अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता को पांच साल पूरे हो गए हैं. 15 अगस्त 2021 को जब अमेरिकी सेना काबुल छोड़कर गई थी, तब हजारों अफगान लोग जो अमेरिकी फौज के साथ काम कर चुके थे, जान बचाने के लिए एयरपोर्ट की तरफ भाग रहे थे. उस समय के नजारों की तुलना 1975 के साइगॉन से की गई थी, जब अमेरिका वियतनाम युद्ध हारकर वहां से निकला था. अब पांच साल बाद तालिबान ने अपनी सत्ता की सालगिरह को जीत के दिन के तौर पर मनाया है, लेकिन आम अफगान लोगों की जिंदगी अब भी बेहद मुश्किल भरी है.
शनिवार को काबुल में तालिबान ने अपनी सरकार के पांच साल पूरे होने का जश्न मनाया. पुरानी अमेरिकी दूतावास के बाहर तालिबान के बख्तरबंद वाहनों की परेड निकाली गई. लड़ाकों ने झंडे और बैनर लेकर मार्च किया और इसे पश्चिमी ताकतों पर जीत का दिन बताया.
तालिबान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने एक वीडियो संदेश में कहा कि उनकी सरकार की वापसी हौसले, हिम्मत और ईश्वरीय मदद से हुई है. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि देश में अभी भी कई दिक्कतें और समस्याएं बनी हुई हैं.
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इन समस्याओं का सबसे बुरा असर महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पर पड़ा है. तालिबान की सत्ता में आने के बाद से शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं पर सख्त पाबंदियां लगाई गई हैं. करीब 25 लाख लड़कियों को माध्यमिक स्कूल और यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया है.
संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के हाल ही में आए आंकड़ों के मुताबिक, आधी अफगान महिलाएं अब महीने में सिर्फ एक या दो बार ही घर से बाहर निकल पाती हैं. यही पाबंदियां तालिबान सरकार को दुनिया भर से मान्यता मिलने में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं. अब तक सिर्फ रूस ने तालिबान सरकार को औपचारिक तौर पर मान्यता दी है.
हालांकि मान्यता न मिलने के बावजूद कई देशों ने तालिबान सरकार के साथ अपने संबंध बढ़ाए हैं. भारत, कतर, चीन, ईरान और मध्य एशिया के कई देशों ने तालिबान अधिकारियों की मेजबानी की है या उनके साथ कूटनीतिक और आर्थिक संपर्क बढ़ाए हैं.
तालिबान अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर खुद को व्यापार और कनेक्टिविटी के पुल के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है. इससे तालिबान को कूटनीतिक मोर्चे पर कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन आम लोगों की जिंदगी पर इसका बहुत असर नहीं पड़ा है.
देश में मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है. अफगानिस्तान को बार बार सूखे, भूकंप और पड़ोसी देशों ईरान और पाकिस्तान से बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों की वापसी जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. इसी बीच अंतरराष्ट्रीय मदद के बजट में भी काफी कमी आई है.
अमेरिका, जो कभी अफगानिस्तान को सबसे ज्यादा मदद देता था, उसने अपनी सहायता में बड़ी कटौती कर दी है. अफगानिस्तान की करीब 4.5 करोड़ की आबादी में से आधे से ज्यादा लोगों को अब मानवीय मदद की जरूरत है, जबकि बेरोजगारी पिछले पांच साल में लगभग दोगुनी हो चुकी है. पाकिस्तान के साथ तनाव और सीमा पर आ रही रुकावटों ने अफगानिस्तान के सबसे अहम व्यापारिक रास्ते को भी प्रभावित किया है.
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अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया के वित्तीय सिस्टम से लगभग कटी हुई है. 2021 के बाद से आयात लगातार निर्यात से ज्यादा होता जा रहा है, जबकि सरकार की आमदनी में भारी गिरावट आई है. तालिबान का सबसे हाल का बजट, जो साल 2023 के लिए जारी हुआ था, करीब 2.44 अरब डॉलर का था, जो 2021 के करीब 6 अरब डॉलर के बजट से आधे से भी कम है. यही आंकड़े अफगानिस्तान की असली तस्वीर बयां करते हैं.
तालिबान सरकार पहले से ज्यादा मजबूत, दुनिया में ज्यादा दिखने वाली और दूसरे देशों से बातचीत में पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरी नजर आती है. लेकिन जिस देश पर वह राज कर रही है, वह अब भी गरीब, अलग थलग और मानवीय मदद पर निर्भर बना हुआ है. अमेरिकी सेना की वापसी के पांच साल बाद तालिबान की सत्ता पर पकड़ जरूर मजबूत हुई है, लेकिन अफगानिस्तान को फिर से खड़ा करने की लड़ाई अभी बहुत लंबी है.