'मैं ममता बनर्जी के साथ था और ममता बनर्जी के साथ ही रहूंगा. जब मैं इस दुनिया से जाऊंगा, तब भी एक वफादार के रूप में जाऊंगा, गद्दार के रूप में नहीं.' यह बयान इसी साल जून में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा ने दिया था. लेकिन ठीक एक महीने बाद, ममता बनर्जी के सबसे पुराने और भरोसेमंद साथियों में से एक मदन मित्रा ने पाला बदल लिया और बागी ऋतब्रत खेमे में शामिल हो गए.
दरअसल, पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद से ही पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है. लेकिन इस दलबदल और बगावत के दौर में मदन मित्रा का जाना सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि टीएमसी के इतिहास का बड़ा मोड़ माना जा रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि बागी गुट में शामिल होने का ऐलान करते हुए भी मदन मित्रा ने ममता बनर्जी पर कोई सीधा हमला नहीं किया. उन्होंने कहा कि वह ममता का सम्मान करते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उनके नेतृत्व वाले संगठन में प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने पार्टी में पैदा हुए संकट के लिए सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया.
टैक्सी चालक से ममता के भरोसेमंद साथी तक का सफर
मदन मित्रा और ममता बनर्जी का राजनीतिक रिश्ता तीन दशक से भी पुराना है. राजनीति में आने से पहले मदन मित्रा टैक्सी चालक और ट्रेड यूनियन नेता थे. दोनों ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत युवा कांग्रेस से की थी. 21 जुलाई 1993 को जब युवा कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 13 कार्यकर्ताओं की मौत हुई थी और ममता बनर्जी घायल हुई थीं, तब मदन मित्रा उनके साथ मजबूती से खड़े रहे. यही घटना दोनों के राजनीतिक रिश्ते की मजबूत नींव बनी.

1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई, तब कई नेता असमंजस में थे, लेकिन मदन मित्रा बिना किसी हिचकिचाहट के उनके साथ आ गए. पार्टी के शुरुआती दिनों में संगठन खड़ा करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और चुनावी प्रबंधन में उनकी अहम भूमिका रही. ममता उन्हें अपने सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिनती थीं.
2014 के शारदा चिटफंड घोटाले में गिरफ्तारी के बाद मदन मित्रा को मंत्री पद छोड़ना पड़ा और उन्हें जेल भी जाना पड़ा. इसके बावजूद ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से उनका साथ नहीं छोड़ा. 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी, जब कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए थे, तब मदन मित्रा ने साफ कहा था कि वह कभी ममता का साथ नहीं छोड़ेंगे.
क्या यह ममता गुट के राजनीतिक अंत की शुरुआत?
संख्या बल के लिहाज से देखें तो मदन मित्रा के जाने से ऋतब्रत बनर्जी के बागी खेमे को कोई खास चुनावी फायदा नहीं होगा, क्योंकि उनके पास पहले से ही बहुमत (60 से अधिक विधायक) है. लेकिन इसका प्रतीकात्मक प्रभाव बहुत गहरा है. जिस साथी ने वामपंथ के खिलाफ संघर्ष से लेकर सत्ता के शिखर तक ममता बनर्जी का हाथ थामे रखा, उसका इस तरह चले जाना यह दिखाता है कि पार्टी के भीतर दरार कितनी गहरी हो चुकी है.
जानकारों का मानना है कि यह दलबदल ममता बनर्जी के धड़े के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है. हालांकि, 'स्ट्रीट फाइटर' के रूप में मशहूर ममता बनर्जी को राजनीति में कभी भी कम आंकना बड़ी भूल होगी, लेकिन फिलहाल उनके राजनीतिक जीवन की यह सबसे कठिन परीक्षा है.