इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1984 में अपने ही भाई की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 82 वर्षीय बुजुर्ग की अपील खारिज कर दी है. अदालत ने उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए उसे बाकी सजा काटने के लिए सरेंडर करने का आदेश दिया है.
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच ने पाया कि रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से ऐसी कोई राहत देने वाली बात सामने नहीं आई, जिसके आधार पर अपील करने वाले की सजा को IPC की धारा 302 (हत्या) से बदलकर IPC की धारा 304 पार्ट II (गैर-इरादतन हत्या) में बदला जा सके.
अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने अपील करने वाले की उस गुहार को भी ठुकरा दिया जिसमें उसने अपनी सजा को उतनी ही अवधि तक सीमित करने की मांग की थी जितनी वह पहले ही काट चुका है.
40 साल जमानत पर रहने का नहीं मिला फायदा
कोर्ट ने कहा कि वह सिर्फ इसलिए ऐसी राहत नहीं दे सकता, क्योंकि अपील करने वाला अब 82 साल का हो चुका है और अपील लंबित रहने के दौरान लगभग चार दशकों तक जमानत पर रहा है.
17 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, ''पेश किए गए सबूतों से अचानक और गंभीर उकसावे या अचानक हुई लड़ाई का पता नहीं चलता, जिसके आधार पर कोर्ट IPC की धारा 302 के तहत सजा को रद्द करने और अपील करने वाले को IPC की धारा 304 पार्ट (II) के तहत दोषी ठहराने की संभावना पर विचार कर सके.
कोर्ट ने कहा कि हालांकि उसे इस बात का दुख है कि अपील करने वाले को 40 साल बाद वापस जेल जाना होगा, लेकिन कोर्ट ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट जैसी शक्तियां नहीं हैं.
भाई की हत्या में हुई थी उम्रकैद
अपील करने वाले बाबू लाल को ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर 1984 में अपने भाई की मौत का कारण बनने का दोषी ठहराया था. उसने खेती में खुदाई के लिए इस्तेमाल होने वाले औजार से बार-बार हमला करके भाई की हत्या की थी.
बचाव पक्ष की दलील
अपील करने वाले के वकील ने तर्क दिया था कि अपील करने वाले पर जिस औजार के इस्तेमाल का आरोप है. वह कोई खास हथियार नहीं है और उसका इस्तेमाल भी कुंद यानी बिना धार वाले हिस्से से किया गया था, जिससे पता चलता है कि उसका मृतक को मारने का कोई इरादा नहीं था.
यह भी तर्क दिया गया कि अगर अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह सच और बिना किसी शक के साबित मान भी लिया जाए, तो भी अपीलकर्ता को केवल IPC की धारा 325 (गंभीर चोट पहुंचाने) के तहत ही दोषी ठहराया और सजा दी जा सकती थी.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा, ''सिर्फ इस्तेमाल किए गए हथियार की प्रकृति के आधार पर हत्या करने के इरादे को खारिज नहीं किया जा सकता. इरादे का पता इस बात से चलता है कि हमलावर ने शरीर के किस हिस्से को निशाना बनाया.
साथ ही, यह जानकारी भी आपराधिक इरादे का हिस्सा है कि शरीर के किसी अहम हिस्से पर उस चीज से हमला करने पर गंभीर चोट लग सकती है, जिससे सामान्य तौर पर मौत हो सकती है या मौत निश्चित है.