scorecardresearch
 

जर्मनी में 65 लाख रुपये की सैलरी, फिर भी खाली जेब! इंडियन ने बताया कहां चला जाता है पैसा?

जर्मनी में 70 हजार पाउंड की सालाना सैलरी सुनकर किसी भी भारतीय को लग सकता है कि वहां तो जमकर कमाई होगी, लेकिन ऐसा नहीं है.

Advertisement
X
विदेश में मिलने वाली सैलरी को सिर्फ करेंसी कन्वर्जन से समझना सही नहीं है (Representational Image: Pexels)
विदेश में मिलने वाली सैलरी को सिर्फ करेंसी कन्वर्जन से समझना सही नहीं है (Representational Image: Pexels)

भारत में 65 लाख रुपये सालाना की सैलरी सुनते ही ज्यादातर लोगों को यह बड़ी रकम लगेगी. लेकिन अगर यही रकम जर्मनी में कमाई जा रही हो तो तस्वीर बिल्कुल अलग हो सकती है. वजह है टैक्स, किराया, इंश्योरेंस और रोजमर्रा की महंगी जिंदगी.

विदेश में मिलने वाली सैलरी को सिर्फ करेंसी कन्वर्जन से समझना सही नहीं है. असली सवाल यह है कि हाथ में कितना पैसा बचता है?

इसी सवाल को लेकर सोशल मीडिया पर एक भारतीय की पोस्ट चर्चा में है.X यूजर तनुज ने दावा किया कि वह जर्मनी में करीब 6 साल रह चुके हैं. उन्होंने 70 हजार पाउंड की सैलरी को लेकर भारतीयों के लिए एक रियलिटी चेक शेयर किया.

70 हजार पाउंड की सैलरी, लेकिन पूरी रकम नहीं मिलती

तनुज के मुताबिक, 70 हजार पाउंड की सैलरी इंडियन करेंसी में करीब 65-70 लाख रुपये जैसी दिखाई देती है. लेकिन जर्मनी में ग्रॉस सैलरी और हाथ में आने वाली नेट सैलरी अलग होती है. सैलरी का एक हिस्सा टैक्स और सोशल कॉन्ट्रिब्यूशन में चला जाता है.

यह भी पढ़ें: नॉर्वे की नौकरी ने बदल दी सोच, भारतीय कर्मचारी बोला- 'अब समझ आया, जिंदगी क्या होती है'

Advertisement

इसके बाद सबसे बड़ा खर्च किराए का हो सकता है. तनुज के अनुसार, बड़े शहरों में घर का किराया 1,500 पाउंड या उससे ज्यादा भी हो सकता है. इसके अलावा इंश्योरेंस, बिजली, इंटरनेट, खाने-पीने और दूसरी रोजमर्रा की सर्विस पर भी खर्च होता है.

यानी किसी व्यक्ति की सालाना सैलरी अगर 70 हजार पाउंड है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके पास खर्च करने के लिए उतनी ही रकम उपलब्ध है. शहर, परिवार, घर का किराया, टैक्स की स्थिति और लाइफस्टाइल के हिसाब से बचत काफी बदल सकती है.

भारत से तुलना में सबसे बड़ी गलती

सोशल मीडिया पोस्ट में 70 हजार पाउंड की सैलरी को परचेजिंग पावर पैरिटी यानी पीपीपी के हिसाब से भारत में करीब 32-35 लाख रुपये सालाना के बराबर बताया गया है. लेकिन पीपीपी कन्वर्जन और करेंसी कन्वर्जन दो अलग चीजें हैं.

करेंसी कन्वर्जन सिर्फ यह बताता है कि एक देश की करेंसी की रकम दूसरे देश की करेंसी में कितनी है. वहीं पीपीपी अलग-अलग देशों में सामान और सर्विस की कीमतों को ध्यान में रखकर खरीदने की क्षमता की तुलना करता है.

इसी वजह से विदेश में नौकरी का फैसला सिर्फ इस आधार पर करना मुश्किल है कि वहां की सैलरी भारतीय रुपये में कितनी दिखाई दे रही है.

Advertisement

जर्मनी जाने से पहले किन चीजों का हिसाब लगाएं?

अगर कोई भारतीय जर्मनी में नौकरी के लिए जाने की तैयारी कर रहा है, तो सैलरी पैकेज के साथ कई दूसरी चीजों को भी देखना जरूरी है. जैसे नेट सैलरी कितनी होगी, जिस शहर में नौकरी है वहां किराया कितना है, हेल्थ इंश्योरेंस और दूसरे कॉन्ट्रिब्यूशन कितने हैं और हर महीने रोजमर्रा के खर्च कितने होंगे.

तनुज ने अपनी पोस्ट के अंत में लोगों को सलाह दी कि भारत में अच्छी नौकरी छोड़कर विदेश जाने से पहले सिर्फ सैलरी कन्वर्जन देखकर फैसला न लें.

इसलिए 70 हजार पाउंड की सैलरी किसी एक व्यक्ति के लिए अच्छी बचत का मौका हो सकती है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति के लिए बड़े शहर में परिवार के साथ रहने पर खर्च काफी ज्यादा हो सकता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement