चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नॉर्थ कोरिया के अपने दो दिवसीय दौरे को समाप्त कर वापस लौट आए हैं. उन्होंने कहा कि उनकी और नॉर्थ कोरियाई नेता किम जोंग उन के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अहम सहमति बनी है. प्योंगयांग में भव्य स्वागत और उच्चस्तरीय बैठकों के बाद शी मंगलवार को बीजिंग लौटे हैं. यह 2019 के बाद उनका पहला नॉर्थ कोरिया दौरा था.
सोमवार को प्योंगयांग पहुंचने पर शी जिनपिंग का रंगीन रेड-कार्पेट स्वागत किया गया. इसके तुरंत बाद उन्होंने किम जोंग उन को चीन के पक्के समर्थन का भरोसा दिया. यह संदेश ऐसे समय में आया है जब हाल के वर्षों में नॉर्थ कोरिया ने रूस के साथ अपने संबंधों को काफी मजबूत किया है. मॉस्को और प्योंगयांग की बढ़ती नजदीकियों ने बीजिंग की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाया है.
हालांकि, इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच किसी बड़े समझौते या औपचारिक डील की घोषणा नहीं की गई. खास बात यह रही कि परमाणु निरस्त्रीकरण यानी डीन्यूक्लियराइजेशन के मुद्दे पर भी कोई ठोस बयान सामने नहीं आया. चीनी विदेश मंत्रालय ने इस विषय पर पूछे गए सवालों को टालते हुए केवल इतना कहा कि चीन की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
नॉर्थ कोरिया को आधिकारिक तौर पर डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया कहा जाता है. साल 2006 से कई परमाणु परीक्षण कर चुका है. खुद को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बताता है. दूसरी ओर चीन लगातार कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त रखने की वकालत करता रहा है. किम की बहन ने साफ कहा है नॉर्थ कोरिया न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं छोड़ेगा.
किम यो जोंग ने उन खबरों को भी खारिज कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच हालिया बातचीत में कोरियाई प्रायद्वीप के डीन्यूक्लियराइजेशन पर चर्चा हुई थी. उनके बयान को नॉर्थ कोरिया के कठोर रुख माना गया. हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने भी कहां कि बीजिंग अपने पुराने रुख पर कायम है.
लिन जियान ने कहा कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप के मुद्दे पर निरंतरता और स्थिरता की नीति का पालन करता रहेगा. उन्होंने यह भी कहा कि चीन DPRK के साथ कूटनीति, कानून प्रवर्तन, सैन्य और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार है. दिलचस्प बात है कि दोनों नेताओं की बैठकों पर सरकारी मीडिया की रिपोर्टों में नॉर्थ कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का जिक्र नहीं किया गया.
विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग फिलहाल संवेदनशील मुद्दों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाने से बच रहा है. हाल के महीनों में ऐसी रिपोर्टें सामने आई थीं कि चीन और नॉर्थ कोरिया के बीच भरोसे में कमी आई है. इसकी एक बड़ी वजह रूस के साथ नॉर्थ कोरिया की बढ़ती नजदीकियां मानी जा रही हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान प्योंगयांग ने मास्को की बहुत मदद की है.
रूस को सैनिक सहायता भी दी है. इसने बीजिंग की चिंता बढ़ा दी थी. शी जिनपिंग का यह दौरा न केवल संबंधों में आई दूरी को कम करने की कोशिश था, बल्कि नॉर्थ कोरिया पर चीन के प्रभाव को फिर से मजबूत करने का प्रयास भी था. संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के बीच नॉर्थ कोरिया अभी भी तेल, खाद्यान्न और कई बुनियादी जरूरतों के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है.
चीन की प्राथमिकता अपने सीमावर्ती क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है. बीजिंग चाहता है कि प्योंगयांग के साथ उसके संबंध मजबूत रहें, लेकिन वह नॉर्थ कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से होने वाले संभावित अंतरराष्ट्रीय संकटों में उलझना भी नहीं चाहता. समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी और किम में क्षेत्रीय और वैश्विक शांति, स्थिरता, भविष्य के सहयोग को लेकर चर्चा हुई.
वहीं किम जोंग उन ने भी इस दौरे को पूरी तरह सफल बताया. उन्होंने कहा कि इस यात्रा ने दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि DPRK और चीन अपने दोस्ताना सहयोग को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. किम ने कहा कि दोनों देशों के बीच बनी अहम सहमति को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाएगा और सहयोग को नए स्तर पर पहुंचाया जाएगा.