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ईरान को दी डेडलाइन खत्म होने से पहले क्या अमेरिका ने डाला पाकिस्तान पर सीजफायर का दबाव?

पाकिस्तान जंग में खुद को शांति स्थापित करने वाले देश के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है. जबकि माना जा रहा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि वह कुछ समय के लिए सीज़फायर कराए.

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क्या ट्रंप के दबाव में पाकिस्तान ने ईरान को लड़ाई में सीजफायर स्वीकार करने के लिए मनाने की कोशिश की? (Photo: ITG)
क्या ट्रंप के दबाव में पाकिस्तान ने ईरान को लड़ाई में सीजफायर स्वीकार करने के लिए मनाने की कोशिश की? (Photo: ITG)

अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच पाकिस्तान ने खुद को शांति स्थापित करने वाले देश के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि इसकी पटकथा कहीं और लिखी गई थी. फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान पर ईरान के साथ अस्थायी युद्धविराम कराने के लिए दबाव डाला.

हालांकि, इस प्रयास ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए एक सुविधाजनक माध्यम के तौर पर. जहां एक ओर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपना रुख और सख्त किया, वहीं पाकिस्तान तेजी से आगे बढ़कर खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करता नजर आया. लेकिन उसके प्रस्तावों में स्वतंत्र या संतुलित शांति पहल के बजाय अमेरिकी रणनीतिक हितों की झलक ज्यादा दिखाई दी.

माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान पर दबाव डाला कि वह ईरान को लड़ाई में सीजफायर स्वीकार करने के लिए मनाए. इस प्रस्ताव का मुख्य फोकस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलना है. जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है.

इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका यह थी कि वह इस समझौते को एक मुस्लिम-बहुल देश की ओर से आए प्रस्ताव के रूप में पेश करे, ताकि तेहरान के लिए इसे स्वीकार करना अपेक्षाकृत आसान हो सके.

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इस बैक-चैनल कोशिश की कमान काफी हद तक पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के हाथ में थी, जिन्होंने ट्रंप प्रशासन के साथ कई बार तत्काल बातचीत की. इन संपर्कों में डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और राजदूत स्टीव विटकॉफ शामिल थे.

वॉशिंगटन एक तरफ बढ़ती तेल कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था, तो दूसरी ओर वह लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से भी बचना चाहता था.

पाकिस्तान की कोशिश नाकाम

पाकिस्तान ने युद्धविराम पहल को अपनी कूटनीतिक सफलता के तौर पर पेश करने की कोशिश की. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तो इस प्रस्ताव की घोषणा सोशल मीडिया पर भी कर दी. हालांकि, यह रणनीति जल्द ही उलटी पड़ गई, जब उनके पोस्ट पर गलती से ड्राफ्ट का लेबल नजर आया. इससे यह खुलासा हो गया कि यह घोषणा कितनी जल्दबाजी में और संभवतः सुनियोजित तरीके से की गई थी.

वास्तव में, पाकिस्तान एक स्वतंत्र वार्ताकार कम और एक मध्यस्थ ज्यादा नजर आया. उसने अमेरिका द्वारा तैयार 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव को आगे बढ़ाया, ईरान की प्रतिक्रियाओं को पहुंचाया और अलग-अलग युद्धविराम समय-सीमाएं सुझाईं. जिससे यह धारणा और मजबूत हुई कि वह अमेरिका के लिए एक माध्यम की भूमिका निभा रहा था.

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