प्रतिभा आपको टीम इंडिया तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहने के लिए हर सीरीज के साथ खुद को बदलना पड़ता है. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंदबाज आपकी ताकत से नहीं, आपकी आदतों से लड़ते हैं. जिस दिन वे आपकी आदत पढ़ लेते हैं, उसी दिन आपकी सबसे बड़ी ताकत कमजोरी बन सकती है.
पिछले डेढ़ महीने के विदेशी दौरे ने टीम इंडिया के दो बल्लेबाजों की ऐसी ही दो तस्वीरें सामने रख दी हैं. एक तस्वीर 15 साल के वैभव सूर्यवंशी की है, जिन्होंने मुश्किल हालात में अपने खेल को बदलना सीख लिया. दूसरी तस्वीर 25 साल के अभिषेक शर्मा की है, जो लगातार उसी अंदाज में बल्लेबाजी करते रहे, जिसे गेंदबाज अब पूरी तरह पढ़ चुके हैं.
यही इस पूरे दौरे की सबसे बड़ी कहानी है. रन नहीं... आउट होने का तरीका चिंता की वजह है. अगर सिर्फ स्कोरकार्ड देखें तो लगेगा कि अभिषेक शर्मा की शुरुआत बुरी नहीं थी. आयरलैंड में 49 रन, इंग्लैंड में 59 और 43 रन...लेकिन इन पारियों के भीतर एक खतरा लगातार दिखाई दे रहा था.
अभिषेक लगभग हर मैच में एक ही टेम्पलेट लेकर बल्लेबाजी करने उतरे. क्रीज से हटना, ऑफ साइड में ताकतवर स्लैश खेलना और गेंद को पॉइंट या कवर के ऊपर से निकालने की कोशिश करना. शुरुआत में कुछ शॉट निकले, इसलिए किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन जैसे-जैसे दौरा आगे बढ़ा, विरोधी टीमों ने उनकी यही आदत पकड़ ली.
नतीजा हर मैच में लगभग एक जैसा रहा. कभी बल्ले का बाहरी किनारा लगा और विकेटकीपर ने कैच लपक लिया. कभी बैकवर्ड प्वाइंट पर आसान कैच चला गया.
सबसे चिंताजनक बात यह नहीं थी कि अभिषेक आउट हो रहे थे. चिंता इस बात की थी कि वह हर बार लगभग एक ही तरीके से आउट हो रहे थे.
𝐁𝐥𝐞𝐬𝐬𝐢𝐧𝐠 has been a curse for Abhishek Sharma 🤕
— FanCode (@FanCode) July 26, 2026
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इंटरनेशनल क्रिकेट में एक ही प्लान ज्यादा दिन नहीं चलता
आईपीएल में कई बार आपका प्राकृतिक खेल ही काफी होता है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट अलग है. यहां हर बल्लेबाज के खिलाफ डेटा तैयार होता है. वीडियो एनालिस्ट हर गेंद का अध्ययन करते हैं. गेंदबाज जानते हैं कि आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी, आप किस लंबाई की गेंद पर कौन-सा शॉट खेलेंगे और दबाव में आपकी पहली गलती क्या होगी.
यही वजह है कि दुनिया के बड़े बल्लेबाज समय-समय पर अपना खेल बदलते रहते हैं. विराट कोहली ने ऑफ स्टंप के बाहर की गेंदों पर अपने खेल में बदलाव किया. रोहित शर्मा ने टेस्ट क्रिकेट में तकनीक बदली. सूर्यकुमार यादव ने भी कठिन दौर में जोखिम कम करना सीखा. बड़े बल्लेबाज अपनी पहचान नहीं छोड़ते, लेकिन जरूरत पड़ने पर उसका तरीका जरूर बदलते हैं.
अभिषेक शर्मा के खेल में फिलहाल वही बदलाव दिखाई नहीं दे रहा. और यहीं वैभव ने सबको चौंका दिया.
वैभव सूर्यवंशी की पहचान क्या है?
लंबे छक्के...तेज स्ट्राइक रेट...पहली गेंद से हमला
... लेकिन जिम्बाब्वे के खिलाफ तीसरे टी20 में उन्होंने अपनी पहचान से अलग बल्लेबाजी की. पिच आसान नहीं थी. गेंद रुककर आ रही थी. ऐसे में वैभव ने शुरुआत से ही बड़े शॉट खेलने की जिद नहीं की.
उन्होंने पहले विकेट की गति समझी. गेंदबाजों को परखा. सिंगल-दो रन लेकर लय बनाई. और जब सेट हो गए, तभी बड़े शॉट निकाले. 31 गेंदों में अर्धशतक शायद उनके करियर का सबसे अहम अर्धशतक था.
इसलिए नहीं कि उसमें सबसे ज्यादा चौके-छक्के थे, बल्कि इसलिए कि उसने पहली बार दिखाया कि यह बल्लेबाज परिस्थितियों के हिसाब से खुद को बदल सकता है.
यानी उसने यह संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर वह अपने स्वाभाविक खेल से अलग भी बल्लेबाजी कर सकता है. यही दोनों बल्लेबाजों के बीच सबसे बड़ा फर्क है. यहां मकसद वैभव और अभिषेक की तुलना करना नहीं है. वैभव ने अभी लंबा सफर तय करना है और अभिषेक ने भी भारतीय क्रिकेट को यादगार पारियां दी हैं.
लेकिन इस दौरे ने दोनों की क्रिकेटिंग सोच का अंतर जरूर दिखाया. जब पहला रास्ता काम नहीं आया, तो वैभव ने दूसरा रास्ता खोज लिया. जब पहला रास्ता बंद हुआ, तो अभिषेक उसी रास्ते पर चलते रहे. यही अंतर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में करियर की दिशा बदल देता है.
क्या दबाव भी एक वजह है?
यह भी संभव है कि पिछले दो वर्षों की सफलता ने अभिषेक के भीतर एक अलग तरह की मानसिकता पैदा कर दी हो. आईपीएल में विस्फोटक बल्लेबाजी. टी20 अंतरराष्ट्रीय में तेज शतक. लगातार आक्रामक क्रिकेट.
ऐसे में कई बल्लेबाज अपने प्राकृतिक खेल से बाहर निकलने से डरने लगते हैं. उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने गति धीमी की तो उनकी पहचान ही खत्म हो जाएगी.
… लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे सफल बल्लेबाज वही बनते हैं, जो जरूरत पड़ने पर अपनी पहचान के खिलाफ भी खेलने का साहस रखते हैं. वैभव ने जिम्बाब्वे में यही किया.
अभिषेक शर्मा की स्ट्रोक प्ले को निखारने का श्रेय काफी हद तक युवराज सिंह को दिया जाता है. अब जरूरत बड़े शॉट सिखाने की नहीं है. जरूरत है उन्हें यह सिखाने की कि कब बड़ा शॉट नहीं खेलना है. कब गेंद छोड़नी है. कब सिर्फ एक रन लेना है. और कब 15 गेंदों तक इंतजार करना है. यही अंतर अच्छे बल्लेबाज और महान बल्लेबाज के बीच होता है.
अक्टूबर से पहले खुद को बदलना होगा
भारत का अगला टी20 मुकाबला अक्टूबर में वेस्टइंडीज के खिलाफ है. यानी अभिषेक शर्मा के पास करीब दो महीने हैं. यह समय नेट्स में सिर्फ छक्के लगाने का नहीं है. यह समय अपनी तकनीक, अपनी मानसिकता और अपने शॉट चयन पर दोबारा काम करने का है. क्योंकि विरोधी गेंदबाज अब उन्हें पढ़ चुके हैं. अब अगली चाल अभिषेक को चलनी होगी.
इस विदेशी दौरे ने सिर्फ एक उभरते सितारे की कहानी नहीं लिखी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का सबसे बड़ा सबक भी याद दिलाया. यहां टैलेंट दरवाजा खोलता है, लेकिन करियर वही बनाता है जो हर नई चुनौती के साथ खुद को नया बना सके. वैभव ने इसकी झलक दिखाई है. अब अभिषेक शर्मा के सामने यही सबसे बड़ी परीक्षा है.
अब गेंद अभिषेक शर्मा के पाले में है. अगर उन्होंने अपने खेल में नया अध्याय जोड़ लिया, तो यह दौर सिर्फ एक खराब फॉर्म साबित होगा. लेकिन अगर वह उसी पुराने टेम्पलेट पर चलते रहे, तो गेंदबाज हर सीरीज में उन्हें उसी तरह आउट करते रहेंगे. एक ने पिच पढ़ी, दूसरे को गेंदबाज पढ़ गए. फिलहाल, टीम इंडिया की यही दो सबसे अलग तस्वीरें हैं.