किसानों के लिए मिट्टी की स्थिति को समझना फसल प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. सॉइल हेल्थ कार्ड (SHC) योजना भारत सरकार की एक पहल है, जिसे उत्तर प्रदेश सहित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि विभागों के माध्यम से लागू किया जाता है. इस योजना के तहत किसानों को उनकी मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी, उर्वरकों और मिट्टी में सुधार के लिए जरूरी उपायों की सिफारिश दी जाती है.
सॉइल हेल्थ कार्ड में मिट्टी के 12 मानकों की जांच की जाती है, इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज और बोरॉन के साथ पीएच, इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी और ऑर्गेनिक कार्बन शामिल हैं.
जांच के आधार पर कार्ड में किसान की भूमि के लिए आवश्यक उर्वरकों और मिट्टी सुधारक पदार्थों के प्रकार तथा मात्रा के संबंध में सिफारिश दी जाती है.
कैसे होती है Soil की जांच?
प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा आमतौर पर खेत में 15–20 सेंटीमीटर की गहराई से मिट्टी के नमूने लिए जाते हैं. निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार खेत के अलग-अलग हिस्सों से नमूने लेकर उन्हें मिलाया जाता है और जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा जाता है.
योजना के तहत मिट्टी के नमूने लेने के लिए सिंचित क्षेत्रों में 2.5 हेक्टेयर और वर्षा आधारित क्षेत्रों में 10 हेक्टेयर के सैंपलिंग ग्रिड निर्धारित किए गए हैं. मिट्टी की जांच सरकारी सॉइल टेस्टिंग लैब के अलावा ICAR संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों जैसी अधिकृत संस्थाओं में भी की जा सकती है.
किसानों के लिए इसका महत्व
सॉइल हेल्थ कार्ड किसानों को उनकी मिट्टी की पोषक स्थिति के आधार पर उर्वरकों के इस्तेमाल के बारे में निर्णय लेने में मदद करता है. इसका उद्देश्य संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, उर्वरकों के बेहतर इस्तेमाल और मिट्टी के स्वास्थ्य के दीर्घकालिक प्रबंधन को बढ़ावा देना है.
एक सॉइल हेल्थ कार्ड सामान्यतः तीन साल के चक्र में एक बार जारी किया जाता है. इससे अलग-अलग चक्रों में मिट्टी की पोषक स्थिति में हुए बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है.
उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए यह योजना Soil की जांच पर आधारित पोषक तत्व प्रबंधन का एक आधार उपलब्ध कराती है, जिससे खेत की जरूरत के अनुसार उर्वरकों के इस्तेमाल और मिट्टी के बेहतर प्रबंधन के लिए जानकारी मिलती है.