पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस मुश्किल दौर से गुजर रही है. 15 साल तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी की पकड़ उनकी ही बनाई पार्टी पर ढीली पड़ रही है. कभी ममता के एक इशारे पर चलने वाली टीएमसी में अब आलम यह है कि उनके हर फैसले का ही विरोध होने लग रहा. ममता ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता क्या बनाया, पार्टी में बगावत की चिंगारी ही भड़क उठी.
संदीपन साहा की अगुवाई में 58 विधायकों ने ममता के फैसले से अलग रुख अख्तियार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया. लोकसभा में पार्टी के 20 सांसद भी बंगाल चुनाव नतीजों के बाद चीफ व्हिप के पद से हटाई गईं काकोली घोष की अगुवाई में बगावत का झंडा उठाए हुए हैं. राज्यसभा में तो दौर इस्तीफों का शुरू हो गया है.
राज्यसभा की सदस्यता से पहले टीएमसी के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफा दिया, और अब ममता बनर्जी के करीबियों में गिनी जाने वाली सुष्मिता देव ने भी पद छोड़ दिया है. सुष्मिता देव असम से आती हैं और उच्च सदन में पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व कर रही थीं. इस्तीफे के कुछ ही देर बाद सुष्मिता ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा से मुलाकात भी कर ली. सुष्मिता देव के बीजेपी के टिकट पर असम से लोकसभा उपचुनाव लड़ने की चर्चा है.
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टीएमसी में इस्तीफों की बात करें, तो बात सिर्फ राज्यसभा से दो नेताओं के इस्तीफे तक ही नहीं है. पिछले 14 दिन में टीएमसी से पांच इस्तीफे हुए हैं. इस सिलसिले की शुरुआत हुई थी राज्यसभा के पूर्व सांसद शांतनु सेन के इस्तीफे के साथ. शांतनु सेन टीएमसी के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे. शांतनु सेन ने 28 मई को प्रवक्ता की पोस्ट छोड़ने का ऐलान कर दिया था.
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इसके बाद तो पार्टी में इस्तीफों की झड़ी सी लग गई. 29 मई को टीएमसी के असम प्रदेश अध्यक्ष अभिजीत मजूमदार ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. 6 जून को टीएमसी अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के सचिव अजमल सिद्दिकी ने भी इस्तीफे का ऐलान कर दिया. 8 जून को सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. सुखेंदु के इस्तीफे की खबर जिस समय आई, ममता बनर्जी इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली में ही मौजूद थीं.