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ममता बनर्जी को एक और बड़ा झटका... 675 करोड़ रुपये पर घमासान, TMC के बैंक खातों को फ्रीज करने की उठी मांग

बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद टीएमसी पार्टी में नेतृत्व को लेकर संघर्ष जारी है. ममता बनर्जी को और बड़ा झटका लगा है. अरूप विश्वास ने एक बैंक को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि पार्टी के बैंक खाते पर फ़िलहाल रोक लगा दी जाए. उन्होंने आशंका जताई कि पैसों का इस्तेमाल अनधिकृत लोग कर सकते हैं.

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पार्टी की अंदरूनी जंग अब संगठन से आगे बढ़कर फंड और खातों तक पहुंची (Photo: PTI)
पार्टी की अंदरूनी जंग अब संगठन से आगे बढ़कर फंड और खातों तक पहुंची (Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल की टीएमसी में चल रही लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है. पार्टी के कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास ने एक बैंक को चिट्ठी लिखकर पार्टी के खातों पर रोक लगाने की मांग की है. उनका कहना है कि पार्टी पर किसकी असली लीडरशिप है, इसमें अभी कन्फ्यूजन बना हुआ है. इस वजह से ममता बनर्जी के गुट को एक और झटका लगा है.

टीएमसी में पिछले कुछ दिनों से अंदरूनी लड़ाई चल रही है. गुरुवार को इस लड़ाई ने एक नया मोड़ लिया जब पार्टी के 'कोषाध्यक्ष' अरूप बिस्वास ने एक बैंक को चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में उन्होंने मांग की कि पार्टी के खातों के ऑपरेशन पर रोक लगा दी जाए. 

उनका कहना था कि पार्टी की असली लीडरशिप कौन है, इस पर अभी कोई साफ जवाब नहीं है. यह सब उस वक्त हो रहा है जब कुछ विधायक और सांसद पार्टी की केंद्रीय लीडरशिप के खिलाफ बगावत कर चुके हैं और खुद को 'असली' टीएमसी बता रहे हैं.

यह कदम ममता बनर्जी गुट के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है. कुछ दिन पहले ही बागी विधायकों और सांसदों ने टीएमसी की केंद्रीय लीडरशिप को चुनौती दी थी. यह सब विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद हुआ था.

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दो पेज की यह चिट्ठी कोलकाता में एक प्राइवेट बैंक की सेंट्रल प्लाजा ब्रांच के मैनेजर को लिखी गई है. यह चिट्ठी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है, लेकिन समाचार एजेंसी पीटीआई इसकी सच्चाई को खुद से कन्फर्म नहीं कर सका. 

बैंक ने इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया. वहीं बिस्वास, जो पहले मंत्री रह चुके हैं और कभी ममता बैनर्जी के करीबी माने जाते थे, उनसे भी कॉल और मैसेज के जरिए संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया.

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चिट्ठी की तारीख 12 जून बताई जा रही है. इस चिट्ठी में बिस्वास ने बैंक से कहा है कि जब तक पार्टी पर कंट्रोल का मामला सुलझ नहीं जाता, तब तक खातों में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए. यानी न तो कोई पैसा निकाला जाए और न ही खाता ऑपरेट करने के अधिकार में कोई बदलाव किया जाए.

यह मामला तब और दिलचस्प हो जाता है जब पता चलता है कि बिस्वास को 5 जून को हुए एक पुनर्गठन में कोषाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था. यह पुनर्गठन ममता बनर्जी गुट ने किया था और उनकी जगह पूर्व सांसद सुभाशीष चक्रवर्ती को नया कोषाध्यक्ष बनाया गया था. लेकिन बैंक को लिखी चिट्ठी में बिस्वास ने खुद को पार्टी का कोषाध्यक्ष बताया है. इससे यह सवाल उठ रहा है कि पार्टी पर संगठनात्मक अधिकार आखिर किसका है.

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बागी गुट के सूत्रों का कहना है कि यह चिट्ठी इस बात को दिखाती है कि लीडरशिप की लड़ाई के बीच पार्टी की संपत्ति और पैसों पर कंट्रोल को लेकर चिंता बढ़ रही है. चिट्ठी में यह भी कहा गया है कि अलग-अलग गुट खुद को पार्टी का असली प्रतिनिधि और पदाधिकारी बता रहे हैं. इससे यह कन्फ्यूजन पैदा हो गया है कि पार्टी के नाम पर चल रहे खातों को ऑपरेट करने का अधिकार किसके पास है.

बिस्वास ने यह डर भी जताया है कि पार्टी का पैसा ऐसे लोग इस्तेमाल कर सकते हैं जिनके पास इसका अधिकार नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि साइन किए हुए चेक का गलत इस्तेमाल हो सकता है या उन्हें कैश कराने के लिए पेश किया जा सकता है, क्योंकि पार्टी में विवाद चल रहा है.

चिट्ठी में एक जगह बिस्वास ने यह भी बताया है कि उन्होंने पहले संगठन के काम की सुविधा के लिए कई खाली या पहले से अप्रूव चेक पर साइन कर दिए थे. अब उनका डर है कि पार्टी में चल रहे विवाद की वजह से इन चेकों का गलत इस्तेमाल हो सकता है.

जिस खाते की बात हो रही है, वह टीएमसी के मुख्य खातों में से एक माना जाता है. पार्टी ने इलेक्शन कमीशन को जो ऑडिट किए हुए कागजात दिए हैं, उनके मुताबिक इस खाते में करीब 675 करोड़ रुपये जमा हैं. इतनी बड़ी रकम होने की वजह से इस फंड पर कंट्रोल पाना राजनीतिक और संगठनात्मक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण हो गया है.

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यह पूरा विवाद टीएमसी के 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े संकट की पृष्ठभूमि में हो रहा है. यह संकट 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद शुरू हुआ.

सबसे पहले यह दरार विधानसभा में दिखी, जहां ऋतब्रत बनर्जी की लीडरशिप में 58 बागी टीएमसी विधायकों ने पार्टी लीडरशिप से अलग रास्ता अपना लिया. उन्हें स्पीकर से विधानसभा के सबसे बड़े गुट की मान्यता मिल गई और ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया गया.

इसके बाद यह बगावत संसद तक पहुंच गई. यहां टीएमसी के 20 सांसद, जिनमें सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार जैसे बड़े नेता शामिल हैं, पार्टी की केंद्रीय लीडरशिप से अलग हो गए. इन सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) के साथ मर्जर की मांग की और दावा किया कि उनके पास लोकसभा में पार्टी के दो तिहाई से ज्यादा सांसदों का समर्थन है.

इन दोनों बगावतों की वजह से कई कानूनी और राजनीतिक लड़ाइयां शुरू हो गई हैं. इनमें दल-बदल कानून, विधानसभा में मान्यता, पार्टी की राजनीतिक विरासत पर हक, और अब संगठन के संसाधनों पर कंट्रोल जैसे मुद्दे शामिल हैं.

बागी गुट से जुड़े टीएमसी विधायक कन्हैयालाल अग्रवाल ने बिस्वास के इस कदम का समर्थन किया है. उन्होंने पीटीआई से कहा कि अरूप बिस्वास पार्टी के कोषाध्यक्ष होने के नाते बैंक को चिट्ठी लिखकर खाते फ्रीज करने का पूरा अधिकार रखते हैं, अगर उन्हें लगता है कि पार्टी के पैसों का गलत इस्तेमाल हो सकता है.

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दूसरी तरफ, ममता बनर्जी गुट की तरफ से इस महीने नियुक्त किए गए नए कोषाध्यक्ष सुभाशीष चक्रवर्ती ने कहा कि उन्हें इस चिट्ठी के बारे में कुछ नहीं पता. उन्होंने कहा कि वे राज्य स्तर के संगठन के कोषाध्यक्ष हैं, जबकि अरूप बिस्वास राष्ट्रीय स्तर पर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के कोषाध्यक्ष थे. लेकिन अभी सिर्फ एक ही कोषाध्यक्ष है, और वह वे खुद हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या राज्य और राष्ट्रीय यूनिट के अलग-अलग बैंक खाते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि सिर्फ एक ही खाता है.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह विवाद अब सिर्फ विधानसभा या संसद में ताकत दिखाने तक सीमित नहीं रहा. यह अब संगठन पर कंट्रोल, पैसों और पार्टी के स्ट्रक्चर पर मालिकाना हक जैसे संवेदनशील मुद्दों तक पहुंच गया है.

इस मामले ने बिस्वास की अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर भी अटकलों को हवा दी है. वे दशकों से ममता बनर्जी के करीबी माने जाते रहे हैं. 5 जून को हुए पुनर्गठन में उन्हें कोषाध्यक्ष पद से हटाया गया था, लेकिन फिर भी उन्हें जनरल सेक्रेटरी के पद पर बनाए रखा गया था.

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हालांकि, इस बीच उनके भाई स्वरूप की गिरफ्तारी हुई थी, जिसके बाद से वे लो प्रोफाइल बने हुए थे. इसके अलावा, पिछले साल दिसंबर में अर्जेंटीना के फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी के कोलकाता दौरे से जुड़े एक विवाद में पुलिस का समन भी आया था, जिससे राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा हुई थी.

बैंक को लिखी इस चिट्ठी के सामने आने से बंगाल की तेजी से बदल रही विपक्ष की राजनीति में एक और नया मोड़ आ गया है. इससे यह संकेत मिल रहा है कि टीएमसी पर कंट्रोल की यह लड़ाई अब सिर्फ पार्टी दफ्तरों और विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह उन संस्थाओं तक भी पहुंच सकती है जो पार्टी की वित्तीय और संगठनात्मक ताकत को अपने हाथों में रखती हैं.

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