1983 में कपिल देव की कप्तानी में जब भारत ने पहली बार वनडे वर्ल्ड कप जीता था, तब टीम के पास न आज जैसा हेड कोच था, न समर्पित टीम डॉक्टर, न फिजियोथेरेपिस्ट और न ही विशेषज्ञों से भरी बैकरूम टीम. खिलाड़ियों के साथ टीम मैनेजर पीआर मान सिंह थे, जो सफर से लेकर ठहरने, खाने और प्रशासनिक इंतजाम तक की जिम्मेदारी संभालते थे. लेकिन वक्त बदला, क्रिकेट बदला और टीम इंडिया को तैयार करने का तरीका भी पूरी तरह बदल गया.
आज मैदान पर उतरने वाले 11 खिलाड़ियों के पीछे कोच, डॉक्टर, फिजियो, मसाजर, ट्रेनिंग असिस्टेंट और परफॉर्मेंस एनालिस्ट की पूरी टीम काम करती है. न्यूजीलैंड दौरे के चौथे टी20 इंटरनेशनल से पहले बीसीसीआई ने एक वीडियो शेयर कर इसी आधुनिक टीम इंडिया की झलक दिखाई है.
1983 और आज की टीम इंडिया के बीच सबसे बड़ा अंतर सिर्फ सुविधाओं का नहीं, बल्कि क्रिकेट की तैयारी के पूरे सिस्टम का है. उस दौर में खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों के बीच आपसी तालमेल, अनुभव और अपनी समझ के दम पर मैदान में उतरना पड़ता था. आज हर विभाग के लिए विशेषज्ञ मौजूद हैं, जो खिलाड़ियों की छोटी-छोटी जरूरतों से लेकर विरोधी टीम के विश्लेषण तक पर काम करते हैं.

क्रिकेट का बदलता चेहरा, खिलाड़ियों के पीछे विशेषज्ञों की पूरी टीम
क्रिकेट में पहले चर्चा का केंद्र बल्लेबाज, गेंदबाज और कप्तान हुआ करते थे. मैच जीतने के बाद खिलाड़ियों के प्रदर्शन की तारीफ होती थी और हार पर उनकी रणनीति पर सवाल उठते थे. लेकिन आधुनिक क्रिकेट में खिलाड़ियों की तैयारी सिर्फ नेट्स में बल्लेबाजी और गेंदबाजी तक सीमित नहीं है. फिटनेस, चोट से बचाव, रिकवरी, तकनीक, रणनीति और प्रदर्शन का विश्लेषण भी उतना ही अहम हो गया है.
टीम इंडिया के न्यूजीलैंड दौरे पर इसका नमूना देखने को मिला है. बीसीसीआई ने कोचों और सपोर्ट स्टाफ के सदस्यों का वीडियो साझा किया है. इस सूची में मुख्य कोच गौतम गंभीर से लेकर टीम डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट, मसाजर और परफॉर्मेंस एनालिस्ट तक शामिल हैं. सूची में कुल 17 नाम हैं, जिनमें कोचिंग स्टाफ के सदस्य भी शामिल हैं.
POV - Travel day 🧳 with #TeamIndia's coaches and support staff 🙌 🙌 #NZvIND https://t.co/At140smYhA
— BCCI (@BCCI) October 29, 2026
यह वीडियो बताता है कि अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सिर्फ प्रतिभा के दम पर मैदान में उतरना काफी नहीं है. खिलाड़ियों को पूरे दौरे में फिट रखने, उनकी तैयारी को बेहतर बनाने और प्रदर्शन के स्तर को बनाए रखने के लिए पर्दे के पीछे भी लगातार काम होता है.
गंभीर से लेकर मोर्ने मोर्कल तक, कोचिंग की जिम्मेदारी
टीम इंडिया के मुख्य कोच गौतम गंभीर के साथ बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक और गेंदबाजी कोच मोर्ने मोर्कल भी इस टीम का हिस्सा हैं. साईराज बहुतुले स्पिन गेंदबाजी कोच की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि सुभदीप घोष फील्डिंग कोच हैं.




इनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं. बल्लेबाजी कोच खिलाड़ियों की तकनीक और शॉट चयन पर काम करते हैं, गेंदबाजी कोच लाइन-लेंथ और गेंदबाजी की योजनाओं पर ध्यान देते हैं, जबकि फील्डिंग कोच कैचिंग, थ्रो और मैदान पर चुस्ती बेहतर करने में जुटे रहते हैं.
इसके अलावा एड्रियन ले रूक्स स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच हैं. उनका काम खिलाड़ियों की शारीरिक तैयारी और फिटनेस को बेहतर बनाने से जुड़ा है. हर खिलाड़ी की भूमिका और जरूरत अलग होती है, इसलिए ट्रेनिंग की योजना भी उसी हिसाब से तैयार करनी पड़ती है.

डॉक्टर, फिजियो और मसाजर... फिटनेस का मोर्चा भी अहम
लंबे अंतरराष्ट्रीय दौरे में खिलाड़ियों को लगातार यात्रा करनी पड़ती है. मैचों के बीच आराम, अभ्यास और रिकवरी के लिए समय निकालना भी बड़ी चुनौती होता है. ऐसे में टीम के मेडिकल और फिजिकल सपोर्ट स्टाफ की भूमिका अहम हो जाती है.
टीम डॉक्टर डॉ. चार्ल्स मिंज के साथ हेड फिजियोथेरेपिस्ट कमलेश जैन और फिजियोथेरेपिस्ट योगेश परमार भी सूची में शामिल हैं. नंदन माजी और चेतन कुमार मसाजर के तौर पर टीम से जुड़े हैं.





इन विशेषज्ञों का काम खिलाड़ियों की शारीरिक जरूरतों के मुताबिक सहायता देना, चोट की स्थिति में मेडिकल टीम के साथ काम करना और मैचों के बीच रिकवरी में मदद करना है. हालांकि, किसी खिलाड़ी की चोट या फिटनेस पर अंतिम फैसला मेडिकल आकलन और टीम प्रबंधन की प्रक्रिया के आधार पर ही होता है.
ट्रेनिंग असिस्टेंट से लॉजिस्टिक्स मैनेजर तक, हर जिम्मेदारी के लिए अलग व्यक्ति
बीसीसीआई की सूची में ट्रेनिंग असिस्टेंट के तौर पर दयानंद गरानाई, उदेनाका नुवान और राघवेंद्र दुगी के नाम हैं. टीम ऑपरेशन मैनेजर सुमीत और लॉजिस्टिक्स मैनेजर खाजा मुबास्सिरुद्दीन भी इस व्यवस्था का हिस्सा हैं.



किसी अंतरराष्ट्रीय दौरे में खिलाड़ियों की तैयारी के साथ यात्रा, ठहरने, अभ्यास और अन्य व्यवस्थाओं का तालमेल भी जरूरी होता है. अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालने वाले लोग इन व्यवस्थाओं को सुचारु बनाने में मदद करते हैं, ताकि खिलाड़ियों और कोचों का ध्यान क्रिकेट पर केंद्रित रह सके.


टीम के परफॉर्मेंस एनालिस्ट हरि प्रसाद मोहन भी सूची में शामिल हैं. आधुनिक क्रिकेट में वीडियो फुटेज, आंकड़ों और प्रदर्शन से जुड़े विश्लेषण का इस्तेमाल रणनीति बनाने में किया जाता है. विरोधी टीम की ताकत और कमजोरियों को समझने से लेकर अपने खिलाड़ियों के प्रदर्शन की समीक्षा तक, डेटा की भूमिका लगातार बढ़ी है.

12 मैचों का दौरा, तीनों फॉर्मेट में तैयारी की चुनौती
भारत का न्यूजीलैंड दौरा तीनों फॉर्मेट में कुल 12 मैचों का है. ऐसे लंबे दौरे में खिलाड़ियों की फिटनेस, कार्यभार और तैयारी का प्रबंधन अहम हो जाता है. टी20 में जहां तेजी से रन बनाने और सीमित समय में रणनीति लागू करने पर जोर रहता है, वहीं वनडे और टेस्ट क्रिकेट की जरूरतें अलग होती हैं.
इसी वजह से टीम की तैयारी में कोचिंग, ट्रेनिंग, मेडिकल सहायता और विश्लेषण का तालमेल मायने रखता है. हालांकि, इतने बड़े सपोर्ट स्टाफ की मौजूदगी अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है. आखिरकार मैदान पर प्रदर्शन खिलाड़ियों को ही करना होता है.
1983 से 2026 तक, बदल गया क्रिकेट का पूरा गणित
1983 की विश्व कप विजेता टीम की उपलब्धि आज भी भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है. उस दौर में सीमित संसाधनों के बीच कपिल देव और उनके साथियों ने इतिहास रचा था. आज की टीम इंडिया के पास आधुनिक सुविधाएं, विशेषज्ञ कोच और व्यापक सपोर्ट सिस्टम है.
दोनों दौर की तुलना का मकसद किसी एक व्यवस्था को बेहतर या कमजोर बताना नहीं, बल्कि यह समझना है कि क्रिकेट कितना बदल चुका है. तब टीम मैनेजर को कई व्यवस्थागत जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती थीं. आज काम का बंटवारा विशेषज्ञों के बीच है और खिलाड़ियों की तैयारी कहीं ज्यादा व्यवस्थित हो गई है.
बीसीसीआई का यह वीडियो इसी बदलाव की झलक देता है. दर्शकों को मैदान पर चौके-छक्के और विकेट दिखाई देते हैं, लेकिन उस प्रदर्शन के पीछे तैयारी, ट्रेनिंग, रिकवरी और रणनीति की एक लंबी प्रक्रिया होती है. 1983 में भारत ने सीमित सपोर्ट व्यवस्था के बीच विश्व कप जीता था. 2026 की टीम इंडिया आधुनिक क्रिकेट के उसी सफर का नया अध्याय है, जहां खिलाड़ियों के साथ पर्दे के पीछे काम करने वाली पूरी टीम भी अहम भूमिका निभाती है.