भाई का शव लेकर निकला था... कौन जानता था घर में एक नहीं तीन अर्थियां आएंगी. एक भाई की मौत हो चुकी थी. दूसरा भाई उसके शव के साथ घर लौट रहा था. उसी एंबुलेंस में 18 साल का बेटा भी बैठा था. घर से फोन पर लोग एंबुलेंस की लोकेशन पूछ रहे थे. कहां तक पहुंची? और कितनी देर लगेगी? गांव के लोगों को इंतजार था कि एंबुलेंस आएगी. सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर उतरेगा. गांव अंतिम दर्शन करेगा और फिर एक सैनिक को पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी. लेकिन एक ऐसी खबर आई, जिसने इस इंतजार को मातम में बदल दिया.
एंबुलेंस का सुल्तानपुर में एक्सीडेंट हो गया था. फिर मौतों की गिनती सामने आने लगी. सत्यवान सिंह का 18 साल का बेटा गौरव सिंह नहीं रहा. सत्यवान के बड़े भाई रामसमुझ सिंह नहीं रहे. साथ चल रहे राजन चौधरी और एंबुलेंस चालक जसपाल की भी मौत हो गई. जिस घर में एक मौत का मातम था, वहां अब तीन अपनों की अर्थी उठने वाली थी. सिर्फ 48 घंटे में. शनिवार को छोटे भाई ने आखिरी सांस ली, रविवार को बड़े भाई और बेटो की भी जिंदगी खत्म.
देवरिया के रुद्रपुर क्षेत्र के गहिला-दुधैला गांव निवासी सत्यवान सिंह करीब 50 वर्ष के थे. वह भारतीय थल सेना में सूबेदार मेजर थे. किडनी की बीमारी से पीड़ित सत्यवान का चंडीगढ़ के पंचकूला में इलाज चल रहा था. परिवार इलाज के दौरान उनके ठीक होने की उम्मीद लगाए बैठा था. लेकिन शनिवार को वह उम्मीद टूट गई. सत्यवान सिंह की मौत हो गई. एक सैनिक का घर लौटना था, लेकिन इस बार वह खुद नहीं, उनका पार्थिव शरीर लौटने वाला था. उनके बड़े भाई रामसमुझ सिंह चंडीगढ़ पहुंचे. भाई को अंतिम बार घर लेकर लौटना था. और यहीं से शुरू हुई वह यात्रा, जिसे गांव कभी नहीं भूल पाएगा.
बड़े भाई ने भाई का शव अकेला नहीं छोड़ा
रामसमुझ सिंह और सत्यवान सिंह स्वर्गीय जयसिंह के दो बेटे थे. बड़े भाई रामसमुझ डाक विभाग में पोस्टमास्टर थे. छोटे भाई सत्यवान सेना में सूबेदार मेजर. दोनों ने अपनी-अपनी जिंदगी में अलग मुकाम बनाया, लेकिन भाइयों के बीच का रिश्ता गांव में अलग ही पहचान रखता था. परिवार के लोगों के मुताबिक, दोनों भाइयों के बीच बेहद गहरा लगाव था. सत्यवान जब भी गांव आते, बड़े भाई के साथ बैठना, उनके साथ खाना खाना यह सब सामान्य बात थी. छोटे भाई की मौत हुई तो बड़े भाई चंडीगढ़ पहुंच गए. अब सवाल सिर्फ इतना था कि सत्यवान को आखिरी बार घर कैसे लाया जाए. रामसमुझ ने भाई का साथ चुना. वह एंबुलेंस में ही बैठ गए. शायद उनके लिए यह कोई बड़ा फैसला नहीं था. आखिर छोटा भाई था. जिसके साथ जिंदगी गुजारी, उसे आखिरी सफर में अकेला कैसे छोड़ देते? लेकिन किसी को नहीं मालूम था कि यह सफर सिर्फ सत्यवान का अंतिम सफर नहीं होने वाला है.
पिता को आखिरी बार घर लाने निकला था गौरव
एंबुलेंस में सत्यवान का पार्थिव शरीर था. साथ में उनके बड़े भाई रामसमुझ थे. और परिवार का 18 वर्षीय बेटा गौरव सिंह भी था. गौरव के लिए शायद उस सफर का मतलब सिर्फ इतना था कि पिता को आखिरी बार घर पहुंचाना है. एक बेटा अपने पिता की अंतिम यात्रा में साथ था. लेकिन रास्ते में जो हुआ, उसने रिश्तों की पूरी तस्वीर बदल दी. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर सुल्तानपुर जिले में एंबुलेंस हादसे का शिकार हो गई. टक्कर इतनी भीषण थी कि किसी को बचाया नहीं जा सका. पिता का शव लेकर घर लौट रहा बेटा भी उसी रास्ते में जिंदगी हार गया. और पिता के शव के साथ बैठे बड़े भाई की भी मौत हो गई.
गांव में फोन बजा तो किसी ने नहीं सोचा था कि खबर इतनी बड़ी होगी गहिला-दुधैला के लोग एंबुलेंस की लोकेशन देख रहे थे. हर कोई इंतजार कर रहा था. शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि अगली बार फोन बजेगा तो उसमें घर पहुंचने की खबर नहीं, मौत की खबर होगी. भोर से पहले गांव में जो लोग गहरी नींद में थे, वे अचानक जाग गए. किसी ने बताया हादसा हो गया. फिर दूसरी खबर आई गौरव नहीं रहा. फिर पता चला कि रामसमुझ भी नहीं रहे. फिर राजन चौधरी और चालक जसपाल की मौत की खबर आई. एक एंबुलेंस में पांच लोग थे और कोई नहीं बचा. सत्यवान तो पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे. अब उन्हें घर लाने वाले उनके अपने भी रास्ते में चले गए. पत्नी ने शायद सोचा था पति भाई को घर लेकर लौटेंगे... लेकिन घर सिर्फ अर्थी आई
रामसमुझ सिंह की पत्नी शीला देवी को जब पति की मौत की खबर मिली तो वह बेसुध होकर गिर पड़ीं. उनके तीन बेटे विवेक, विकास और विनीत के सामने अचानक उनके पिता नहीं रहे. उधर सत्यवान के घर में बेटे गौरव की मौत का दुख था. एक तरफ पिता का शव था. दूसरी तरफ बेटे का शव. और तीसरी तरफ उस पिता के बड़े भाई का शव, जो छोटे भाई को घर पहुंचाने निकला था. जिस घर में एक अंतिम संस्कार की तैयारी होनी थी, वहां तीन अपनों की अंतिम विदाई की तैयारी होने लगी. लोग यही कहने लगे हे भगवान, ये क्या कर दिया आपने ?
इंतजार खत्म नहीं हुआ, मातम शुरू हो गया
सोमवार की सुबह जब शव गांव पहुंचे तो गहिला-दुधैला की गलियां लोगों से भर गईं. सत्यवान सिंह का पार्थिव शरीर सेना के अधिकारियों की मौजूदगी में गांव पहुंचा. उनके साथ उनके बेटे गौरव और बड़े भाई रामसमुझ का शव भी था. एक ही परिवार. एक ही गांव. और तीन अर्थियां. एक अर्थी पर तिरंगा था, दूसरी पर जवान बेटा... तीसरी पर वह भाई जिसने साथ नहीं छोड़ा सूबेदार मेजर सत्यवान सिंह को सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई. सेना के अधिकारियों ने उन्हें सलामी दी. एनसीसी कैडेट्स भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे. कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी पहुंचकर मृतकों को श्रद्धांजलि अर्पित की और पुष्प अर्पित किए. भारत माता की जय और सत्यवान सिंह अमर रहें के नारों से माहौल गूंज उठा. लेकिन उस भीड़ के बीच तीन शवों की मौजूदगी हर किसी को अंदर तक हिला रही थी. एक तरफ देश के लिए सेवा करने वाला सैनिक था. दूसरी तरफ उसका 18 साल का बेटा. और तीसरी तरफ उसका बड़ा भाई. वह बड़ा भाई, जो अपने छोटे भाई को अंतिम सफर में अकेला नहीं छोड़ना चाहता था.