
अमेरिका और ईरान की जंग पर पूर्ण विराम लग गया है. लंबी खींचतान के बाद दोनों देशों ने समझौता कर लिया है और शुक्रवार तक जिनेवा में इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है. महीनों चली जंग में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर सैकड़ों हवाई हमले किए. लक्ष्य साफ था कि ईरान की सैन्य ताकत तोड़नी है, परमाणु कार्यक्रम खत्म करना है, क्षेत्रीय प्रभाव कमजोर करना है और इस्लामिक रिपब्लिक की सत्ता को भी उखाड़ फेंकना है.
व्हाइट हाउस में उस समय माहौल ऐसा था मानो कुछ ही हफ्तों में ईरान घुटने टेक देगा. लेकिन करीब साढ़े तीन महीने बाद तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि ईरान के साथ एक शुरुआती शांति समझौता हो गया है. पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में तैयार इस समझौते ने युद्ध को रोकने का रास्ता खोला.
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लेकिन जब इस समझौते और युद्ध के नतीजों को ध्यान से देखा जाता है, तो एक बड़ा सवाल सामने आता है, वो ये कि क्या अमेरिका अपने असली लक्ष्य हासिल कर पाया? कई विश्लेषकों का मानना है कि कम से कम सात बड़े मोर्चों पर ट्रंप प्रशासन को वह सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद की जा रही थी और ईरान ने अममेरिका को बड़ा दर्द पहुंचाया.

1. नहीं हुआ तख्तापलट इस्लामी सत्ता और मजबूत
युद्ध के शुरुआती घंटों में अमेरिका और इजरायल ने तेहरान पर भीषण हमले किए. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को मार दिया गया. ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व खत्म होते ही पूरा सिस्टम बिखर जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
कुछ ही दिनों के भीतर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत नया नेतृत्व सामने आ गया और सत्ता का ढांचा जस का तस बना रह गया. यहां तक कहा जा रहा है कि इस्लामी सत्ता और मजबूत हुई है और सत्ता पर उनकी पकड़ और कड़ी हुई है. जिस शासन को गिराने की बात की जा रही थी, आखिरकार अमेरिका को उसी शासन के साथ बैठकर शांति समझौते पर बातचीत करनी पड़ी. यानी ट्रंप प्रशासन का ये लक्ष्य अधूरा रह गया.
2. इस्लामी सत्ता का कम, अमेरिका का ज्यादा विरोध
युद्ध से पहले ईरान आर्थिक संकट, महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहा था. देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. अमेरिका को उम्मीद थी कि सैन्य दबाव बढ़ने पर जनता सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाएगी. लेकिन हुआ उल्टा. एक शुरुआती मिसाइल हमला गलती से मिनाब शहर के एक गर्ल्स स्कूल के पास जा गिरा. बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई. इस घटना ने पूरे देश में गुस्सा पैदा कर दिया. सरकार विरोधी आवाजें अचानक पीछे चली गईं और राष्ट्रीय भावना मजबूत हो गई. जो लोग पहले सरकार की आलोचना कर रहे थे, वे भी विदेशी हमलों के खिलाफ एकजुट हो गए.

3. ईरान की मिसाइल सिटी अब भी सुरक्षित
युद्ध का सबसे बड़ा सैन्य उद्देश्य ईरान की मिसाइल ताकत को भी खत्म करना था. अमेरिका और इजरायल का मानना था कि शुरुआती 900 हवाई हमले ईरान की मिसाइल क्षमता को नष्ट कर देंगे. लेकिन ईरान के भूमिगत "मिसाइल सिटी" सुरक्षित रहे. इसके बाद ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए. इजरायल, इराक, कतर और खाड़ी क्षेत्र में कई ठिकाने निशाने पर आए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शांति समझौते में कहीं भी ईरान को अपनी बैलिस्टिक मिसाइलें खत्म करने की शर्त नहीं माननी पड़ी. यानी जिस हथियार को खत्म करने के लिए युद्ध शुरू हुआ था, वह आज भी मौजूद है.
4. होर्मुज स्ट्रेट को बिना डील के नहीं खुलवा पाए ट्रंप
अमेरिका चाहता था कि दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा सप्लाई लाइन पूरी तरह सुरक्षित हो जाए. लेकिन युद्ध शुरू होते ही ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया. तेल टैंकर रुक गए. वैश्विक बाजार में घबराहट फैल गई. कच्चे तेल की कीमतें उछलने लगीं. अमेरिका को जवाब में अपनी नौसैनिक नाकेबंदी लगानी पड़ी. नतीजा यह हुआ कि दोनों पक्ष एक महंगे और लंबे समुद्री गतिरोध में फंस गए. आखिरकार स्ट्रेट सैन्य जीत से नहीं, बल्कि कूटनीतिक समझौते से खुलने जा रहा है.

5. खाड़ी देशों को सुरक्षा नहीं दे पाया अमेरिका
अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत, कतर समेत कई सहयोगियों को भरोसा दिलाया था कि यह अभियान उन्हें सुरक्षित बनाएगा. लेकिन युद्ध शुरू होते ही ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए. कई महत्वपूर्ण ठिकाने निशाने पर आए. ऊर्जा ढांचे को खतरा पैदा हुआ. खाड़ी देशों को पहली बार एहसास हुआ कि अमेरिका की सुरक्षा छतरी उन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकती. यही वजह रही कि कतर और पाकिस्तान जैसे देश युद्ध खत्म कराने के लिए सक्रिय मध्यस्थ बनकर सामने आए.
6. अमेरिका को महंगी पड़ी जंग
युद्ध शुरू करते समय अमेरिका को उम्मीद थी कि यह कम समय और कम लागत वाला अभियान होगा. लेकिन धीरे-धीरे हालात बदल गए. तेल की कीमतें बढ़ीं. वैश्विक बाजार प्रभावित हुए. अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ठिकानों पर खतरा बढ़ा. फिर शांति समझौते के हिस्से के रूप में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण और निवेश ढांचे की चर्चा सामने आई. ईरान शुरू में 400 अरब डॉलर का मुआवजा मांग रहा था. हालांकि अमेरिका सीधे मुआवजा नहीं दे रहा, लेकिन 300 अरब डॉलर का निवेश फंड इस बात का संकेत है कि युद्ध का आर्थिक बोझ सिर्फ ईरान ने नहीं उठाया.
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7. परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
युद्ध का सबसे बड़ा औचित्य यही बताया गया था कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है. लेकिन युद्ध के दौरान ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए. कई निरीक्षण प्रक्रियाएं प्रभावित हुईं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान का संवर्धित यूरेनियम का थोड़ा हिस्सा भी अमेरिका के हाथ नहीं लगा. नई शांति प्रक्रिया में भी परमाणु मुद्दा अगले 60 दिनों की अलग बातचीत के लिए छोड़ दिया गया है. यानी जिस मुद्दे पर युद्ध शुरू हुआ था, उसका अंतिम समाधान अभी तक नहीं निकला.

आखिर जीता कौन?
यही इस पूरे युद्ध का सबसे दिलचस्प सवाल है. सैन्य नजरिए से देखें तो अमेरिका और इजरायल ने ईरान को भारी नुकसान पहुंचाया. ईरान के कई ठिकाने तबाह हुए, शीर्ष नेतृत्व को नुकसान पहुंचा और अर्थव्यवस्था को झटका लगा. लेकिन रणनीतिक रूप से देखें तो ईरान अपनी सत्ता बचाने, मिसाइल कार्यक्रम सुरक्षित रखने, क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने और अरबों डॉलर के पुनर्निर्माण ढांचे तक पहुंच हासिल करने में सफल रहा.
यही वजह है कि आज दुनिया भर के विश्लेषक इस युद्ध को "पूर्ण जीत" या "पूर्ण हार" की बजाय थकान से पैदा हुई शांति कह रहे हैं. एक बात जरूर साफ है कि जब ट्रंप ने फरवरी में युद्ध शुरू किया था, तब व्हाइट हाउस जिस परिणाम की उम्मीद कर रहा था, जून में हुए समझौते की तस्वीर उससे काफी अलग दिखाई दे रही है. और शायद यही वजह है कि इस जंग को कई लोग उन "सात दर्दों" की कहानी कह रहे हैं, जिन्हें अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय तक भूल नहीं पाएंगे.