
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर निर्माण गुणवत्ता को लेकर विवाद जारी है. इस बीच अब निर्माण कंपनी PNC Infratech Limited के राजनीतिक और कारोबारी कनेक्शन की भी चर्चा तेज हो गई है.
कंपनी जहां एक तरफ एक्सप्रेसवे निर्माण में खामियों और जांच का सामना कर रही है, वहीं दूसरी तरफ कंपनी के प्रमोटर ग्रुप और बीजेपी के राज्यसभा सांसद नवीन जैन के संबंधों को लेकर विपक्ष सवाल खड़े कर रहा है.
सवाल ये है कि क्या कंपनी को अपने राजनीतिक प्रभाव के चलते अलग-अलग मामलों में राहत मिलती रही? क्या जांच और विवादों के बावजूद कंपनी को लगातार बड़े सरकारी प्रोजेक्ट मिलते रहे?

राज्यसभा सांसद नवीन जैन का नाम भी शामिल
PNC Infratech की शेयरहोल्डिंग में राज्यसभा सांसद नवीन जैन का नाम प्रमोटर ग्रुप से जुड़े शेयरहोल्डर्स में शामिल रहा है. नवीन जैन कंपनी में व्होल टाइम डायरेक्टर रह चुके हैं. बाद में सक्रिय राजनीति में आने के बाद उन्होंने कंपनी के पद से दूरी बनाई. इसके बाद कंपनी के ऑपरेशंस और प्रबंधन की जिम्मेदारी उनके परिवार के दूसरे सदस्यों के पास रही.
साल 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान दिए गए अपने चुनावी हलफनामे में नवीन जैन ने PNC Infratech में अपनी हिस्सेदारी और कंपनी के कई करोड़ रुपये मूल्य के शेयरों की जानकारी दी थी. अब सवाल उठ रहा है कि क्या राजनीतिक प्रभाव के चलते कंपनी को अलग-अलग मामलों में राहत मिलती रही? क्या कंपनी के खिलाफ हुई जांचों में मिली क्लीन चिट सिर्फ विभागीय और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा रही या इसके पीछे कोई और प्रभाव भी काम करता रहा?

सीबीआई केस: अधिकारियों से सांठगांठ के आरोप
PNC Infratech पहले भी विवादों में रह चुकी है. साल 2024 में CBI ने हाईवे प्रोजेक्ट से जुड़े रिश्वत मामले में केस दर्ज किया गया था. जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि NHAI अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके प्रोजेक्ट से जुड़े काम और भुगतान को प्रभावित करने की कोशिश की गई.
इस मामले में एक NHAI जनरल मैनेजर-कम-प्रोजेक्ट डायरेक्टर को गिरफ्तार किया गया था. PNC Infratech से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की गई थी. तब कंपनी से जुड़े लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था.
इस मामले में कंपनी से जुड़े योगेश जैन का नाम भी सामने आया था. सीबीआई ने अधिकारियों के साथ सांठगांठ और प्रोजेक्ट से जुड़े कामों में गड़बड़ियों के आरोपों की जांच की थी. हालांकि किसी भी आरोपी की अंतिम जिम्मेदारी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के नतीजों के आधार पर ही तय होगी.
कंपनी का पुराना रिकॉर्ड भी सवालों में
PNC Infratech का नाम इससे पहले भी कई मामलों में सामने आ चुका है. उत्तर प्रदेश में अवैध खनन से जुड़े मामले में कंपनी पर करीब 104 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाए जाने का मामला सामने आया था. इसके अलावा लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे के करीब 56 किलोमीटर हिस्से के निर्माण को लेकर भी गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई थीं, जिसके बाद जांच कराई गई थी.
इन मामलों में कंपनी को अलग-अलग जांच प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ा और कई मामलों में उसे राहत भी मिली.
विवादों के बीच PNC को मिले 3,500 करोड़ के प्रोजेक्ट
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे को लेकर कंपनी के प्रदर्शन पर सवाल उठने और जांच के बीच ही PNC Infratech को NHAI से करीब 3,483 करोड़ के दो बड़े हाईवे प्रोजेक्ट मिले हैं.
इनमें बाराबंकी-मुस्तफाबाद फोर लेन हाईवे प्रोजेक्ट (1,728 करोड़ रुपए) और मुस्तफाबाद–बिसवां फोर लेन हाईवे प्रोजेक्ट (1,755 करोड़) शामिल हैं. दोनों प्रोजेक्ट उत्तर प्रदेश में NH-927 पर बनाए जाने हैं.
अब सवाल ये उठ रहा है कि जब कंपनी के प्रदर्शन और पुराने मामलों को लेकर जांच और समीक्षा चल रही है, तो क्या नए ठेके देने से पहले उसके रिकॉर्ड और मौजूदा कार्रवाई को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखा गया?
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क्या राजनीतिक कनेक्शन बना कंपनी के लिए सुरक्षा कवच?
PNC Infratech को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कंपनी पर लगे आरोपों, जांच और विवादों के बावजूद उसे लगातार बड़े प्रोजेक्ट और राहत कैसे मिलती रही. कंपनी के राजनीतिक कनेक्शन, पुराने मामलों और नए ठेकों के बीच अब ये चर्चा तेज है कि क्या प्रभावशाली संपर्कों ने कंपनी को फायदा पहुंचाया या फिर हर मामले में उसे सिर्फ कानूनी और विभागीय प्रक्रिया के तहत राहत मिली?