जर्नलिस्ट सोनिया तोमर द्वारा अमेरिका के मिसिसिपी स्टेट स्थित नासा के स्टेनिस स्पेस सेंटर का आंखों-देखा हाल, जहां वे रॉकेट, स्पेस मॉड्यूल, स्पेस सूट आदि सहेजकर रखे गए हैं, जो इंसान के पहले मून-मिशन में इस्तेमाल हुए थे...
घने जंगलों के बीच फैला करीब सवा लाख एकड़ का बफर ज़ोन. जहरीले सांपों और घड़ियालों से सावधान रहने वाले बोर्ड दिखाई देते हैं. यह कोई जंगल सफारी नहीं बल्कि यहां प्रकृति के बीच विज्ञान सांस लेता है. विज्ञान की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं में से एक. हर सड़क, इमारत और हर टेस्ट स्टैंड मानवता की सबसे बड़ी अंतरिक्ष उपलब्धियों की कहानी कहते हैं. यह है नासा का स्टेनिस स्पेस सेंटर.
मेरे एक ओर है व्यूइंग डेक, जिससे दूर खड़े होकर रॉकेट लॉन्च देखा जाता है. दूसरी ओर काउंटडाउन क्लॉक है. वह घड़ी, जिस पर लॉन्च से पहले कुछ मिनटों से सेकंड तक हर नज़र टिकी होती है. उस पल समय केवल आगे नहीं बढ़ता, बल्कि इतिहास लिखता है.
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धूप तेज है. तापमान करीब 38 डिग्री सेल्सियस. ठीक सामने खड़ा है सैटर्न-V रॉकेट का विशाल F-1 इंजन. आज यह शांत है, लेकिन कभी इस शक्तिशाली इंजन के भीतर का तापमान लगभग 3,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा होगा. यही वह आग थी, जिसने सैटर्न V रॉकेट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने की शक्ति दी और इंसान को पहली बार चांद तक पहुंचाया.
20 जुलाई 1969 की रात जब पड़ा चांद पर पहला कदम
20 जुलाई 1969 की वह रात जब नील आर्मस्ट्रांग ने चांद की सतह पर पहला कदम रखा, तो पूरी दुनिया ने इतिहास बनते देखा. उनके बाद बज़ एल्ड्रिन भी चंद्रमा पर उतरे, जबकि माइकल कॉलिन्स कमांड मॉड्यूल में चंद्र कक्षा की परिक्रमा करते रहे. अपोलो 11 मिशन का वह लॉन्च फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से हुआ था, लेकिन उस सफलता की नींव मिसिसिपी के स्टेनिस स्पेस सेंटर में रखी गई थी.

यहीं सैटर्न V रॉकेट के पहले फेज के शक्तिशाली F-1 इंजनों को कई बार पूरी क्षमता से परखा गया, ताकि अंतरिक्ष में कोई चूक न हो. करीब ढाई मिनट में ही रॉकेटडाइन के पांच F-1 इंजनों ने सैटर्न V रॉकेट को करीब 70 किमी की ऊंचाई और 9800 किलोमीटर प्रति घंटे की गति दे दी थी.
सैटर्न V रॉकेट के पहले चरण S1c का निर्माण न्यू ओरलींस में होता था. वहां से उस 138 फीट लंबे बूस्टर को विशेष मालवाहक जहाज़ों के जरिए नदी के रास्ते स्टेनिस स्पेस सेंटर लाया जाता था. इंजनों की टेस्टिंग के लिए नासा ने लगभग 13 हजार एकड़ जमीन खरीदी और सब मिलाकर करीब 1.25 लाख एकड़ का विशाल अकॉस्टिक बफर ज़ोन बनाया. आज यहां की खामोशी देखकर कल्पना करना मुश्किल है कि कभी यही इलाका दुनिया के सबसे शक्तिशाली रॉकेट इंजनों की गर्जना से कांप उठता होगा.
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पुराने मिशन से लेकर आर्टेमिस मिशन तक
इंजन के पास 'टेस्टिंग इन प्रोग्रेस' का बोर्ड लगा है, जो बताता है कि करीब 9 किलोमीटर दूर टेस्ट स्टैंड पर आज भी रॉकेट इंजन की टेस्टिंग चल रही है. कभी स्टेनिस स्पेस सेंटर की टेस्टिंग साइट्स और रॉकेट टेस्ट स्टैंड को बस टूर के जरिये करीब से देखा जा सकता था. लेकिन सुरक्षा और संवेदनशील तकनीकी गतिविधियों के कारण इन टेस्टिंग क्षेत्रों का दौरा आम लोगों के लिए फिलहाल बंद कर दिया गया है.

स्टेनिस स्पेस सेंटर केवल अपोलो मिशन की विरासत नहीं है. यही वह जगह है जहां आज भी भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की तैयारी जारी है. जिस धरती पर कभी अपोलो मिशन के इंजन दहाड़ते थे, वहीं आज आर्टेमिस-II मिशन के लिए RS-25 इंजनों की टेस्टिंग हो रही है. इतिहास और भविष्य, अपोलो से आर्टेमिस तक, छह दशक बाद भी स्टेनिस अंतरिक्ष अभियानों की धड़कन बना हुआ है.
स्टेनिस स्पेस सेंटर ने अपोलो कार्यक्रम के दौरान सैटर्न V रॉकेट के 27 रॉकेट चरणों का परीक्षण किया था. यहां की हर टेस्ट फायरिंग उस ऐतिहासिक मिशन की तैयारी थी, जिसने आगे चलकर मानव इतिहास का सबसे यादगार अध्याय लिखा. चांद तक पहुंचने की कहानी लॉन्च पैड से नहीं, बल्कि उन अनगिनत परीक्षणों से शुरू हुई थी, जिनमें इंजीनियरों ने हर छोटी-बड़ी चुनौती को पार किया. सैटर्न V की ऊंचाई 363 फीट थी, यानी किसी 36 मंजिला इमारत के बराबर.
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वहीं इसका वजन करीब 28 लाख किलोग्राम था यानी लगभग 400 हाथियों के बराबर. इस विशाल रॉकेट को लॉन्च करने के लिए सैटर्न V के पहले चरण में पांच एफ1 इंजन लगाए गए थे, जो मिलकर लगभग 75 लाख पाउंड की शक्ति उत्पन्न करते थे. एक इंजन का वजन लगभग 8,400 किलोग्राम था. लगभग 18 फीट ऊंचा और 12.5 फीट चौड़ा यह इंजन इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है. ये इतने विशाल हैं कि कुछ दूर से वाइड शॉट में ही सभी इंजनों का फोटो लिया जा सका.

नील आर्मस्ट्रांग के साथ दो एस्ट्रोनॉट की यात्रा
1960 के दशक में सैटर्न V केवल एक रॉकेट नहीं था, बल्कि अपने समय का सबसे महत्वाकांक्षी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट था. इसकी लागत करीब 18.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर थी, जो आज के हिसाब से लगभग 1.5 अरब डॉलर के बराबर है. इसे नासा के नेतृत्व में करीब चार लाख वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों ने मिलकर संभव बनाया. बोइंग, नॉर्थ अमेरिकन एविएशन, डगलस एयरक्राफ्ट और रॉकेटडाइन जैसी कंपनियों के साथ मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर और वर्नर वॉन ब्राउन की टीम ने इस सपने को आकार दिया.
स्टेनिस स्पेस सेंटर में अपोलो मिशन को महसूस किया जाता है. यहां के इंटरैक्टिव डिस्प्ले, मॉडल और डॉक्यूमेंट्री बताते हैं कि कैसे एक विचार से शुरू हुई यात्रा रॉकेट के निर्माण, उसकी कठिन परीक्षाओं और आखिरकार इंसान के चांद पर पहले कदम तक पहुंची.
नील आर्मस्ट्रांग के लिए तैयार किए गए तीन सूट में से एक और चांद से लाए गए वास्तविक मून रॉक उस इतिहास को आंखों के सामने जीवंत कर देते हैं. यह स्पेस सेंटर केवल अंतरिक्ष इतिहास को संजोकर नहीं रखता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मन में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा जगाकर उन्हें सपने देखने की प्रेरणा भी देता है.