ममता बनर्जी के साथ खेला सुबह-सबेरे शुरू हुआ. बुधवार सुबह से पश्चिम बंगाल विधानसभा में जो घटनाक्रम हुआ उसने ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर में भूचाल ला दिया है.
पिछले कई दिनों से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बुधवार को बागी टीएमसी विधायकों के नए गुट को आकार दे दिया.
बुधवार सुबह करीब 10 बजे के आसपास ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा पहुंच गए. इसके साथ ही एक के बाद एक टीएमसी के बागी विधायक अपनी अपनी कार से विधानसभा पहुंचने लगे. ज्यादातर विधायकों की कार में काले शीशे थे. लेकिन तब तक साफ हो चुका था कि टीएमसी में बागी विधायकों का अलग धड़ा बन चुका है और कई विधायकों ने विधानसभा घुसने के दौरान साफ कर दिया कि वे ऋतब्रत के नेतृत्व में अलग गुट बना कर विधानसभा स्पीकर को चिट्ठी देने जा रहे हैं. अब तक सूचना भी आ चुकी थी कि बागी गुट को 59 विधायकों का समर्थन है और इनमें से लगभग 25 बागी विधायक विधानसभा पहुंच चुके थे.
विधानसभा स्पीकर की असेंबली में एंट्री ने बागियों के कदम पर लगाई मोहर
थोड़ी देर में विधानसभा स्पीकर रवीन्द्रनाथ बोस भी विधानसभा में प्रवेश करते दिखे. थोड़ी देर में ही बागी विधायकों ने 59 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी रवीन्द्रनाथ बोस को सौंप दी. इस चिट्ठी में तृणमूल कांग्रेस की ओर से ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ अखरूजमा को चीफ व्हिप और जावेद ख़ान, संदीपन साहा, शिउली साहा और सबीना यास्मीन को डिप्टी लीडर के तौर पर मान्यता देने की मांग की गई थी.
बागी गुट को मिल गई नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय की चाबी
इसके बाद लगभग 4 बजे स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के ऑफिस की चाबी सौंप दी. इससे पहले तक नेता प्रतिपक्ष का ऑफिस बंद पड़ा था क्यूंकि टीएमसी द्वारा पहले दी गई चिट्ठी में जहां शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने की बात थी वो हस्ताक्षर में गड़बड़ी की वजह से खटाई में जा चुकी थी और सीआईडी जांच भी शुरू हो चुकी थी. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ममता बनर्जी अब भी उनकी नेता है वो चाहते हैं की ममता उनको मान्यता दें और उनको मार्गदर्शन भी दें.
ममता का धर्मसंकट
ऐसे में ममता बनर्जी के लिए धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई है. दरअसल बागी विधायकों में से कई ने साफ़ कह दिया है कि वे अभिषेक बनर्जी को अपना नेता नहीं मानते. सबसे दिलचस्प तो ये है कि इन 59 विधायकों में से बहुतेरे ऐसे हैं जिनको अभिषेक बनर्जी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में सीटिंग एमएलए को हटा कर टिकट दिया था. ऐसे में ममता बनर्जी अपने भतीजे को चुनेंगी या बागी नेताओं को ये उनके लिए चुनौती है.
सारी परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता नहीं कि ममता बनर्जी इस प्रस्ताव या अपील को स्वीकार करेंगी. अगर वह मना कर देती हैं तो स्थिति वैसी ही हो सकती है जैसी 2022 में महाराष्ट्र में हुई थी, जहां एक गुट ने खुद को असली शिवसेना होने का दावा किया था. मुझे लगता है कि यह पूरा मामला उसी दिशा में बढ़ रहा है और आखिरकार अदालत तक पहुंच सकता है.
हमने महाराष्ट्र में भी घटनाओं का ऐसा ही क्रम देखा था, जहां विवाद अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था. अभी भी स्थिति उसी दिशा में जाती हुई दिख रही है. इस एक्शन के ज़रिए इस गुट ने प्रभावी रूप से ममता बनर्जी के अधिकार को चुनौती दी है.
यह विवाद संदीपान साहा और ऋतब्रत से शुरू हुआ था, जिन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था. हालांकि इस गुट ने अब ऋतब्रत को विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया है. यही गुट अब ममता बनर्जी से अपील कर रहा है कि वह उन्हें मान्यता दें और मार्गदर्शन प्रदान करें.
इससे ममता बनर्जी बहुत ही मुश्किल स्थिति में फंस गई हैं. जिस तरह से इस गुट ने काम किया है, वह सीधे तौर पर उनके अधिकार को चुनौती देता है. उन्होंने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नियुक्त किया था, लेकिन इस गुट ने उस फ़ैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है.
अगर ममता बनर्जी उनकी मांगें मान लेती हैं, तो भविष्य में भी उन्हें इस गुट की मर्ज़ी के मुताबिक चलना पड़ सकता है. और जहां तक मैं ममता बनर्जी को जानता हूं, इस बात की संभावना कम ही है कि वह ऐसी किसी अपील पर राज़ी होंगी.
असली तृणमूल कौन?
अगर ऐसा होता है तो 'असली तृणमूल कांग्रेस' का प्रतिनिधित्व कौन करता है, इस बात पर लड़ाई शुरू हो सकती है. तब मुख्य सवाल यह होगा- असली तृणमूल कांग्रेस कौन है?
ऐसे हालात में इतना साफ हो चुका है कि ममता के खून पसीने से बनी तृणमूल अब ममता के हाथ से बिल्कुल निकल चुकी है. अब रहे उनके 42 सांसद जिनमें से केवल 6 सांसद ही कल धर्मतल्ला इलाके में उनके धरने में शामिल होने पहुंचे थे. काकोली घोष दस्तीदार ने पहले ही बगावत कर दी है और ऐसी अटकलें हैं कि कई सांसद भी बगावत की तैयारी में जुटे हैं. इन सब हालात में अब ममता के लिए पार्टी को बचाना बेहद मुश्किल लग रहा है और खेला होबे का नारा लगाने वाली ममता के साथ चुनाव हारने के एक महीने के भीतर खेला हो चुका है.