के करीब 120 फीसदी तक पहुंच गया है. यूरोपियन पॉलिसी सेंटर के पॉल टेलर ने द गार्जियन में लिखा कि फ्रांस की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि मैक्रों के पास प्रदर्शनकारियों को राहत देने के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है.
यह भी पढ़ें: मार्को रुबियो की डीजल डिप्लोमेसी को समझें... तेल रिफाइनरी में इंडिया को बताया सुपरपावर, जामनगर का करेंगे दौरा

लेकिन अर्थव्यवस्था ले पेन की भी मजबूत पक्ष नहीं रही है. 2017 में जब उन्होंने मैक्रों के खिलाफ चुनाव लड़ा था, तब फ्रांस को यूरो मुद्रा से बाहर निकालने के उनके वादे को नुकसानदायक माना गया था. इसके अलावा, यूरोपीय संसद के फंड के गलत इस्तेमाल से जुड़े मामले में 2025 में उनकी दोषसिद्धि भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती है.
अगर चुनाव में अर्थव्यवस्था प्रमुख मुद्दा बनती है, तो ले पेन के सामने चुनौती रह सकती है. लेकिन अगर बहस का केंद्र हिंसा, सुरक्षा और इमिग्रेशन बना रहता है, तो उन्हें अपने मुद्दे आगे बढ़ाने का मौका मिल सकता है.
मेलबर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पीटर मैक्फी ने राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस अशांति को ले पेन के लिए "क्रिसमस का तोहफा" बताया है. हालांकि, हिंसा का चुनावी असर क्या होगा, यह आने वाले महीनों में ही साफ होगा.