पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी का सियासी किला पूरी तरह से ढह गया है. विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बड़े मुश्किल दौर से गुजर रही हैं. ममता के पैरों के नीचे से पूरी राजनीतिक जमीन खिसक चुकी है. विधायक और सांसदों के बाद एक-एक कर सारी चीजें ममता के हाथों से निकलती जा रही हैं.
साल 1998 में जिस टीएमस की स्थापना ममता बनर्जी ने खुद की थी, आज पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर हो चुकी है. दो महीने में टीएमसी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है. टीएमसी पर नियंत्रण, वफादार नेता और यहां तक कि पार्टी का बैंक खाता भी ममता बनर्जी के हाथों से निकलता दिख रहा है.
बंगाल की सियासत में टीएमसी की टूट महज महज़ एक राजनीतिक टूट नहीं, बल्कि पूरी पार्टी पर कब्जे की क्रोनोलॉजी के रूप में देखा जा रहा है. बंगाल चुनाव के बाद से एक-एक करके सब कुछ छिन गया है और टीएमसी का कन्ट्रोल भी ममता के हाथ से निकल गया ह
पहले ममता से 'नेता प्रतिपक्ष' का पद छिना
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भले ही टीएमसी को करारी हार के बाद सत्ता से बाहर और विपक्ष में बैठना पड़ा था. टीएमसी के 80 विधायक के के सहारे ममता बनर्जी ने शोभन देव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित करने के लिए स्पीकर को पत्र भेजा था, लेकिन विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने सारे गेम को बिगाड़ दियाच
टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह ने आरोप लगाया कि इस पत्र पर विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं और यह सब अभिषेक बनर्जी के इशारे पर हुआ. ममता बनर्जी ने तुरंत ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी टीएमसी के 58 से अधिक विधायकों को अपने मिला लिया.
टीएमसी बागी गुट ने 58 विधायकों के समर्थन का पत्र विधानसभा स्पीकर रथेंद्र बोस को सौंपा, जिसे स्पीकर ने मंजूर कर लिया. नतीजा यह हुआ कि ममता बनर्जी की मर्जी के खिलाफ ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नए नेता प्रतिपक्ष बन गए और उन्हें एलओपी का कमरा अलॉट कर दिया गया. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से नेता प्रतिपक्ष का पद छिन गिया.
MLA-MPs भी ममता के हाथ से निकले
टीएमसी के 80 में से करीब 64 विधायक फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी के साथ हैं. इसके अलावा टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद ममता बनर्जी का साथ छोड़कर एनसीपीआई में विलय कर लिया है. बंगाल की सियासत में 'तृणमूल कांग्रेस' तीन गुटों में बंट गई. एक तरफ ऋतब्रत बनर्जी का बागी गुट है जिसके पास दो-तिहाई से ज्यादा 64 विधायक हैं और जो खुद को 'असली टीएमसी' कह रहा है तो ममता बनर्जी के साथ करीब 16 विधायको हैं.
वहीं, काकोली घोष के अगुवाई में टीएमसी सांसदों ने बगावत किया तो ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका था. सांसदों के बगावत से ममता की सियासत दिल्ली में भी कमजोर पड़ गई है. 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी हो चुके हैं और सिर्फ 8 सांसद ममता के साथ है. इसके अलावा 13 राज्यसभा सांसदों में से 3 सांसदों ने पार्टी और अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है.
पार्टी दफ्तर और अध्यक्ष पद से ममता बेदखल
टीएमसी में केवल विधायक और सांसदों के स्तर पर ही बगावत नहीं हुई, बल्कि संगठन पर बागी गुट ने पूरी तरह कब्जा कर लिया. कोलकाता में बागी नेताओं, पूर्व पार्षदों और जिला अध्यक्षों की एक बड़ी बैठक में ममता बनर्जी को पद से हटा दिया गया. टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बार हुआ कि ममता बनर्जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. बागी गुट ने अरूप रॉय को टीएमसी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया.
ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी के पद से सस्पेंड कर दिया गया और उनकी जगह संदीपन शाह और जावेद खान जैसे नेताओं को कमान सौंप दी गई. नए संगठन के दफ्तरों से ममता बनर्जी की तस्वीरें हटा दी गईं. हालांकि, बागी गुट सीधे ममता पर हमला करने से बच रहा है और उन्हें 'मुख्य सलाहकार' का पद ऑफर कर रहा है, लेकिन सक्रिय नेतृत्व से उन्हें पूरी तरह बेदखल कर दिया गया है. इतना ही नहीं टीएमसी के दफ्तर पर बागी गुटों का पूरी तरह से कब्जा हो गया है.
टीएमसी का बैंक खात हुआ फ्रीज
पार्टी और पद छिनने के बाद ममता बनर्जी गुट को सबसे बड़ा झटका आर्थिक मोर्चे पर लगा. बागी गुट ने टीएमसी के आधिकारिक बैंक खातों में अवैध फंडिंग और पैसों की हेराफेरी की शिकायत केंद्रीय एजेंसियों से कर दी. इसके चलते प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और बिधाननगर पुलिस की कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस के तीन मुख्य बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिनमें लगभग ₹440 करोड़ जमा थे.
आरोप मनी लॉन्ड्रिंग का लगया है.जांच में सामने आया कि चुनावों के दौरान चार्टर्ड फ्लाइट्स और एविएशन कंपनियों को ₹160 करोड़ से ज्यादा ट्रांसफर किए गए थे. खाता फ्रीज के कारण ममता बनर्जी के पास पार्टी चलाने और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो सकता है. टीएमसी के के् दोनों गुट अब इन खातों और पैसों पर अपना मालिकाना हक जता रहे हैं. इस तरह ममता बनर्जी के हाथों से टीएमसी का खजाना भी निकलता दिख रहा है.