सफेद कोट पहने एक युवा डॉक्टर मरीजों का हाल जान रहा था. किसी की एक्स-रे रिपोर्ट देख रहा था तो किसी को दवा बदलने की सलाह दे रहा था. किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनट बाद वही डॉक्टर खुद जिंदगी और मौत के बीच जूझता नजर आएगा. साथी डॉक्टर उसे बचाने के लिए दौड़ेंगे, सीपीआर देंगे, पेसमेकर लगाएंगे, ग्रीन कॉरिडोर बनाकर कार्डियोलॉजी तक पहुंचाएंगे, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सकेगा.
कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में ऑर्थोपेडिक्स विभाग के सेकेंड ईयर जूनियर रेजिडेंट डॉ. विनोद बिंद (28) की हार्ट अटैक से मौत ने पूरे मेडिकल कॉलेज को झकझोर दिया है. सबसे दर्दनाक बात यह रही कि कुछ महीने पहले ही उन्हें अपनी बिगड़ती सेहत को लेकर डॉक्टरों ने चेतावनी दी थी, लेकिन व्यस्त दिनचर्या और लापरवाही के कारण वह खुद अपनी बीमारी पर ध्यान नहीं दे सके.
चार महीने पहले मिला था पहला संकेत
बताया जा रहा है कि मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार करीब चार महीने पहले डॉ. विनोद को सीने में दर्द की शिकायत हुई थी. वह अपने साथियों के साथ कार्डियोलॉजी विभाग पहुंचे थे. जांच के दौरान उनका ब्लड शुगर करीब 450 और ब्लड प्रेशर काफी अधिक पाया गया था. डॉक्टरों ने उन्हें नियमित दवा लेने, खान-पान सुधारने और आराम करने की सलाह दी थी. लेकिन मरीजों की सेवा में लगे रहने वाले डॉ. विनोद अपनी सेहत को उतनी गंभीरता से नहीं ले सके.
दवा भी नहीं खाई, खाने का भी समय नहीं था
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि डॉ. विनोद को हाई शुगर और हाई ब्लड प्रेशर की समस्या थी. डॉक्टरों ने उन्हें सावधानी बरतने और नियमित दवा लेने की सलाह दी थी. लेकिन वह ध्यान नहीं देते थे शायद यही लापरवाही बाद में उनके लिए घातक साबित हुई.
वार्ड में मरीज देख रहे थे, तभी बिगड़ी तबीयत
गुरुवार को भी डॉ. विनोद सामान्य दिन की तरह ऑर्थोपेडिक्स वार्ड में मरीजों का इलाज कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें अचानक पेट में तेज दर्द महसूस हुआ. वह खुद पैदल चलकर मेडिसिन इमरजेंसी पहुंचे और हंसते हुए साथियों से बोले कि तबीयत ठीक नहीं लग रही है. कुछ ही देर में सीने में तेज दर्द शुरू हुआ. देखते ही देखते उनकी हालत गंभीर हो गई. इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया.
साथी डॉक्टरों ने बचाने में झोंक दी पूरी ताकत
डॉ. विनोद की हालत बिगड़ने की सूचना मिलते ही मेडिसिन विभाग के डॉ. विशाल गुप्ता, एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. अपूर्व अग्रवाल और हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. गौतम बाजपेई समेत कई वरिष्ठ डॉक्टर मौके पर पहुंच गए. उन्हें बार-बार सीपीआर दिया गया. दिल की धड़कन सामान्य करने के लिए अस्थायी पेसमेकर भी लगाया गया. लगातार कोशिशें होती रहीं, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं आया. जब मेडिकल कॉलेज में इलाज से स्थिति नहीं सुधरी तो उन्हें तत्काल कार्डियोलॉजी रेफर किया गया. हैलट अस्पताल से कार्डियोलॉजी तक पहुंचाने के लिए सुरक्षा कर्मियों और पुलिस की मदद से ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया ताकि एंबुलेंस बिना किसी बाधा के तेजी से अस्पताल पहुंच सके. कार्डियोलॉजी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने इलाज शुरू किया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
2025 में पिता को भी पड़ा था लकवे का अटैक
परिजनों के अनुसार, वर्ष 2025 में डॉ. विनोद के पिता को हार्ट अटैक के बाद लकवा (पैरालिसिस) हो गया था. परिवार पहले से ही इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा था. ऐसे में अब बेटे की अचानक मौत ने पूरे परिवार को गहरे दुख में डाल दिया है. घटना की सूचना मिलते ही डॉ. विनोद के परिजन जौनपुर से रात में कानपुर पहुंचे. मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने परिजनों की सहमति से रात में ही पोस्टमार्टम कराने की व्यवस्था कराई. प्रमुख अधीक्षक डॉ. सौरभ अग्रवाल ने बताया कि सीएमओ से अनुमति लेकर देर रात पोस्टमार्टम कराया गया और उसके बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया.
हमने सबसे हंसमुख साथी खो दिया
डॉ. विनोद के निधन के बाद उनके साथी डॉक्टर बेहद भावुक नजर आए. एक जूनियर डॉक्टर ने कहा कि डॉ. विनोद हमेशा मुस्कुराकर सबकी मदद करते थे. चाहे मरीज हो या साथी डॉक्टर, उन्होंने कभी किसी को मना नहीं किया. उनका व्यवहार बेहद सरल था. ऑर्थोपेडिक्स विभाग के यूनिट इंचार्ज डॉ. विशाल गुप्ता ने कहा कि वह बेहद प्रतिभाशाली और समर्पित डॉक्टर थे. मरीजों की देखभाल को हमेशा प्राथमिकता देते थे. उनकी कमी लंबे समय तक महसूस होगी.
अभी नहीं हुई थी डॉ. विनोद की शादी
साथी डॉक्टरों ने बताया कि डॉ. विनोद की अभी शादी नहीं हुई थी. उनका पूरा ध्यान पढ़ाई और मरीजों के इलाज पर रहता था. मेडिकल कॉलेज में उन्हें मेहनती और जिम्मेदार डॉक्टर के रूप में जाना जाता था.