पश्चिम बंगाल में पूर्व बर्दवान के कालना का हटगाछा गांव... एक तरफ गांव की अपनी रोजमर्रा की जिंदगी चल रही है, दूसरी तरफ एक घर में काम कुछ ज्यादा तेजी से हो रहा है. मिट्टी और पुआल के बीच एक दुर्गा प्रतिमा आकार ले रही है. तापस पाल के हाथ लगातार चल रहे हैं. क्योंकि इस बार मां दुर्गा को सिर्फ बनाना नहीं है. उन्हें विदेश भेजना है.
कालना के इस गांव में तैयार हो रही दुर्गा प्रतिमा अब इंग्लैंड जाएगी. वहां इस प्रतिमा की पूजा की जाएगी. जिस मूर्ति की शुरुआत गांव की मिट्टी और पुआल से हुई, उसका अगला पड़ाव हजारों किलोमीटर दूर इंग्लैंड होगा. इस मूर्ति को बनाने वाले शिल्पी तापस पाल अपनी अलग तरह की मूर्तियों के लिए जाने जाते हैं. वह पारंपरिक शैली में प्रतिमाएं बनाते हैं, लेकिन इसके साथ ही नए और अनोखे कॉन्सेप्ट पर भी काम करते हैं.

पिछले साल उनकी सरस्वती, दुर्गा और गणेश की खास तरह की मूर्तियों ने लोगों का ध्यान खींचा था. इस साल उन्हें करीब 20 मूर्तियों के ऑर्डर मिले हैं. लेकिन इन सभी ऑर्डर में एक मूर्ति ऐसी है, जिसकी कहानी बाकी सबसे अलग है. ये मूर्ति इंग्लैंड जा रही है. दरअसल, कोलकाता के एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर तापस की बनाई एक मूर्ति देखी. उन्हें मूर्ति पसंद आई. इसके बाद उन्होंने तापस से सीधे संपर्क किया.
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बातचीत हुई तो मूर्ति का ऑर्डर मिला. और पता चला कि इसे इंग्लैंड में रहने वाले उनके बेटे के लिए भेजा जाना है. यानी सोशल मीडिया पर दिखाई दी एक मूर्ति ने कालना के एक गांव के कलाकार की कहानी इंग्लैंड से जोड़ दी. तापस ने इस दुर्गा प्रतिमा को पारंपरिक अंदाज में तैयार किया है. इसमें मुख्य रूप से मिट्टी और पुआल का इस्तेमाल हुआ है.

मूर्ति करीब 28 इंच ऊंची है. वजन लगभग 5 किलो है. इसे तैयार करने में सात से आठ दिन का समय लगा. हालांकि अभी कुछ काम बाकी है. इसलिए तापस और उनका परिवार इसे पूरा करने में जुटा है और काम चौबीसों घंटे चल रहा है. अब मूर्ति तैयार हो रही है तो अगली चुनौती भी सामने है. इसे इंग्लैंड तक सुरक्षित पहुंचाना है.
इसके लिए खास पैकेजिंग की जाएगी. क्योंकि मिट्टी की बनी मूर्ति है. सफर छोटा नहीं है. रास्ते में इसे नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखना होगा. एक छोटे से गांव में बैठा कलाकार अब सिर्फ मूर्ति नहीं बना रहा. वह अपनी बनाई कला को एक ऐसे सफर के लिए तैयार कर रहा है, जिसका अगला पड़ाव उसका गांव नहीं, बल्कि इंग्लैंड है.

तापस के परिवार के लिए ये सिर्फ एक ऑर्डर भी नहीं है. ये खुशी का मौका है. तापस के पिता बिल्लनाथ पाल खुद मिट्टी से जुड़ा काम करते हैं. यह काम उनके परिवार के लिए कोई नई चीज नहीं है. बिल्लनाथ पाल कहते हैं कि बेटा बहुत अच्छी मूर्तियां बनाता है. इस बार जब बेटे के हाथों बनी दुर्गा प्रतिमा विदेश जा रही है, तो खुशी कुछ ज्यादा है.
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जिस काम को गांव में बैठकर किया जाता है, उसी काम की पहचान अब गांव की सीमा पार कर रही है. स्थानीय लोग भी तापस की इस उपलब्धि से खुश हैं. उनका कहना है कि तापस की कारीगरी को इलाके में काफी समय से पहचान मिल रही है. उनकी बनाई मूर्तियां देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचती रही हैं. लेकिन विदेश जाने वाली ये पहली प्रतिमा है.
अब तक तापस की मूर्तियां देश के अलग-अलग हिस्सों में जाती थीं. इस बार रास्ता कुछ लंबा है. कालना से इंग्लैंड तक. और साथ में जा रही है गांव की मिट्टी की खुशबू. मूर्ति का ऑर्डर किसी बड़े स्टूडियो या किसी बड़े मूर्तिकार को नहीं दिया गया. सोशल मीडिया पर एक मूर्ति पसंद आई. फिर कलाकार से संपर्क हुआ. और वही मूर्ति अब विदेश जाने के लिए तैयार है. यानी इंटरनेट ने कलाकार और ग्राहक के बीच की दूरी खत्म कर दी. ये एक कलाकार की मेहनत, परिवार की खुशी और गांव की कारीगरी के विदेश तक पहुंचने की कहानी भी है.